Saturday, 28 August 2021

खंडवा में भी लहराया मजीठिया का परचम, पीयूष पंडित ने जागरण को दी पटकनी

मात्र 6 माह में आया ऐतिहासिक फैसला 

इंदौर के बाद खंडवा में मजीठिया मामले में एक पत्रकार को विजयश्री प्राप्त हुई है। खंडवा में मजीठिया मामले में विजयश्री प्राप्त करने वाले पहले पत्रकार पीयूष पंडित बने हैं। उनके पक्ष में माननीय न्यायालय ने 9.26000 रुपए का अवार्ड पारित किया है।

उक्त जानकारी देते हुए मजीठिया क्रांतिकारी धर्मेन्द्र हाडा ने बताया कि खंडवा के  पीयूष पंडित ने बड़वानी में मजीठिया के बकाया वेतन के लिए कोर्ट में शरण ली थी। इस मामले में  श्रम न्यायालय बड़वानी ने मजीठिया वेज बोर्ड के प्रकरण में पीयूष पंडित के पक्ष में अवॉर्ड पारित किया है। इस अवार्ड में विजश्री प्राप्त करने में वरिष्ठ अभिभाषक  सूरज आर. वाडिया की अहम भूमिका रही है।  वाडिया ने इंदौर से लगातार खंडवा के एडव्होकेट सोलंकी के सम्पर्क रहे। वाडिया ने पीयूष पंडित के ए़डव्होकेट सोलंकी को इंदौर से अपने तैयार किए दावे, बयान और क्रास की कापी उपलब्ध करवाई थी, जिसके आधार पर बड़वानी के माननीय श्रम न्यायालय ने पीयूष पंडित के मजीठिया वेतनमान के बकाया वेतन अंतर व अन्य लाभ के लिए 9,26000 रुपए का अवॉर्ड पारित करते हुए एक माह में संपूर्ण राशि का भुगतान करने का आदेश दिया।  इस केस में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पीयूष पंडित ने मात्र 6 माह में मजीठिया के केस में विजयश्री प्राप्त कर इतिहास रचा है।   पूरी जानकारी अवॉर्ड की कॉपी प्राप्त होने के बाद के बाद आपके समक्ष आ जाएगी। हाडा शीघ्र कापी उपलब्ध कराएंगे। इस विजय पर बड़वानी के एडव्होकेट सोलंकी, इंदौर के वरिष्ठ अभिभाषक सूरज आर. वाडिया व पीयूष पंडित को मजीठिया क्रांतिकारियों ने बधाई दी है। 

Saturday, 7 August 2021

मजीठिया का केस जीतने वाले बेरोजगार महेंद्र सेंगर बनेंगे लखपति


बेरोजगारी और आर्थिक रूप से परेशान वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र सेंगर ने मजीठिया के केस में विजयश्री प्राप्त कर ली है। अब वे लखपति की श्रेणी में आने वाले हैं, क्योंकि मजीठिया के बकाया वेतन की राशि के रूप में उन्हें 313156 रुपये मिलेंगे।

वरिष्ठ अभिभाषक वाडिया व नई दुनिया के मजीठिया क्रांतिकारी धर्मेंद्र हाडा ने बताया कि इंदौर नई दुनिया इंदौर में जूनियर सब एडिटर के पद पर 2012 तक पदस्थ रहे महेंद्र सिंह सेंगर ने मजीठिया बकाया वेतनमान के लिए कोर्ट की शरण ली थी, जिस पर इंदौर श्रम न्यायालय के न्यायाधीश ने 23 जुलाई को अवार्ड पारित कर सेंगर को बकाया वेतन अंतर एवं अन्य लाभ 11-11-2011 से अक्टूबर 2012 तक का 2,86,756 एवं अंतरिम राहत राशि जनवरी 2010 से अक्टूबर 2011 तक का रुपये 26,400 के साथ ही वाद व्यय 3,000 रुपये देने का निर्णय सुनाया है। ये अवॉर्ड की संपूर्ण राशि एक माह में महेंद्र सिंह सेंगर को देने के आदेश कार्ट ने दिया है।


नहीं थे केस लगाने के पक्ष में

आपको बता दें कि महेंद्र सेंगर मजीठिया वेतन मान का बकाया वेतन पाने के लिए केस लगाने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें मेरे व्दारा बार-बार समझाया गया, लेकिन वे मानते नहीं थे। उनका कहना था मात्र 2-3 साल का मजीठिया बकाया क्या मिलेगा। जब उन्हें समझाया गया कि 1-2 लाख रुपये मिल सकता है तो बड़ी मुश्किल से माने और उसके बाद उन्हें वाडियाजी से मिलवाकर मजीठिया का केस दायर किया गया। इसके बाद भी सेंगर तारीख पर जाने में आना-कानी करते थे, क्योंकि नौकरी छूटने के बाद वे आर्थिक रूप से कमजोर हो चुके थे। उन्हें समझाया गया कि आप को जब पैसा मिलेगा तभी वरिष्ठ अभिभाषक वाडिया को पैसा देना आप केस तो पूरी जी-जान से लड़ो। उसके बाद सेंगर ने बयान दिए और क्रॉस भी किया और आज नतीजा यह रहा कि सेंगर करोड़पति बनने की डगर पर खड़े हैं। 


इन साथियों ने की थी आर्थिक मदद

सेंगर नौकरी नहीं होने से बेरोजगारी में जीवन यापन कर रहे थे और मानसिक रूप से टूट चुके थे। उनकी आर्थिक दशा को लेकर इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष अरविंद तिवारी से भी चर्चा की गई थी, उसके बाद उन्होंने उन्हें आर्थिक रूप से मदद और राशन कीट उपलब्ध कराई थी। इतना ही नहीं वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा और अंकुर जायसवाल व प्रवीण खालीवाल से भी उन्हें राशन की मदद दिलाई थी। अतः साथियों मजीठिया भले ही कितने भी वर्ष का हो उसे केस लगाकर अपना अधिकार प्राप्त होने से पीछे ना हटे। क्योंकि मजीठिया का पैसा मिलना है और इसे लेने से हमें कोई रोक नहीं सकता। अब सेंगर के केस में आरआरसी जारी करने की कार्रवाई एक माह बाद की जाएगी। अवार्ड की कापी धर्मेंद्र हांडा शीघ्र उपलब्ध कराएंगे जो आपके सामने होगी।

प्रमोद

Friday, 23 July 2021

No Tears should be shed for Raids on DB Corps

-By Parmanand Pandey

It is really painful to see the monumental ignorance of some journalists, who have been orchestrating that the IT raids on the offices and residences of the owners of DB Corps are attacks on the ‘freedom of speech and expression’. It is an open secret that most of the big media houses in India are corrupt to the core and they are the past masters of exploitation of their employees. There is hardly any exception; be it the BennetColeman and Company, HT Media Ltd., Indian Express Newspapers Group, the Hindu, Eenadu, Anand Bazar Patrika, Dainik Jagran, Amar Ujala, Dainik Bhaskar, Deccan Chronicle, Matribhumi, Deccan Herald, Rajasthan Patrika or any other group. Albeit two medium newspapers; The Tribune of Chandigarh and The Assam Tribune of Guwahati can certainly be considered to be exceptions. Dainik Bhaskar is one of the worst exploiters and it has ruined the lives of hundreds of employees, most of them happen to be journalists. I do not say on the basis of any hearsay but on personally experienced facts. When the Majithia Wage Board recommendations were notified, there was a provision of 20 J, which said that those employees, who were getting more wages than what was prescribed in the Wage Board, could enter into an agreement with their management that they would not claim for the WageBoard wages. A time limit was prescribed for that individual agreement. 

Lo and behold, when all employees began asking for the Wage Board wages, they were called by the managers to sign the management prepared agreements from the backdate. The language of all agreements was identical. Employees were asked to give in writing that they would not ask for the wages according to the Wage Board, although these employees were getting much less than the wage board recommendations. All the government officials knew about the forgery of the agreements, but they were hugely bribed by the managements that they preferred to keep mum. This has happened in the majority of newspapers, but the owners of language newspapers (what they say Vernacular newspapers) have been the biggest culprits. They have been bending and slaughtering the rules and laws with gay abandon. The meaning of freedom of speech and expression has been converted into a big joke. Their semi-literate editors vie with each other in proving their loyalty to their masters and contriving the ways and means of exploitation of employees for their benefit.  Dainik Bhaskar, Dainik Jagran, Amar Ujala and Rajasthan Patrika are the known offenders. They are the blots on journalism. They have not thought even for a moment about the employees while victimizing them.

Many of the journalists working in Dainik Bhaskar were transferred from Delhi to far off and remote places of Bihar, Bengal or Tamilnadu, where people have not even heard the name of the newspaper. The journalists working for the print medium were/are shown to be the employees of the digital platform, where the Wage Board is not applicable. Nobody can tell what has been the contribution of Dainik Bhaskar Dainik Jagran in the development of healthy journalism? These newspapers have been encouraging the journalists to become pimps/ blackmailers/ advertisement collectors. They have brought down the image and credibility of journalism in the eyes of the public because of their unscrupulous conduct. These newspapers have built huge empires mainly because of the blackmailing, browbeating and nefarious connections with politicians and bureaucrats. There is another question whether these media houses owners should be left to openly violate the law? No action should be taken against them even if they are evading taxes? Can they be allowed to slay the labour laws to the detriment of poor employees? Can they grab the advertisements at exorbitant rates and fleece the public exchequer? It does not mean that the governments' officials are lily-white. Accepted that they are equally or more corrupt, but it does not provide any immunity to these media houses. 

Therefore, no tears should be shed for these media houses, which have been using their organs for their enrichment and aggrandisement behind the veneer of the freedom of speech and expression. Such Media houses should be shamed and not sympathised.

Thursday, 22 July 2021

दैनिक भास्कर के कई ठिकानों पर इनकम टैक्स का छापा, कर चोरी का आरोप, मजीठिया न देने पर चुप रहने वाली संसद ठप


इंदौर/भोपाल/जयपुर। खुद को देश का सबसे बड़ा मीडिया समूह बताने वाले दैनिक भास्कर के कई ठिकानों पर इनकम टैक्स का छापा पड़ा है। यह छापामार कार्रवाई दैनिक भास्कर ग्रुप के मप्र, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान के ऑफिसों में एक साथ हुई है। ग्रुप के मालिक व संचालकों के आवास पर भी कार्रवाई की गई है। इस घटनाक्रम को लेकर बृहस्पतिवार को संसद में विपक्ष ने हंगामा जिसके बाद सदन की कार्रवाई ठप हो गई जहां मीडिया घरानों द्वारा पत्रकारों मजीठिया वेतनमान नहीं देने पर चुप्पी साध ली जाती रही है।  

हिंदी अखबार दैनिक भास्कर समूह (डीबी कॉर्प लिमिटेड) के सभी ऑफिसों पर छापे की कार्रवाई आयकर विभाग की इन्वेस्टिगेशन विंग कर रही है। अल सुबह एक साथ सभी दफ्तरों में छापे डाले गए। सुबह 5 बजे शुरू हुई कार्रवाई समाचार लिखे जाने तक जारी रही। इस दौरान भोपाल स्थित भास्कर के मालिक सुधीर अग्रवाल सहित सभी संचालकों के निवास के साथ ही ऑफिसों में सर्चिंग शुरू की गई। इस दौरान ऑफिस में मौजूद कर्मचारियों के फोन छीन लिए गए। किसी को भी अंदर से बाहर निकलने और बाहर से अंदर आने पर रोक लगा दी गई।

मीडिया रिपोर्ट और न्यूज एजेंसियों के अनुसार आयकर विभाग ने यह कार्रवाई कर चोरी के आरोप के चलते कर रही है। इसके तहत दैनिक भास्कर के नोएडा, भोपाल, इंदौर, मुंबई और पटना समेत देश के स्थानों पर स्थित ऑफिसों में यह छापेमारी चल रही है। समूह के मालिकों के आवासों पर भी कार्रवाई की गई। राजस्थान में जयपुर स्थित हेड ऑफिस पर भी कार्रवाई जारी है। पता चला है कि यहां आयकर विभाग के लगभग 35 अधिकारी दस्तावेजों की छानबीन कर रहे हैं। अहमदाबाद में भी कार्रवाई की खबर है। अखबार के मालिकों से ईडी पहले भी पूछताछ कर चुकी है।


दिल्ली-मुंबई की टीमें कर रहीं कार्रवाई

बताया जा रहा है कि दैनिक भास्कर द्वारा आयकर विभाग को समूह की ओर से जो दस्तावेज दिए गए वे संतोषजनक नहीं थे। इससे कर चोरी की आशंका होने पर ही छापे की कार्रवाई दिल्ली और मुंबई की टीमों द्वारा की गई। हालांकि आयकर विभाग अथवा उसके नीति-निर्माण निकाय, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) की ओर से इस संबंध में किसी प्रकार की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। दफ्तरों और मालिक के निवास के बाहर सीआरपीएफ के अलावा स्थानीय पुलिस भी तैनात की गई है। जैसे ही छापे की खबर लगी प्रबंधन ने अपनी डिजिटल विंग को घर से ही काम करने के लिए कह दिया गया।


कई अन्य कारोबारों से भी जुड़ा है दैनिक भास्कर समूह

दैनिक भास्कर समूह मीडिया बिजनेस के अलावा कई अन्य कारोबार से भी जुड़ा है। बताया जा रहा है कि प्रमुख हिंदी मीडिया समूह के प्रमोटर भी शामिल हैं। वजह यह कि इन प्रमोटरों के माध्यम से कई राज्यों में दैनिक भास्कर का अलग-अलग भाषाओं में संचालन किया जाता है। इसके अतिरिक्त डीबी डिजिटल, डीबी पॉवर, माय एफएम रेडियो के अलावा ऑइल, कपड़ा, प्रॉपर्टी के क्षेत्र में भी भास्कर समूह कार्य करता है। ये सभी आयकर के रडार पर हैं।


...कार्रवाई के खिलाफ विपक्ष ने खोला मोर्चा, संसद में किया हंगामा, दोनों सदनों की कार्रवाई स्थगित

दैनिक भास्कर पर हुई आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित संसद में विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया। विपक्ष ने इसे आपातकाल निरूपित करते हुए संसद और राज्य सभा में हंगामा किया। विपक्षी सदस्यों ने राज्यसभा में भास्कर ग्रुप पर इनकम टैक्स विभाग के छापों का विरोध कर नारेबाजी भी की। इसके बाद सदन दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दिया गया। बाद में कार्यवाही शुरू हुई, लेकिन भारी हंगामे की वजह से सदन कल तक के लिए स्थगित कर दिया गया। लोकसभा में भी हंगामा हुआ। यहां फोन टैपिंग और जासूसी का मुद्दा उठा। लोकसभा पहले 4 बजे और फिर कल सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।

इधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, राज्यसभा सदस्य एवं मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी, सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण आदि ने ट्वीट कर ऐतराज जताया है। इन सभी का कहना है कि यह प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ की आवाज दबाने का प्रयास है।


यूपी के भारत समाचार पर भी पड़ा छापा

यूपी के एक टीवी चैनल भारत समाचार पर भी छापे की कार्रवाई की गई। आयकर अधिकारियों की टीम ने इसके लखनऊ स्थित ऑफिस और संपादक के घर तलाशी ली। सूत्रों की मानें तो चौनल की ओर से दिए गए दस्तावेजों के आधार पर टैक्‍स चोरी के पुख्‍ता सबूतों के आधार पर कार्रवाई की गई। कार्रवाई को भारत समाचार की हालिया रिपोर्टिंग में यूपी सरकार की आलोचना किए जाने से जोड़कर भी देखा जा रहा है।


भाजपा विधायक अजय सिंह के घर भी मारा छापा, हड़कंप

बस्ती जिले के हरैया विधानसभा के भाजपा विधायक अजय सिंह के पैतृक गांव लजघटा में भी आयकर विभाग ने छापा मारा। पहुंचते ही पुलिस ने पूरे गांव घेर लिया। विधायक अजय सिंह का एक निजी न्यूज चैनल में कुछ शेयर है। इसी संबंध में उनके घर आयकर विभाग की छापामारी हुई। छापे के दौरान विधायक अजय सिंह मौजूद नहीं थे।


मजीठिया वेतनमान को लेकर न्यायालयों में विचाराधीन हैं कई केस

दैनिक भास्कर समूह देश के उन तमाम मीडिया समूहों में से प्रमुख है जिसके द्वारा अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान का लाभ नहीं दिया जा रहा है। कर्मचारियों की मजीठिया वेतमान की लड़ाई लड़ रहे मप्र पत्रकार-गैर पत्रकार संघ के प्रांतीय महासिचव तरुण भागवत के अनुसार सरकार को दैनिक भास्कर समूह से मजीठिया वेतनमान का लाभ देने के मामले में भी पूछताछ की जानी चाहिए। भागवत के अनुसार मीडिया समूहों को कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान का लाभ 2011 से दिया जाना है जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट 2014 में दिए आदेश में स्पष्ट भी कर चुकी है।

भागवत ने बताया कि देश के हजारों मीडियाकर्मी अपना यह वाजिब हक पाने के लिए श्रम विभाग और न्यायालयों के चक्कर काट रहे हैं। मजीठिया वेतनमान के लिए न्यायालयीन लड़ाई लड़ रहे और प्रताड़ना का शिकार होने वालों में दैनिक भास्कर के कर्मचारियों की संख्या सैकड़ों में है। आश्चर्य तो यह है कि कर चोरी के आरोप में घिरे जिस संस्थान के लिए जो सांसद संसद ठप कर रहे हैं और जो मुख्यमंत्री मातम मना रहे हैं, वे उसी संस्थान द्वारा अपने कर्मचारियों का वाजिब हक मारने पर चुप हैं।

[साभारः acntimes.com]

https://acntimes.com/income-tax-department-raids-several-locations-of-dainik-bhaskar-alleging-tax-evasion-parliament-stalled/


Wednesday, 21 July 2021

जागरण अखबार न ज्वाइन करने पर पछतावा नहीं



जागरण अखबार न ज्वाइन करने पर पछतावा नहीं

धीरे-धीरे मौत के आगोश में जा रहा अमर उजाला!

एक डरपोक और जनविरोधी अखबार की नौकरी से बेरोजगारी भली

अमर उजाला की नौकरी की लेकिन तब यह अखबार ऐसा डरपोक न था!

जनता से अपील, ऐसे डरपोक और जनविरोधी अखबारों को न पढ़ें 


इन दिनों पेगासस स्पाईवेयर को लेकर पूरे देश में हंगामा है। लोकतंत्र का कोई भी खंभा ऐसा नहीं है जिसकी जासूसी न की गयी हो। निजी जानकारियों के आधार पर बड़े-बड़े लोगों को ब्लैकमेल किया गया होगा। क्या ये खबर पेज वन की नहीं है, लेकिन दैनिक जागरण के देहरादून एडिशन में यह खबर पेज 12 पर है। अमर उजाला का भी बुरा हाल है। संपादक दलाल हो गये और गुलामी की जंजीर उन्हें बदतर जीवन दे रही है। भले ही वो रिवाल्विंग सीट पर बैठे हों, लेकिन जब भी आईना देखते होंगे तो उन्हें शर्म महसूस होती होगी कि वो किस कदर अपने जमीर की हत्या कर रहे हैं। पता नहीं ये संपादक अपने बच्चों से नजर कैसे मिलाते होंगे? अपने बच्चों को क्या संस्कार देते होंगे? मैं इसका विरोध नहीं कर रहा कि सरकार की गुलामी या चाटुकारिता न करो। यह व्यवसायिक मजबूरी हो सकती है। लेकिन पेगासस जैसा कांड की खबर पेज एक पर नहीं है तो फिर आप जनता को झूठ परोस रहे हैं। बकवास परोस रहे हैं। 

दैनिक जागरण देख कर क्षोभ हो रहा है। आज मैं बहुत खुश हूं कि मैंने दैनिक जागरण की नौकरी ठुकरा दी। दिल्ली में उन दिनों राजेंद्र त्यागी जी संपादक थे। मेरा चयन उन्होंने किया लेकिन मैंने अमर उजाला में ही रहना मुनासिब समझा। तब उन दिनों 2001-02 में राजेश रपरिया जी अमर उजाला के समूह संपादक थे और मैं गुड़गांव में तैनात था और मारुति में आंदोलन चल रहा था। मैं मारुति प्रबंधन की नजरों में खटक रहा था। हमने मारूति आंदोलन को जमकर कवरेज दी थी। जनहित की बात थी। प्रबंधन राजेश रपरिया जी के पास पहुंचा। लालच दिये लेकिन वो नहीं झुके। कहा, जो सड़क पर हो रहा है तो उसे कैसे न छापें। और आज अमर उजाला की धीमे जहर से मौत हो रही है। यह अखबार धीरे-धीरे मौत की ओर जा रहा है। जागरण को ज्वाइन न करने का आत्मसंतोष आज भी है और अमर उजाला में आ रहे बदलाव से दुखी हूं। एक अच्छे अखबार की मौत हो रही है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार] 

Saturday, 17 July 2021

मजीठियाः फ्री प्रेस ने किया कर्मचारी से समझौता, दबंग दुनिया को नोटिस जारी



मजीठिया मामले में फ्री प्रेस ने अपने कर्मचारी से समझौता कर लिया है। इसका खुलासा शुक्रवार को हुआ है। वैसे समझौते किए हुए करीब दो सप्ताह से अधिक का समय हो चुका है।

समझौते का खुलासा शुक्रवार को स्वयं न्यायाधीश ने फ्री प्रेस के अन्य कर्मचारी के प्रकरण में तारीख पर उपस्थित हुए पक्षकार के सामने करते हुए फ्री प्रेस प्रबंधन से कहा कि जब राजेश प्रजापत के मामले में समझौता हुआ है तो इस प्रकरण का भी निराकरण क्यों नहीं किया जाता है। ज्ञात हो कि इस समझौते के संबंध में हमारे व्दारा 6 माह पूर्व यह बताया गया था कि एक अखबार अपने कर्मचारी से मजीठिया का समझौता करने की तैयारी कर रहा है। वैसे समझौता कितने में हुआ यह अभी खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन यह स्पष्ट हो गया है कि समझौते बतौर कर्मचारी राजेश प्रजापत को चेक फ्री प्रेस प्रबंधन ने दिए हैं। 

इस संबंध में कानूनविदों का कहना है कि मजीठिया मामले में समझौता कर फ्री प्रेस प्रबंधन ने समझदारी का परिचय दिया है। मजीठिया मामले में जितने लेटलतीफी होगी उसका उतना अधिक ब्याज देने का प्रावधान है। अतः समझौता कर फ्री प्रेस प्रबंधन ने मजीठिया मामले में लाखों रुपये वकीलों को लुटाने के साथ ही ब्याज राशि से भी राहत पाई है।


दबंग दुनिया को नोटिस जारी

इधर, दबंग दुनिया अखबार प्रबंधन को मजीठिया केस में फैसला होने के बावजूद एक माह में तीन साथियों को राशि का भुगतान ना  देने पर नोटिस जारी किया गया है। नोटिस में स्पष्ट है कि लेबर कोर्ट के आदेश के बावजूद आपने एक माह की अवधि पूर्ण होने के बावजूद मजीठिया वेतमान का पैसा जमा नहीं कराया है। अतः क्यों ना आपके खिलाफ आरआरसी की कार्रवाई की जाए। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया है कि आरआरसी कार्रवाई में जो हरजाना व खर्च लगेगा उसे वहन करने की जिम्मेदारी आपकी होगी। 


Wednesday, 30 June 2021

अमर उजाला को झटका, लेबर कोर्ट जम्‍मू ने तबादला किया स्‍टे, डाउनलोड करें आर्डर


मजीठिया क्रांतिकारियों के लिए जम्‍मू से एक अच्‍छी खबर है। यहां अमर उजाला के खिलाफ मजीठिया वेजबोर्ड के तहत क्‍लेम लगाने वाले एक साथी को प्रताड़ित करने के लिए किए गए तबादले पर लेबर कोर्ट जम्‍मू ने स्‍टे आर्डर जारी किया है। साथ ही कोर्ट ने संस्‍थान को पिछला वेतन और आगामी वेतन जारी करने के निर्देश भी दिए हैं। प्राप्‍त जानकारी के अनुसार अमर उजाला के जम्‍मू सेंटर में तैनात अमिताभ अरोड़ा ने संस्थान में कार्य करते हुए मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतनमान व एरियर का केस लेबर विभाग में लगाया था और इसी साल मार्च माह में विभाग ने यह मामला वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट की धारा (17-2) के तहत लेबर कोर्ट, जम्‍मू-कश्‍मीर को फैसले के लिए संदर्भित कर दिया था।








जैसे ही कोर्ट में सुनवाई शुरू होने का समन संस्‍थान को मिला, अमिताभ को प्रताड़ित करने के लिए तबादला आदेश जारी कर दिए गए। इतना ही नहीं इन आदेशों में उसे तत्‍काल जम्‍मू के कार्य से हटाने और मुदरादाबाद में ज्‍वाइन करने को कहा गया था। हैरानी की बात यह रही कि जब ये आदेश जारी किए गए, तब पूरे देश में कोरोना के चलते लॉकडाउन चल रहा था। वहीं इन आदेशों से इनके मेलाफाइड होने और कर्मचारी के उत्‍पीड़न की बात साफ साबित हो रही थी।

रिकवरी का मामला पहले ही लेबरकोर्ट में था, इसे देखते हुए न्‍यूजपेपर इम्‍पलाइज यूनियन आफ इंडिया (एनईयूइंडिया) के मार्गदर्शन में अमिताभ की सर्विस कंडिशन बदलने की शिकायत आईडी एक्‍ट की धारा 33ए के तहत लेबर कोर्ट में दायरा की गई और साथ ही मामले की सुनवाई तक तबादला आदेशों को स्‍टे करने की अर्जी भी दाखिल की गई। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुना और अमिताभ के पक्ष को सही पाते हुए 28 जून को स्‍टे आर्डर जारी किया है। इस मामले में कोर्ट ने लॉकडाउन के बावजूद ऑनलाइन सुनवाई की और कर्मचारी को राहत प्रदान की। ज्ञात रहे कि अमिताभ अरोड़ा एनईयूइंडिया का सदस्‍य भी है। यूनियन के सहयोग के चलते ही उन्‍हें यह सफलता हाथ लग पाई है। अक्‍सर तबादलों के मामले में कोर्ट से स्‍टे लेना डेढी खीर होती है।