Sunday, 19 February 2023

दैनिक दिव्य मराठी को सुप्रीम कोर्ट से झटका!



वरिष्ठ पत्रकार सुधीर जगदाले व उनकी टीम का हाईकोर्ट में जमा 1 करोड़ की बकाया राशि को वापस लेने पर रोक


 औरंगाबाद हाईकोर्ट का स्टे आॅर्डर बरकरार !!


जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में डी.बी. कॉर्प को सुप्रीम कोर्ट ने एक झटका दिया है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में डी.बी. कॉर्प के समाचार पत्र दैनिक दिव्य मराठी के मीडियाकर्मियों के  अदालत में जमा पैसे को निकलाने पर बांबे हाईकोर्ट की औरंंगाबाद खंडपीठ द्वारा लगाई गई रोक को माननीय सुप्रीमकोेर्ट ने अगली तिथि तक बरकरार रखा है।  माननीय सुप्रीमकोर्ट की डबल बेंच ने 13 फरवरी 2023 को जारी अपने आदेश में दिव्य मराठी (डीबी कॉर्प) को औरंगाबाद उच्च न्यायालय में जमा 97 लाख 20 हजार 341 रुपये की राशि निकालने पर रोक लगा दी है (मूल रूप से यह राशि आधी ही है, आधी राशि अभी भी दिव्य मराठी के पास शेष है।  दैनिक दिव्य मराठी के कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुधांशु चौधरी ने जोरदार तर्क दिया और कहा कि  औरंगाबाद हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर ही आदेश पारित किया है। मेरिट चेक नहीं हुई। इसके विपरीत, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दृढ़ता से तर्क दिया था  कि योग्यता के आधार पर निर्णय देकर तकनीकी आधार को खारिज कर दिया गया है। डी. बी. कॉर्प के वकील ने तर्क दिया कि राज्य सरकार श्रम पत्रकार अधिनियम की धारा 17 (2) के तहत अपनी शक्तियों को किसी दूसरे को नहीं दे सकती। राज्य सरकार द्वारा बिना अधिकार के 11 मई 2016 को जारी की गई अधिसूचना अवैध है और नागपुर खंडपीठ द्वारा पारित आदेश सही है, मामले को खारिज किया जाना चाहिए। इस पर न्यायाधीश ने कंपनी के वकील से कहा कि चूंकि यह मामला राज्य सरकार का है, इसलिए वे मामले पर उनकी राय सुने बिना कोई आदेश पारित नहीं कर सकते।उसके बाद डी. बी. कॉर्प के वकील ने औरंगाबाद पीठ से सुधीर जगदाले और टीम का बकाया अदालत में जमा पैसा वापस लेने की अनुमति मांगी।  मीडियाकर्मियों  के वकील सुधांशु चौधरी , महेश शिंदे, वात्सल्य वैग्य और प्रशांत जाधव ने इसका कड़ा विरोध किया और स्थगन पर जोर दिया। इस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच के न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और दीपांकर दत्ता ने अगली तारीख तक स्थगन आदेश पारित किया और प्रतिवादी को नोटिस तामील करने का आदेश दिया।


शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

9322411335

Saturday, 11 February 2023

Journalists Thank Dr Sivadasan for Raising the Issue of Journalists in the Parliament

(From left) Parmanand Pandey, Alkshendra Singh Negi, Mahesh Kumar, Dr. V. Sivadasan (beard) and Vivek Tyagi.


New Delhi, 11 Feb. A delegation of the Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) today met the CPI(M) Member of Parliament Dr V Sivadasan here and thanked him for raising the wage board issue of journalists in the Rajya Sabha.  Dr Sivadasan had asked the government about the number of journalists working in print, electronic and online media industry-wise. He also wanted to know what the stage of the constitution of the wage board was and whether the journalists were getting their wages as per the recommendation of the wage board. It is regrettable that on all counts the government has not been able to furnish any convincing reply.

A few years ago, when a similar question was asked about the implementation of the Majithia wage award, the then Labour Minister Santosh Gangwar had replied that some four hundred sixty newspapers had implemented the wage board award but the figure was nowhere near the reality. In fact, even now hardly any newspaper has fully implemented the award. Some twenty thousand newspaper employees have been thrown out of jobs across the country and their only fault has been that they demanded wages according to wage board recommendations from their owners.

The Working Journalist Act covers only print media journalists and non-journalist employees. Those working for Electronic and Web media are not covered under the Act, therefore their wages and other facilities depend on the whims and fancies of the media owners. In some media organisations, the condition of employees is very pathetic, and they are subjected to the worst kind of exploitation. Dr Sivadasan assured the IFWJ delegation that he and his party would continue to support the cause of the working class, but he said that it would gain momentum only when the media persons themselves came forward and led the struggle.

Dr Sivadasn had a lengthy discussion with the delegation about the state of the media industry in the country. He expressed his disappointment that the media employees have, by and large, not been taking part in the struggle of the working class. Among those included in the delegation were Indian Federation of Working Journalists (IFWJ)  Secretary General Parmanand Pandey, Alkshendra Singh Negi and Vivek Tyagi, the President and the General Secretary of the Delhi Union of Working Journalists (DUWJ) respectively and Mahesh Kumar.


-Parmanand Pandey

Secretary-General: IFWJ

Wednesday, 28 December 2022

मजीठिया केस में जवाब देने से भाग रहा अमर उजाला, मिला आखिरी मौका



- यशवंत सिंह

अयोध्या में अमर उजाला के ब्यूरो चीफ/चीफ सब एडिटर धीरेंद्र सिंह की ओर से दायर मजीठिया वेजबोर्ड केस में अमर उजाला प्रबंधन को अपना जवाब देते नहीं बन रहा है। पिछले 6 महीने से कभी क्षेत्राधिकार तो कभी जवाब दाखिल करने के लिए बार-बार समय की मांग से आजिज आकर श्रम न्यायालय ने 11 जनवरी को आखिरी मौका दिया है, अब जवाब दाखिल नहीं हुआ तो वादी को तारीखी खर्च देने के साथ 36 लाख रुपए बकाये की आरआरसी की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

आमतौर पर नौकरी करते वक्त बगैर किसी विवाद के कोई भी पत्रकार अपने संस्थान से वेजबोर्ड मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, लेकिन धीरेंद्र सिंह ने दैनिक हिंदुस्तान में 11 साल के कार्यकाल में सोनभद्र, मऊ और बलिया का ब्यूरो चीफ रहने के दौरान भी वेजबोर्ड के रिकमेंडेशन की मांग की थी जिसे प्रबंधन को स्वीकार करना पड़ा और भुगतान भी करना पड़ा।

2013 में अमर उजाला ज्वाइन करने पर मजीठिया वेजबोर्ड देने का पत्र जारी करने के बाद भी प्रबंधन भुगतान नहीं कर रहा था। अलबत्ता बीते डेढ़ साल से अमर उजाला के स्टाफ को रिजाइन करा कर संवाद न्यूज एजेंसी में आधे वेतन पर ज्वाइन करने के लिए सभी यूनिटों में अभियान चल रहा था। इसके लिए दूरदराज के इलाकों में ट्रांसफर का आदेश जारी किया जा रहा था, फिर मजबूर कर्मचारियों से समझौता करके उन्हें संवाद में ज्वाइन कराया जा रहा था।

अयोध्या के ब्यूरो चीफ धीरेंद्र सिंह का ट्रांसफर भी इसी उद्देश्य से जनवरी 2022 में शिमला ब्यूरो में किया गया लेकिन प्रबंधन की चाल को समझते हुए धीरेंद्र सिंह ने उप श्रम आयुक्त से स्थानांतरण के खिलाफ स्टे आदेश ले लिया। बाद में प्रबंधन ने मजीठिया वेजबोर्ड देने का आश्वासन देते हुए श्रम आयुक्त कार्यालय में समझौता किया। इसके बाद भी मार्च माह में स्थानांतरण आदेश को बदलते हुए आगरा यूनिट में कर दिया लेकिन वहां जाने पर भी मजीठिया वेजबोर्ड देने की जगह दिखाया गया कि आगरा के आसपास के सभी जिलों के ब्यूरो चीफ स्टाफर को संवाद में नहीं शामिल होने पर हटा दिया गया है। दूसरे को संवाद एजेंसी से ब्यूरो प्रभारी बनाया गया है।

सच्चाई का दम भरने वाले और कर्मचारियों के हित की बात करने वाले अमर उजाला के मालिकान की ऐसी अनीति और धोखाधड़ी सभी यूनिटों के जिलों में देखते हुए धीरेंद्र सिंह ने प्रबंधन के आगे झुकने के बजाय मजीठिया वेजबोर्ड के तहत करीब 3600000 बकाया को लेकर बीते जून माह में श्रम आयुक्त कार्यालय अयोध्या में मुकदमा दायर किया।

इसके बाद घबराए प्रबंधन ने क्षेत्राधिकार का मुद्दा उठाते हुए लिखित जवाब दिया कि यह केस आगरा में हो सकता है, अयोध्या में नहीं। प्रत्युत्तर में धीरेंद्र सिंह की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि क्षेत्राधिकार दिल्ली, लखनऊ आगरा और अयोध्या चारों जगह है, लेकिन धीरेंद्र सिंह ने अपने मजीठिया वेजबोर्ड की मांग अयोध्या के कार्यकाल के दौरान 9 साल 6 माह का बकाया मांगा है इसलिए अयोध्या में ही इसकी सुनवाई हो सकती है।

दरअसल अमर उजाला प्रबंधन ने क्षेत्राधिकार का मुद्दा उठाने के पीछे षड्îंत्र रचा था कि श्रम कार्यालय इसे खारिज करता है तो हाईकोर्ट में मामले को लटका देंगे लेकिन श्रम कार्यालय ने अमर उजाला प्रबंधन से मूल केस का जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा कि क्षेत्राधिकार का मुद्दा वाद के अंतिम निस्तारण में तय करेंगे। इसके बाद अमर उजाला प्रबंधन मेरिट पर जवाब देने से भाग रहा है। पिछली 15 दिसंबर की तारीख पर अमर उजाला ने जवाब नहीं तैयार होने की लिखित माफी मांगते हुए और वक्त मांगा तो श्रम कार्यालय सख्त हो गया और चेतावनी देकर अगली तारीख 11 जनवरी को जवाब देने का आखिरी मौका दिया है। अब यदि अमर उजाला ने जवाब नहीं दिया तो मामले में एकतरफा आदेश पारित हो सकता है।


मजीठिया के दो दर्जन और मुकदमे जल्द दाखिल होंगे

रातोंरात अमर उजाला से हटाकर संवाद न्यूज एजेंसी में ज्वाइन कराए जा रहे स्टाफ की ओर से सिर्फ लखनऊ में दो दर्जन से अधिक मुकदमे मजीठिया वेजबोर्ड के तहत दाखिल होने जा रहे हैं। अमर उजाला की कई यूनिटों से भी अयोध्या केस की कॉपियां मंगाई गई हैं। दरअसल वेजबोर्ड का मुकदमा करने के बाद अमर उजाला न ट्रांसफर कर सकता है न ही निकाल सकता है।


ये सावधानियां बरतनी है-

औद्योगिक विवाद की जगह केवल मजीठिया वेजबोर्ड की 17(1) के तहत मुकदमा दाखिल किए जाए। उद्योग विभाग विवाद का मामला लंबा चलता है और ट्रिब्यूनल में जाने के बाद लटक जाता है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से वेजबोर्ड का बकाया का केस जिला स्तरीय एएलसी कार्यालय में दाखिल हो सकता है और वहीं से संक्षिप्त सुनवाई के बाद ही आरआरसी जारी होने का प्रावधान है। इस सच्चाई को जानने वाले पत्रकारों में अब मजीठिया वेजबोर्ड मांगने का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। यह केस करने के बाद प्रबंधन की कोई भी परेशान करने वाली कार्रवाई कोर्ट के निगरानी में आ जाएगी।

[साभारः भड़ास4मीडिया.कॉम]

https://www.bhadas4media.com/jawab-dene-se-bhag-raha-amar-ujala/


Wednesday, 30 November 2022

इतिहास याद रखेगा एक पत्रकार से डर गई सरकार



रवीश को लेकर सरकार का यह डर अच्छा लगा

रवीश जहां खड़ें होंगे, उनके पीछे लाइन दोबारा खड़ी हो जाएगी

यह तो होना ही था। अगस्त में जब अडाणी ग्रुप ने एनडीटीवी के 29.18 फीसदी शेयर अप्रत्यक्ष रूप से खरीद लिए थे तो तभी से कयास लग रहे थे कि रवीश को अब जाना होगा या समझौता करना होगा। सत्ता की चाटुकारिता करने की बजाए रवीश ने इस्तीफा देना बेहतर समझा। एनडीटीवी की प्रेसीडेंट सुपर्णा सिंह ने एनडीटीवी के कर्मचारियों को आंतरिक मेल जारी कर इसकी जानकारी दी। इससे पहले एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय राय और राधिका राय ने भी आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया था।

इतिहास इस बात को याद रखेगा कि सत्ता के सामने निडरता से सच बोलने का साहस दिखाने वाले एक पत्रकार के लिए सत्ता ने पूरा संस्थान खरीद डाला। यानी एक पत्रकार ने पूरी सत्ता झुका दी। जब देश में बड़ी-बड़ी संस्थाएं ढह रही हों तो एक एनडीटीवी का ढहना कोई बड़ी बात नहीं है। जनता में संदेश यह गया है कि सरकार एक पत्रकार से डर गयी। यह डर बहुत अच्छा लगा।

रवीश कुमार प्रकरण से मेरे जैसे पत्रकारों के हौसले और अधिक बुलंद हुए हैं। मेरा लोकतंत्र और जनपक्षधरता में और अधिक विश्वास बढ़ा है। मैं अब और मुखरता और निडरता से भ्रष्ट और जनविरोधी तंत्र पर जोर से प्रहार करूंगा। सच यही है कि कलम की ताकत तलवार की मार से अधिक होती है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

Wednesday, 9 November 2022

मजीठिया की पिच पर दैनिक जागरण क्लीन बोल्ड, देना होगा 57 कर्मियों को ब्याज समेत 21 करोड़


मजीठिया वेजबोर्ड की कानूनी लड़ाई के मैदान पर स्वर्गीय एआर हरीश शर्मा की तैयार पिच पर कर्मियों के मजबूत इरादों, एआर राजुल गर्ग की दमदार पारी और ऐन टाइम पर रविंद्र अग्रवाल की दस्तावेज मांगने की सुझाव रूपी गुगली से जागरण प्रबंधन क्लीन बोल्ड हो गया। अदालत में जागरण द्वारा तैयार किए 20जे के कागजात, जिसे प्रबंधन ने ब्रह्मास्त्र के रूप में इस्तेमाल किया था, बेकार साबित हुए। 17-2 पर भी जागरण हिट विकेट हो गया। 7 साल का संघर्ष सोमवार को नोएडा के 57 कर्मियों के जीवन में मुस्कान लेकर आया और जागरण के लिए ब्याज समेत लगभग 21 करोड़ की देनदारी।

इस संघर्ष की नींव तो 2014 में ही पड़ गई थी, जब दैनिक जागरण ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार कर्मचारियों को मजीठिया बेजबोर्ड का लाभ नहीं दिया। इसके बाद कर्मचारियों ने जागरण प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर संघर्ष का बिगुल बजा दिया था। इसके बाद अवमानना का केस लगाने वाले और पुराने कर्मचारियों को परेशान करने का सिलसिला तेज हो गया। परंतु कर्मचारियों ने हार नहीं मानी और एकजुटता का जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए प्रबंधन की हर ज्‍यादती सहन की। कर्मचारियों ने कड़ी से कड़ी चुनौती और आर्थिक तंगहाली के बावजूद हार नहीं मानी और अपने प्रतिनिधियों का चयन कर लड़ाई जारी रखी। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बीच कर्मचारियों ने डीएलसी स्‍तर पर भी मजीठिया की मांग जारी रखी।

प्रबंधन लगातार दवाब बनाने का प्रयास करता रहा। कर्मचारियों ने 8 जून 2015 को एक मांगपत्र प्रबंधन को सौंपा। इस बीच कर्मचारी काम के दौरान काली पट्टी बांध कर रोष जताते रहे और अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। परिणामस्वरूप 14 जुलाई 2015 को डीएलसी नोएडा में देररात चली वार्ता के दौरान समझौता हुआ, जिसमें अवमानना याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने पर उसे लागू करने की बात कही गई।

लेकिन अंदर ही अंदर खार खाए बैठे जागरण प्रबंधन ने चाल चली और कर्मचारियों को दबाने के लिए 2 महिला कर्मियों को निकाल दिया। इससे भी कर्मचारियों के हौसले डगमगाए नहीं। इसके कुछ दिन बाद ही प्रबंधन ने इष्टदेव, रतन भूषण, विवेक त्यागी, सीपी पाठक, प्रदीप कुमार तिवारी समेत 16 कर्मचारियों को बिना जांच किए सीधे नौकरी से निकाल दिया। इनमें से ज्यादातर कर्मचारियों के प्रतिनिधि थे।

इसका भी असर कर्मचारियों पर नहीं पड़ा और वे प्रबंधन के खिलाफ एकजुट खड़े रहे और वे 2 अक्टूबर 2015 को गांधी जयंती के मौके पर मजीठिया को लेकर एक मांगपत्र देने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति भवन तक गए। इसके बाद आनन-फानन में प्रबंधन ने लगभग 200 कर्मचारियों की गेट पर नो एंट्री लगा दी और कार्यालय के बाहर भारी पुलिस बल तैनात करवा दिया। प्रबंधन यहीं नहीं रूका और नोएडा के 200 कर्मचारियों समेत दिल्ली, हिसार, लुधियाना, जालंधर व धर्मशाला के लगभग 350 कर्मचारियों को अवैध हड़ताल व अन्‍य फर्जी आरोप लगाकर निलंबित कर दिया और फरवरी-मार्च 2016 में अवैध बर्खास्तगी कर दी।

अपनी अवैध बर्खास्तगी के बाद भी कर्मचारियों ने हार नहीं मानी और कानूनी लडाई के मैदान पर वे अंगद की तरह पांव जमाए खड़े रहे। उन्‍होंने मजीठिया वेजबोर्ड के एरियर के अलावा अवैध बर्खास्‍तगी के दो अलग-अलग केस दायर किए जो माननीय श्रम न्‍यायालयों में लंबित थे। इसका सुखद फल सोमवार, 7 नवंबर को नोएडा की माननीय अदालत ने मजीठिया वेजबोर्ड एरियर मामले में 57 कर्मचारियों के पक्ष में अपना फैसला सुनाकर दिया। ज्ञात रहे कि यह फैसला दो भागों में आया है। पहले कोर्ट ने जागरण प्रबंधन के सबसे बड़े मगर खोखले हथियार 20जे को निरस्‍त कर दिया था और कर्मचारियों को मजीठिया वेजबोर्ड व अंतरिम राहत का हकदार माना था। इस फैसले में प्रबंधन को रिकार्ड दाखिल करने के निर्देश दिए थे, जो नहीं माने गए। 

नोएडा लेबर कोर्ट में अभी बाकी कर्मचारियों की सुनवाई जारी है और जल्द ही उनका भी फैसला आ जाएगा। अन्य जगहों के कर्मचारी भी मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे हैं। आशा है, नोएडा लेबर कोर्ट की तरह हर जगह के कर्मचारी विजयी होंगे।

शशिकांत सिंह

वरिष्ठ पत्रकार व आरटीआई कार्यकर्ता

मोबाइल नंबर 9322411335

Tuesday, 1 November 2022

अरूण खरे जी हिंदी पत्रकारिता के एक सशक्त हस्ताक्षर थे!



अरविंद कुमार सिंह-

कुछ देर पहले भाई ओम पीयूष के फोन से खबर मिली कि अरुण खरे जी चुपचाप चले गए। खबर सच थी। फिर भी कुछ जगह फोन किया। फिर फेसबुक पर मुकुंद, सीमा किरणजी, हिमांशु और कई साथियों की पोस्ट देख कर समझ गया कि खबर सच है।

वे हिंदी पत्रकारिता के सशक्त हस्ताक्षर और बेहतरीन दोस्त थे। ऐसे दोस्त, जो सुख में भले न दिखें लेकिन तकलीफ में हमेशा साथ होते थे। अपना नुकसान सह कर भी साथ होते थे। यह सब तजुर्बा से कह रहा हूं क्योंकि दो तीन साल तो हमने साथ काम किया था। बाकी जानता तो जाने कब से था।

2011 में मां के निधन के बाद मन बहुत खिन्न था। अरुण जी ने फोन किया, कहा कि सीधे जबलपुर आ जाइए कुछ दिन दोनों मित्र यहीं रहेंगे। मैं उनके पास गया और उनके सात भेड़ाघाट से लेकर जाने कितनी जगहें देखीं, रानी दुर्गावती की समाधि और बहुत कुछ। पुराने मित्र चैतन्य भट्ट जी भी मिले थे। जो तस्वीर साझा कर रहा हूं उसमें पहली तस्वीर उनके साझ भेड़ाघाट जबलपुर की है।


अरुण खरे और अरविंद कुमार सिंह

वे जहां जिस भूमिका में रहे परफेक्ट काम करते थे। दिल्ली लोकल की जबरदस्त जानकारी थी, राजनीतिक विषयों पर गहरी समझ थी और संसदीय मामलों में भी श्रम से उन्होने एक अलग पहचान बनायी थी। साहित्य, कला और संस्कृति पर भी उनकी समझ बहुत गहरी थी।

उनके संपर्कों का दायरा विशाल था। उन्होने कई पत्रकार साथियों को निखारा और मदद की। बुंदेलखंड के मामले में वे बहुत गहरी समझ रखते थे। मैने उनको कई बार कहा कि एक पुस्तक इस पर लिखिए। टाला नहीं, लेकिन लिखा भी नहीं। दरअसल उनसे लिखवा सकता था लेकिन जिद करके बैठना पड़ता।

चंद माह पहले मैं संसद भवन में था तो उनका फोन आया। हाल चाल के बाद तय हुआ था कि जल्दी वे दिल्ली आएंगे और फिर विस्तार से बात होगी। वे नहीं आये, लेकिन उनके न होने की खबर आयी।

बहुत सी यादें हैं और बहुत कुछ लिखने के लिए भी है। लेकिन लिखा नहीं जा रहा हूं। मन बहुत भारी है। कोई ऐसे भी जाता है अरुण भाई।

[source: https://www.bhadas4media.com/arun-khare-ki-yaad/]

नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार अरुण खरे



मुकुंद मित्र-

अपने बेहद अभिन्न और बड़े भाई अरुण खरे का आज कानपुर ले जाते समय रास्ते में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार कल सुबह बांदा में होगा। हे परमात्मा उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान जरूर देना।


राजू मिश्र-

बांदा जिले के छोटे से नरैनी कस्बे से निकलकर जिला मुख्यालय और फिर राष्ट्रीय राजधानी में कलम का लोहा मनवाने वाले अरुण खरे ने संक्षिप्त बीमारी के बाद आज दुनिया को अलविदा कह दिया।

गोरे थे सो देखने मे बिल्कुल अंग्रेज लगते थे। बाजदफे लोग धोखा भी खा जाते थे। पाठा के जंगलों में सूखे की रिपोर्टिंग करते हुए ऐसे कई वाक्ये हुए। मुफलिसी से लेकर शाहखर्ची तक का लंबा साथ रहा। ट्रेन में बिना टिकट भी चले और टिकट लेकर एसी फर्स्ट क्लास में भी।

बीते दिन आंखों के सामने सपने के मानिंद तैर रहे हैं। कमासिन में हम दोनों ने एक औरत के सती होने का खौफनाक दृश्य देखा। सिगरेट बहुत पीते थे, पीते ही नहीं बल्कि चेनस्मोकर थे। दैनिक कर्मयुग प्रकाश के दिनों में वह पहला पेज देखते थे और हम शहर/ग्रामीण।

कभी कहते कि आकाशवाणी वाले धीमी गति के समाचार पत्रकारों को काहिल बनाने के लिए चलाते हैं, हम कहते कि नहीं, यह तो पत्रकारों के प्रति उनकी सदाशयता है।

तमाम झंझावातों के बावजूद हमारी बरात में वह गए, उनकी बरात में हम। बहुत ही नेक, शरीफ और सह्रदय व्यक्ति थे। मिलनसारिता के तो कहने ही क्या!

रिक्शेवाले या भिखारी को मनमाना पैसा दे देना उनकी फितरत थी, भले ही अपनी खातिर कुछ न बचे।

परमात्मा इस असीम वेदना को सहन करने की भाभी जी और बच्चों को अपार शक्ति दें। अरुण जी आप बहुत याद आएंगे। अंतिम प्रणाम।

[source: https://www.bhadas4media.com/arun-khare-death/]