Wednesday, 11 April 2018

मजीठिया: त्रिपक्षीय समिति की बैठक कल मुम्बई में

देशभर के मीडिया कर्मियों के वेतन और प्रमोशन से जुड़े जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड  की सिफारिश को अमल में लाने के लिए गठित महाराष्ट्र की  त्रिपक्षीय समिती की बैठक मुंबई में कामगार आयुक्त कार्यालय के समिती कक्ष में  12 अप्रैल को दोपहर 12- 15 बजे   आयोजित की जा रही है । माननीय सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल  19 जून को आये आदेश के बाद महाराष्ट्र में  त्रिपक्षीय समिति की ये बैठक तय करेगी कि अखबार मालिकों ने सुप्रीमकोर्ट का आदेश कितना माना है।
इस बैठक में पत्रकारों की तरफ से पांच प्रतिनिधि नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट की महाराष्ट्र महासचिव शीतल हरीश करदेकर, बृहन मुंबई यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट के मन्त्रराज जयराज पांडे, रवींद्र राघवेंन्द्र देशमुख, इंदर जैन कन्वेनर ज्वाइन्ट एक्शन कमेटी ठाणे और किरण शेलार शामिल हैं। मालिकों की तरफ से जो पांच लोग शामिल हैं उनमें जयश्री खाडिलकर पांडे, वासुदेव मेदनकर, राजेंद्र कृष्ण रॉव सोनावड़े और बालाजी अन्नाराव मुले हैं। इस समिति में लोकमत की तरफ से दो प्रतिनिधि शामिल किये गए हैं जिनके नाम बालाजी अन्ना रॉव मुले और विवेक घोड़ वैद्य हैं जबकि रोहिणी खाडिलकर नवाकाल की हैं। इसी तरह राजेंद्र सोनावड़े दैनिक देशदूत नासिक से हैं। इसमे कई सदस्य बैठक में लगातार नदारत रहते हैं। बैठक की अध्यक्षता कामगार आयुक्त महाराष्ट्र  करेंगे। इस त्रिपक्षीय समिति की बैठक में  नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट की महाराष्ट्र महासचिव शीतल करंदेकर  कामगार आयुक्त को एक ज्ञापन भी देकर यह मांग भी करेंगी कि समिति में उन नए सदस्यों को भी शामिल किया जाए जिन्हें जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की अच्छी समझ हो।


शशिकांत सिंह

पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट

9322411335

Monday, 9 April 2018

आज के दौर में एक पत्रकार ऐसा भी...



मुज़फ्फर नगर में एक पत्रकार ऐसा भी है जिसके पास न अपनी छपाई मशीन है, न कोई स्टाफ और न सूचना क्रांति के प्रमुख साधन-संसाधन। मात्र कोरी आर्ट शीट और काले स्केज ही उसके पत्रकारिता के साधन हैं। तमाम शहर की दूरी अपनी साईकिल से तय करने वाले और एक-एक हफ्ता बगैर धुले कपड़ों में निकालने वाले इस पत्रकार का नाम है दिनेश। जो गाँधी कालोनी का रहने वाला है। हर रोज अपनी रोजी रोटी चलाने के अलावा दिनेश पिछले सत्रह वर्षों से अपने हस्तलिखित अख़बार "विद्या दर्शन" को चला रहा है। प्रतिदिन अपने अख़बार को लिखने में दिनेश को ढाई-तीन घंटे लग जाते हैं। लिखने के बाद दिनेश अखबार की कई फोटोकॉपी कराकर शहर के प्रमुख स्थानों पर स्वयं चिपकाता है। हर दिन दिनेश अपने अख़बार में किसी न किसी प्रमुख घटना अथवा मुद्दे को उठाता है और उस पर अपनी गहन चिंतनपरक निर्भीक राय रखते हुए खबर लिखता है।

पूरा अख़बार उसकी सुन्दर लिखावट से तो सजा ही होता है साथ ही उसमें समाज की प्रमुख समस्याओं और उनके निवारण पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता है।

सुबह से शाम तक आजीविका के लिये हार्डवर्क करने वाले दिनेश को अख़बार चलाने के लिये किसी भी प्रकार की सरकारी अथवा गैर सरकारी वित्त सहायता प्राप्त नहीं नहीं है। गली-गली आइसक्रीम बेचने के जैसे काम करके दिनेश अपना जीवन और अख़बार चलाता है। अपने गैर विज्ञापनी अख़बार से दिनेश किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं कर पाता है। फिर भी अपने हौसले और जूनून से दिनेश निरंतर सामाजिक परिवर्तन के लिये अख़बार चला रहा है। श्रम साध्य इस काम को करते हुए दिनेश मानता है कि भले ही उसके पास आज के हिसाब से साधन-संसाधन नहीं हैं और न ही उसके अख़बार का पर्याप्त प्रचार-प्रसार है फिर भी यदि कोई एक भी उसके अख़बार को ध्यान से पढता है अथवा किसी एक के भी विचार-परिवर्तन में उसका अख़बार रचनात्मक योगदान देता है तो उसका अख़बार लिखना सार्थक है।

बगैर किसी स्वार्थ, बगैर किसी सशक्त रोजगार और बगैर किसी सहायता के खस्ताहाल दिनेश अपनी तुलना इस देश के आम नागरिक से करता है। बात सही भी है। भले ही उसका अख़बार बड़े पाठकवर्ग अथवा समाज का प्रतिनिधित्व न करता हो परंतु वह खुद तो इस देश में गरीबों और मज़लूमों की एक बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। इस देश में पत्रकारिता का जो इतिहास रहा है वह देश की आज़ादी से सम्बद्ध रहा है।

आज़ादी के बाद पत्रकारिता जनता के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने लगी। परंतु आज हम सब जानते हैं कि आज पत्रकारिता किसका प्रतिनिधित्व कर रही है। ऐसे में दिनेश अपने दिनोदिन क्षीण होते वज़ूद के बावजूद पत्रकारिता के बदल चुके मूल्यों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। इस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है जिसमें दिनेश या दिनेश जैसे लोगों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। हमारे बदलते मानवीय मूल्यों पर सवाल खड़ा करता है कि क्या हम एक ऐसे ही समाज का निर्माण करने में व्यस्त हैं जिसमें सब आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। किसी को किसी के दुःख अथवा समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। ऐसे बहुत से सवाल खड़ा करता दिनेश और उसका अखबार इस दौर की बड़ी त्रासदी की ओर इशारा करता है जिसे समझने की आज बेहद जरुरत है।

(साभार: ब्राडकास्ट ग्रुप)

Saturday, 7 April 2018

मजीठिया: नईदुनिया जागरण को भारी पड़ी चालाकी, हाईकोर्ट ने लगाई पांच-पांच हजार की कॉस्ट

मध्यप्रदेश में श्रम न्यायालयों मे चल रहे मजीठिया के मामलों में


नईदुनिया जागरण प्रबंधन की हर चाल उलटी पड़ रही है। दरअसल बीते दिनों ग्वालियर श्रम न्यायालय में चल रहे मामलों में कूट परीक्षण होना था, लेकिन बार-बार प्रबंधन के वकील लेबर कोर्ट में बहाना बनाकर भाग रहे थे। इसके
बाद आखिरकार श्रम न्यायालय की विद्वान न्यायाधीश ने नईदुनिया का कूट परीक्षण का अधिकार ही समाप्त कर दिया। इससे तिलमिलाया प्रबंधन मामले को लेकर हाईकोर्ट पहुंच गया।
प्रबंधन ने सोचा था कि हाईकोर्ट में मामले को लटका कर रखा जाएगा। इससे कर्मचारियो का हौसला ठंडा होगा लेकिन कर्मचारी भी कहां हार मानने वाले थे। उन्होंने भी हाईकोर्ट में पूरे मामले में अपना पक्ष मजबूती के साथ रखा और प्रबंधन की मामले को लटकाने की नियत को कोर्ट के समक्ष रखा। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले में प्रबंधन को श्रम
न्यायालय में निर्धारित तारीख को कूट परीक्षण का अवसर तो प्रदान किया। साथ ही अपने आदेश में प्रबंधन को फटकार लगाकर प्रत्येक कर्मचारी को पांच-पाच हजार रुपए प्रदान करने के आदेश भी दे दिए। अब प्रबंधन को पहले कर्मचारियों को पहले पांच- पांच हजार रुपए देने होंगे। इसके बाद ही श्रम
न्यायालय में कूट परीक्षण हो सकेगा।
इस निर्णय के बाद प्रबंधन के वे लोग जो कर्मचारियों के सामने बड़ी-बड़ी बातें करते थे, उन्हें सांप सूंघ गया है। इसके पहले प्रारंभिक आपत्तियों के मामले में भी कर्मचारियों ने सभी प्रकरणों में प्रबंधन की एक भी चाल को कामयाब नहीं होने दी थी।
श्रम न्यायालय ने सभी प्रकरणों में प्रबंधन की प्रारंभिक आपत्तियों को निरस्त कर दिया था। इसके अलावा कई प्रकरणों मे तय समय में जवाब प्रस्तुत नहीं करने पर श्रम न्यायालय ने प्रबंधन पर जुर्माना भी ठोंक दिया है। ऐसे
में प्रबंधन की हर चालाकी कोर्ट में उलटी पड़ती जा रही है।

#MajithiaWageBoardsSalary, MajithiaWageBoardsSalary, Majithia Wage Boards Salary

Wednesday, 28 March 2018

पत्रकारिता के पत्तलखोर दलालों की खुली पोल

कोबरापोस्ट का ख़ुलासा, पैसे के एवज़ में ख़बरें छापने को राज़ी दिखे देश के कई मीडिया हाउस



अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले कोबरापोस्ट के हालिया खुलासे ने देश के मीडिया जगत की पोल खोल कर रख दी है. ख़ुफ़िया कैमरे की मदद से किए गए कोबरापोस्ट के ‘‘ऑपरेशन 136’’ में देश के कई नामचीन मीडिया संस्थान सत्ताधारी दल के लिए चुनावी हवा तैयार करने को राज़ी होते नज़र आ रहे हैं.
कोबरापोस्ट ने ‘ऑपरेशन 136’ का अभी पहला भाग जारी किया है जिसमें कुल 16 मीडिया संस्थानों के नाम सामने आए हैं. इनमें दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, अमर उजाला, इंडिया टीवी, सब नेटवर्क, डीएनए (डेली न्यूज एंड एनालिसिस) और यूएनआई जैसे बड़े नाम शामिल हैं. इनके अलावा स्कूप व्हूप, रेडिफ डॉट कॉम, 9एक्स टशन, समाचार प्लस, एचएनएन लाइव 24×7, स्वतंत्र भारत, इंडिया वॉच, आज हिंदी डेली, साधना प्राइम न्यूज को भी सौदेबाजी में लिप्त पाया गया है. इन सभी मीडिया संस्थानों से जुड़े बड़े पदों पर काबिज लोगों की बातचीत के अंश खुफिया ऑपरेशन में दिखाए गए हैं.

कोबरापोस्ट ने ‘ऑपरेशन 136’ के नाम से किए गए स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से मीडिया जगत के उस स्याह पक्ष का पर्दाफाश किया है जहां कहा जाता है कि पैसों के लिए देश का मीडिया अपनी आवाज और कलम का भी सौदा कर सकता है. कुछ संस्थानों के मालिकों और कर्मचारियों ने बताया कि वे स्वयं संघ से जुड़े रहे हैं और हिंदुत्ववादी विचारधारा से प्रभावित हैं लिहाजा उन्हें इस अभियान पर काम करने में खुशी होगी.

देशभर में आंदोलन करने वाले किसानों को माओवादियों द्वारा उकसाए हुए बताकर सरकार की नीतियों का महिमामंडन करने के लिए भी ये सहमत हो गए. तो वहीं, न्यायपालिका के फैसलों पर प्रश्नचिन्ह लगाकर लोगों के सामने पेश करने में भी इनको कोई गुरेज़ नहीं था. साथ ही, विपक्ष और विपक्षी दलों के बड़े नेताओं का दुष्प्रचार करके चरित्र हनन करने और उनके खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाकर उनकी छवि को धूमिल करके सत्तारूढ़ दल के पक्ष में माहौल बनाने की सौदेबाजी का भी खुलासा हुआ है. यहां तक की सत्ताधारी पार्टी के लिए इन लोगों ने पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को दांव पर रखते हुए नागरिक स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने वालों के खिलाफ खबरें बनाने पर भी अपनी रजामंदी जाहिर की.

कोबरापोस्ट के लिए पूरी तहकीकात पत्रकार पुष्प शर्मा ने श्रीमद् भगवत् गीता प्रचार समिति, उज्जैन का प्रचारक बनकर और खुद का नाम आचार्य छत्रपाल अटल बताकर की. इस दौरान देश के करीब तीन दर्जन बड़े मीडिया संस्थानों के वरिष्ठ और जिम्मेदार अधिकारियों से उन्होंने मुलाकात की और एक खास तरह का मीडिया कैंपेन चलवाने के लिए 6 से 50 करोड़ रुपये तक का अपना बजट बताया।

(साभार: द वायर)


खबर का लिंक - http://thewirehindi.com/38449/cobra-post-operation-136-alleges-paid-news-agenda-by-indian-media/

(इसे कोई अखबार और चैनल आपको नहीं बताएगा। इसलिए अपने लोगों और आम जन को खबरदार करने के लिए यह खबर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें)

Tuesday, 27 March 2018

मजीठिया: श्रम मंत्री गंगवार से की पीड़ित पत्रकारों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग


आज पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मजीठिया वेजबोर्ड और पत्रकारों की नौकरी को लेकर आ रही दिक्कतों के बारे में केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार से उनके कार्यालय श्रम शक्ति भवन, नई दिल्ली में मिलकर उन्हें अवगत कराया कि देशभर में 20 हजार से अधिक मीडिया कर्मियों को मजीठिया लागू करने और इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की मांग करने पर नौकरी से निकाल दिया गया है और उन्हें पिछले तीन साल में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा है. इस संबंध में मंत्री जी को दिए एक ज्ञापन में मीडिया कर्मियों के हो रहे उत्पीड़न को खत्म करने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाए जाने की मांग की गई है. मंत्री जी से चर्चा के दौरान मीडिया कर्मियों की नौकरी, मजीठिया वेज बोर्ड और अखबार मालिकानों के श्रमिक विरोधी रवैये पर विचार विमर्श हुआ।
बातचीत की शुरुआत हुई इस बात के साथ कि मंत्री जी जल्द ही सभी राज्यों लेबर कमिशनरों के साथ मजीठिया को लेकर बैठक करें जिसमे पत्रकारों की भी भागीदारी हो। लेबर कमिशनरों के जरिए मालिकानों को नोटिस भिजवाया जाए और शपथ पत्र के साथ जवाब लिया जाये कि उनके संस्थान में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वर्कर को वेतन दे रहे हैं या नहीं। अगर दे रहे हैं तो वेतन पर्ची संलग्न करें।अगर वेज बोर्ड से कम वेतन दे रहे हैं, तो ऐसा क्यों?
दूसरी बात यह हुई कि अगर अख़बार मालिकान वेज बोर्ड के अनुसार वर्कर को वेतन नहीं दे रहे हैं, तो उन पर लगने वाली जुर्माने की राशि बढ़ाई जाए और साथ में सजा अनिवार्य हो।
तीसरी बात यह हुई कि मजीठिया के केस के निपटारे के लिए राज्यों में एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया जाये, जिसमे प्रति दिन केस की सुनवाई हो और 3 माह में केस निपटाने की मियाद तय की जाए। अभी हालत यह है कि डी एल सी केस को रोक कर बैठ जाते हैं, फिर लेबर कोर्ट का रवैया भी ऐसा ही होता है। इस स्थिति में वर्करो को समय से कुछ नहीं मिलेगा।
चौथी बात यह हुई कि पत्रकार जब साल और दो साल के कॉन्ट्रैक्ट में बंधकर काम करेंगे, तो उन्हें रिन्यूअल का डर हमेशा सताता रहेगा, ऐसी स्थिति में कोई पत्रकार ईमानदारी से काम नहीं कर सकेगा। वह हमेशा वही करेगा, जो मालिक कहेगा। सच्ची पत्रकारिता उससे नहीं हो पाएगी, इसलिये मीडिया हाउसेज से कॉन्ट्रैक्ट की प्रथा खत्म हो।
पांचवीं बात यह हुई कि जब मजीठिया आयोग पर काम हो रहा था, उसके बाद दो वेतन आयोग आ गए और वे कहीं कहीं लागू भी हो गए, पर हमारा वेतन आयोग अभी भी लागू नहीं हुआ। मांगने पर नौकरी अलग से चली जाती है।बावजूद इसके पत्रकारों के लिए नए वेतन आयोग का गठन हो, क्योंकि बहुत जगह सातवां वेतन आयोग का फायदा लोगों को मिल रहा है।नए वेज बोर्ड में पिछली खामियों को पूरी तरह दूर किया जाये और उसे स्पष्ट किया जाये।
छठी बात यह हुयी कि वेज बोर्ड में पहले सिर्फ प्रिंट मीडिया के लोग ही हक़दार होते थे। ऐसा इसलिए कि जब wja बना था तब इलेक्ट्रानिक मीडिया में रेडियो और दूरदर्शन आता था और ये सरकारी थे। अब गैर सरकारी चैनल, रेडियो तथा इंटरनेट आ गए हैं, तो अब इन्हें भी उसमें शामिल किया जाये।
अंत में पेंशन की बात हुई कि हमें नौकरी तक पैसे कटवाने के बाद भी 13 सौ रुपये मिलते हैं, जो सही नहीं है।
मंत्री जी और उनके सचिव ने एक बात कही क़ि हमने इनसे जुड़ी कुछ चीजें अपनी साइट पर डाली है। आप सब उसे देखें और हमें सुझाव दें। हम इनके साथ ही उस पर भी काम करेंगे और आप सब फिर आइए, मुद्दे दीजिये। हम हर संभव काम करेंगे।

#MajithiaWageBoardsSalary, MajithiaWageBoardsSalary, Majithia Wage Boards Salary

Saturday, 24 March 2018

SC ने HT ग्रुप की मालकिन शोभना भरतिया पर सवा लाख रुपये का हर्जाना ठोका

दैनिक हिन्दुस्तान फर्जी संस्करण और 200 करोड़ का सरकारी विज्ञापन घोटाला

सुनवाई की अगली तारीख 16 अप्रैल



श्रीकृष्ण प्रसाद [अधिवक्ता]। सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च 2018 को एक ऐतिहासिक आदेश में मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्ज लिमिटेड की चेयरपर्सन व पूर्व कांग्रेस सांसद शोभना भरतिया को सवा लाख रुपये की हर्जाना राशि के भुगतान का आदेश दिया है। मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्ज लिमिटेड कंपनी देशभर में हिंदी समाचार दैनिक हिन्दुस्तान का प्रकाशन करती है ।

हर्जाना-राशि से एक लाख रुपये नई दिल्ली के अरूणा   आसिफ अली मार्ग, 1811, स्थित वार विडोज एसोसिएशन (शहीदों की विधवाओं की संस्था) और पच्चीस हजार रुपये रेस्पोन्डेन्ट नं. 2 मन्टू शर्मा को भुगतान करने का आदेश पीटिशनर शोभना भरतिया को कोर्ट ने दिया।

सुप्रीम कोर्ट के माननीय जज जे चेलामेश्वर और माननीय जज संजय किशन कौल की पीठ ने 16 मार्च को दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह आदेश सुनाया और सुनवाई की अगली तारीख 18 अप्रैल निर्धारित की।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 मार्च को पारित अपने आदेश में लिखा है कि ‘कोर्ट अनुभव करता है कि स्पेशललीव पीटिशन (क्रिमिनल) 1603/2013 , जो अब क्रिमिनल अपील नं. 1216/2017 है, में पीटिशनर  को अपने वरीय अधिवक्ता की अनुपस्थिति में बहस के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थीं, इसलिए कोर्ट रेस्पोन्डेन्ट नं. 2 मन्टू शर्मा की क्षतिपूर्ति के लिए पीटिशनर शोभना भरतिया को सवा लाख रुपये की हर्जाना राशि के भुगतान का आदेश दिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में आगे लिखा है कि ‘गत 18 जनवरी 2018 को भी न्यायालय में बहस इसलिए स्थगित कर दी गई थीं, क्योंकि पीटिशनर शोभना भरतिया के विद्वान वरीय अधिवक्ता न्यायालय में अनुपस्थित थे। रेस्पोन्डेन्ट नं. 02 के विद्वान वरीय अधिवक्ता (श्रीकृष्ण प्रसाद) ने न्यायालय से प्रार्थना की थीं कि मुकदमे का निबटारा त्वरित होना चाहिए। न्याय का तकाजा था कि कोर्ट ने पीटिशनर शोभना भरतिया और रेस्पोन्डेन्ट नं. 01 बिहार सरकार को न्यायालय में अपना-अपना पक्ष रखने के लिए 14 मार्च 2018 की अगली सुनवाई तिथि निर्धारित की थीं ।

रेस्पोन्डेन्ट नं. 2 मन्टू शर्मा की ओर से बहस में हिस्सा ले रहे वरीय अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने न्यायालय से बहस में हिस्सा न लेने के लिए पीटिशनर शोभना भरतिया पर बड़ा हर्जाना लगाने और उनका और बिहार सरकार  का पक्ष सुन लेने की प्रार्थना की। अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद ने कोर्ट को सूचित किया कि पीटिशनर इस मुकदमे में सुनवाई से कतरा रही है और रेस्पोन्डेन्ट नं. 02 मन्टू शर्मा के अधिवक्ता नई दिल्ली से लगभग दो हजार किलोमीटर दूर बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय से हर तिथि पर सुप्रीम कोर्ट में विगत पांच वर्षों से कोर्ट की कार्रवाई में हिस्सा लेते आ रहे हैं और सुनवाई लगातार टलती जा रही है ।

जिन विद्वान अधिवक्ताओं ने 16 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में बहस में हिस्सा लियाः  सुप्रीम कोर्ट में 16 मार्च को बहस के दौरान पीटिशनर शोभना भरतिया की ओर से विद्वान वरीय अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, रंजीत कुमार, सिद्धार्थ लुथरा, आरएन करंजावाला, संदीप कपूर, देवमल्य बनर्जी, विवेक सूरी, एएस अमन, वीर इन्दरपाल सिंह संधु, मनीष शर्मा, अविरल कपूर, करण सेठ, आई खालिद, माणिक करंजावाला, कार्तिक भटनागर, रेस्पोन्डेन्ट नं. 1 बिहार सरकार की ओर से विद्वान अधिवक्ता ईसी विद्यासागर और मनीष कुमार और रेस्पोन्डेन्ट नं. 2 मन्टू शर्मा की ओर से विद्वान वरीय अधिवक्ता श्रीकृष्ण प्रसाद (मुंगेर, बिहार)। शकील अहमद, प्रत्युष प्रातीक, उत्कर्ष पांडेय और राजकिशोर चौधरी (एओआर) ने भाग लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने शोभना भरतिया और बिहार सरकार को बहस में अपना पक्ष रखने का अंतिम मौका दिया। इस बीच बिहार सरकार ने अचानक दैनिक हिन्दुस्तान के कथित अवैध मुंगेर संस्करण सहित अन्य जिला बार संस्करणों  में सरकारी विज्ञापनों के प्रकाशन पर रोक लगाई दी।

अठारह जनवरी (2018) को बहस की निर्धारित तिथि पर पीटिशनर शोभना भरतिया और बिहार सरकार के विद्वान अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति को सुप्रीम कोर्ट ने काफी गंभीरता से लिया है और कोर्ट ने अपनी गहरी नाराजगी प्रकट की है। सुप्रीम कोर्ट ने 18 जनवरी  को पारित अपने आदेश में अपनी नाराजगी प्रकट करते हुए निम्नलिखित आदेश पारित किया है।

Friday, 23 March 2018

पत्रकारों के कमजोर होने से कमजोर होगा लोकतंत्र: सरकार

नई दिल्ली, 23 मार्च। सरकार ने आज स्वीकार किया कि मीडिया संस्थानों में पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों को अनुबंध पर नौकरी और मजीठिया वेतनबोर्ड के क्रियान्वयन न होने का मामला वाकई में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर कर रहा है तथा इसके समाधान के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है।

केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष गंगवार ने यहां एक कार्यक्रम में नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट और दिल्ली जर्नलिस्ट एसाेसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को सम्मानित किया। कार्यक्रम में जल संसाधन एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल एवं सांसद धर्मेन्द्र कश्यप भी मौजूद थे।

कार्यक्रम में देश के जाने-माने पत्रकारों ने मंत्रियाें को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कामकाज की दशाअों की जानकारी दी। वयोवृद्ध पत्रकार एवं एनयूजे आई के संस्थापक सदस्य राजेन्द्र प्रभु, के एन गुप्ता, विजय क्रांति ने कहा कि ठेके पर नौकरी के चलन ने पत्रकारों एवं पत्रकारिता को कमजोर कर दिया है। पत्रकारों को सामाजिक सुरक्षा नहीं है और उनका जीवन अनिश्चितता से भरा है। सरकार को इन विसंगतियों को दूर करने के लिए कुछ करना चाहिए। महिला पत्रकारों ने भी अपनी दिक्कतों से उन्हें अवगत कराया।

इस असवर पर गंगवार ने मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को सुचारु रूप से लागू करने, पत्रकारों की समस्याओं को दूर करने और उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें मीडिया संस्थानों में पत्रकारों को अनुबंध पर नियुक्त करने, मजीठिया वेतन बोर्ड को लागू करने से जुड़ी दिक्कतों और पत्रकारों की अन्य समस्याओं से अवगत कराया जाता रहा है। वह पत्रकारों की दिक्कतों काे दूर करने को लेकर काफी संजीदा है और इस बारे में चर्चा करने के लिए हमेशा उपलब्ध हैं। उन्होंने अगले सप्ताह पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों को वार्ता के लिए अपने कार्यालय में आमंत्रित भी किया।

केन्द्रीय श्रम मंत्री ने कहा कि वह असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की समस्याओं को लेकर बहुत गंभीर हैं। देश में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ लोगों को राहत एवं सुरक्षा देने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार श्रम कानूनों को तर्कसंगत बनानेे के लिए प्रतिबद्ध है और वह 40 कानूनों को मिला कर चार कानून बनाने वाली है जिनमें श्रमजीवी पत्रकारों से जुड़े मामलों का विशेष ध्यान रखा जाएगा।

मेघवाल ने माना कि यदि पत्रकार स्वतंत्र, सुरक्षित एवं निर्भीक नहीं रहेंगे तो लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं रहेगा। उन्होंने स्वीकार किया कि संसद की विभिन्न समितियों की बैठक में ठेके पर नौकरियों एवं मजीठिया वेतन बोर्ड का मामला आता रहा है लेकिन पहले यह उतना गंभीर नहीं लगा लेेकिन आज उन्हें इसकी गंभीरता का अहसास हुआ है। वह मानते हैं कि निश्चित रूप से पत्रकार समाज की सूरत में बदलाव आना चाहिए और सरकार इसके लिए गंभीरता से विचार करेगी।

गंगवार और मेघवाल ने इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र प्रभु, अच्युतानंद मिश्र और अन्य पत्रकारों को सम्मानित किया। इनमें प्रभु, गुप्ता, हेमंत विश्नोई, रवीन्द्र अग्रवाल, यूनीवार्ता के विशेष संवाददाता एवं यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष राजकुमार मिश्रा, एनयूजे आई के अध्यक्ष अशोक मलिक, महासचिव मनोज वर्मा, कोषाध्यक्ष राकेश आर्य, पाँच्यजन्य के संपादक हितेश शंकर, दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष मनोहर सिंह, महासचिव प्रमोद कुमार आदि शामिल थे।

(साभार: वार्ता)


#MajithiaWageBoardsSalary, MajithiaWageBoardsSalary, Majithia Wage Boards Salary