Wednesday, 30 November 2016

मजीठिया: श्री अम्बिका प्रिंटर्स एन्ड पब्लिकेशंस के लीगल एडवाइजर को सहायक कामगार आयुक्त ने दिखाया बाहर का रास्ता

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मुम्बई के श्री अम्बिका प्रिंटर्स एन्ड पब्लिकेशंस के कर्मचारियों द्वारा कामगार आयुक्त कार्यालय में दायर 17 (1) के रिक्वरी मामले की सुनवाई के दौरान कंपनी प्रबंधन की तरफ से आये लीगल एडवाइजर श्री गोसावी को कर्मचारियो के कड़े विरोध के कारण सुनवाई कक्ष से सहायक कामगार आयुक्त ने बाहर निकाल दिया। दरअसल श्री अम्बिका प्रिंटर्स एन्ड पब्लिकेशन्स की तरफ से सुनवाई के दौरान आये श्री गोसाई को कम्पनी प्रबंधन ने किसी तरह भी इस सुनवाई के लिए अधिकृत पत्र नहीं दिया था और ये लीगल एडवाइजर बिना किसी अधिकृत पत्र के इस सुनवाई में आये थे।

बताते हैं कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले की मुबई के सहायक कामगार आयुक्त सी ए राउत के समक्ष सुनवाई थी। जैसे ही सुनवाई शुरू हुई कम्पनी के लीगल एडवाइजर श्री गोसावी ने कम्पनी का पक्ष रखना शुरू किया। इसपर कर्मचारियो की तरफ से आयी एन यू जे की महाराष्ट्र महासचिव शीतल करन्देकर और निर्भीक पत्रकार तथा आर टी आई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह ने कड़ा एतराज जताया और कहा कि अगर कम्पनी प्रबन्धन ने लीगल एडवाइजर के रूप में 17 (1) के मामले में श्री गोसावी को अधिकृत किया है तो पहले उस अधिकृत पत्र की प्रति दिखाइये। इसपर सहायक कामगार आयुक्त ने श्री गोसावी को अधिकृत पत्र दिखाने को कहा जिसके बाद श्री गोसावी पत्र नहीं दिखा पाये। इस दौरान सहायक कामगार आयुक्त ने गोसावी की उपस्थिति पर कर्मचारियो के एतराज को सही माना और उन्हें बाहर जाने के लिए कह दिया। नाटकीय मोड़ तब आया जब गोसावी ने बाहर जाने से ही इंकार कर दिया और कहा मुझे पुलिस बुलाकर बंद करा दीजिये लेकिन मैं बाहर नहीं जाऊँगा। इसके बाद सहायक कामगार आयुक्त ने भी गोसावी को कह दिया कि अगर आप अभी बाहर नहीं जाएंगे तो मुझे वाकई पुलिस बुलाना पड़ेगा। जिसके बाद ना सिर्फ गोसावी बल्कि कम्पनी के पर्सनल आफिसर ज्ञानेश्वर रहाणे और दूसरे अधिकारियों की भी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी और कम्पनी के लीगल एडवाइजर को कमरे से बाहर जाना पड़ा और तब जाकर सुनवाई शुरू हुई।  



[शशिकांत सिंह]
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335



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मजीठिया: बैलेंससीट मांगने पर डी बी कॉर्प के अधिकारी सुनवाई में ही नहीं आये

सहायक महाप्रबंधक को भी होना था हाजिरहोगी कारवाई

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में डी.बी. कार्प की रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया शेख द्वारा लगाए गए 17(1) के रिकवरी क्लेम मामले में प्रबंधन को अपनी कम्पनी का वर्ष 2007 से 10 तक की बैलैंससीट देनी थी मगर गुरुवार को आयोजित सुनवाई में ना ही डी बी कॉर्प की तरफ से कोई आया ना ही इस सुनवाई में डी बी कॉर्प का कोई वकील ही आया।इसी सुनवाई में डी बी कॉर्प की सहायक महाप्रबंधक (कार्मिक) श्रीमती अक्षता करनगुटकर को भी मुम्बई की सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोषले ने उपस्थित होने का निर्देश दिया था मगर इस सुनवाई में वे भी नहीं आई जिसके बाद डी बी कॉर्प की महिला कर्मचारियों की तरफ से आयी एनयूजे की महाराष्ट्र महासचिव शीतल करंदीकर और मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और मजीठिया सेल के समन्यवयक तथा आर टी आई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह और आलिया एवं लतिका ने कड़ा एतराज जताया और कहा कि ये जानबूझ कर किया गया है ताकि कम्पनी की बैलेंससीट न देना पड़े । इस एतराज को सहायक कामगार आयुक्त ने भी सही माना और कहा कि ये काफी गंभीर मामला है और वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को पूरे मामले की जानकारी देकर आगे की कार्रवाई करेंगी ।आपको बतादें कि डी बी कॉर्प को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कराने के बारे में एक एफिडेविट देने का निर्देश कामगार आयुक्त कार्यालय द्वारा लिखित रूप से दिया गया था मगर उसे भी कंपनी ने नहीं दिया ।और डी बी कॉर्प का रिकार्ड है जितने कर्मचारियो ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन माँगा उनका ट्रांसफर कर दिया जाता है। मगर आलिया और लतिका पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।  

[शशिकांत सिंह]
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
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मजीठिया: डी बी कॉर्प सहित 7 अखबार कंपनियों ने नहीं जमा कराया एफिडेविट

23 अखबार कंपनियों को दिया गया था आदेश   

मीडिया कर्मियों के वेतन, एरियर्स और प्रमोशन्स से जुड़े जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मुम्बई के कामगार उपायुक्त कार्यालय द्वारा 13 अक्टूबर 2016 को एक पत्र लिखकर एक एफिडेविट देने का निर्देश मुम्बई के 23 अखबार कंपनियों को दिया गया था। ये एफिडेविट 300 रुपये के स्टाम्प पेपर पर देना था जिसमे साफ़ तौर पर लिखना था कि आपने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह लागू कर दिया है।इस एफिडेविट को जमा करने की अंतिम तिथि थी 19 अक्टूबर 2016 मगर आज भी मुम्बई में डी बी कॉर्प सहित 7 अखबार मालिकों ने एफिडेविट नहीं जमा किया।

ये खुलासा हुआ है आर टी आई के जरिये। मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट तथा एनयूजे महाराष्ट्र के मजीठिया सेल के समन्यवक शशिकान्त सिंह ने ये खुलासा किया है। कामगार उपायुक्त कार्यालय मुम्बई शहर ने आर टी आई का जवाब दिया है कि 13 अक्टूबर 2026 को इस कार्यालय द्वारा जिन 23 अखबार कंपनियों को पत्र लिखकर उनसे 300 रुपये के स्टाम्प पेपर पर मजीठिया वेज बोर्ड से सम्बंधित और माननीय सुप्रीमकोर्ट के 7-2-2014,28-4 2015,14-3-2016,25-8-2016 और 4 अक्टूबर 2016 के आदेश को संज्ञान में लेते हुए मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिस लागू करने के बारे में एफिडेविट देने के लिए निर्देश दिया गया था उसमें डी बी कॉर्प लिमिटेड, श्री अम्बिका प्रिंटर्स एन्ड पब्लिकेसन्स, दि लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड (इंडिया टुडे गृप ), दि प्रेस ट्रस्ट इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स लिमिटेड, दी हिन्दू, मेसर्स सहाफत डेली, इंडियन नेशनल प्रेस (बॉम्बे प्रेस प्राइवेट लिमिटेड), कुरियर पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड (डेली आफ्टरनून), बेनेट कोलमैन एन्ड कंपनी, इंडियन एक्सप्रेस लिमिटिड, नवाकाल न्यूज पेपर, डिलिजेंट मीडिया कार्पोरेशन, तरुण भारत,आपला महानगर, बॉम्बे समाचार प्राइवेट लिमिटेड, मिड डे इन्फोमीडिया लिमिटिड, राणे प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, प्रबोधन प्रकाशन ,मी मराठी मीडिया लिमिटिड,गुजरात समाचार और उर्दू टाइम्स डेली प्रमुख है। इन अखबार कंपनियों में डी बी कॉर्प सहित सात अखबार कम्पनियों ने अब तक एफिडेविट नहीं दिया।ये कंपनियां हैं डी बी कॉर्प,मिड डे इंफोमेडिया लिमिटेड, गुजरात समाचार,  मी मराठी मीडिया लिमिटेड, उर्दू टाइम्स, आपला महानगर और नवाकाल। इन कम्पनियो के खिलाफ अब सुप्रीमकोर्ट को रिपोर्ट भेजा जा रहा है कि इन सात कम्पनियो ने आपके आदेश की अवमानना की है जबकि जिन अखबारों ने एफिडेविट दिया है उनके एफिडेविट की जांच कराई जा रही है।

[शशिकांत सिंह]
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
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मजीठिया: लीगल प्वाईंट में हम भटकाव के रास्ते पर गये हैं: परमानंद पांडे

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 16 नवंबर को माननीय सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई हुयी। मैनेजमेंट ने अपने भारी भरकम वकीलों की टीम खड़ी कर दी। दैनिक जागरण ने इस बार सिनीयर एडवोकेट अनिल दिवान की सेवा ली। क्या हुआ सुनवाई में बता रहे हैं मीडियाकर्मियों की तरफ से जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट परमानंद पांडे। परमानंद पांडे बताते हैं 16 नवंबर की सुनवाई में एडवोकेट अनिल दिवान ने कहा कि कंटेम्प्ट आफ कोर्ट में काफी छोटा दायरा है। इस दायरे में आपने लीगल इश्यू फ्रेम करने के लिये कह दिया। कंटेम्प्ट में सिर्फ इतना होता है कि आपने कंटेम्प्ट किया या नहीं किया। कंटेम्प्ट में आप लीगल इश्यू लेकर कहां से चले आये। आपने जो लीगल इश्यू उठाया है उसकी कापी आपको देनी पड़ेगी। और आप इस पर सुनवाई नहीं कर सकते हैं। फिर जज ने कहा कि इसको मुझे देखने दिजीये मैं ऐसा कर सकता हूं कि नहीं। उसके बाद इनायडू की तरफ से गोपाल सुब्रमण्यम खड़े हो गये। गोपाल सुब्रमण्यम का व्यवहार काफी बेहतर था। उन्होने कहा कि देखिये हम इनायडू के अपने क्लाईंट से एक बार फिर बात करना चाहते हैं। हम नहीं चाहते हैं कि ये सिर्फ दिखावा हो इंम्पलीमेंटेशन का। बल्की इसे पूरी तरह लागू कराया जाये। इसके लिये मुझे चार सप्ताह का समय दिया जाये। इस पर जज साहब ने उन्हे समय दिया और कहा कि आप अपने क्लाईंट से पूछ कर आईये कि कितना लागू हुआ कितना नहीं। जहां तक अनिल दिवान के तर्क की बात है उनके तर्क में कोई दम नहीं है। क्योकि मजिठिया वेज बोर्ड मामले में अनिल दिवान पहले भी बह कर चुके हैं । उन्होने दो दिन बहस किया। तीन जजों की बेंंच के सामने यह सुनवाई हुयी थी जिसमें गोगोई साहब भी थे। जस्टिस शिवाशिवम और जस्टिस शिवकिर्ती सिंह भी इस बेंच में थे। जो आज मुद्दे वे उठा रहे थे वे पुरी तरह गलत थे। सुनवाई होती तो पुरी तरह खारिज हो जाती। हमारे पास पूरा प्रमाण था । 10 जनवरी को इस मामले की अगली डेट रखी गयी है। 

आपको बता दूं कि मैनेजमेंट के वकील जिस इश्यू को नया बता रहे हैं वह नया नहीं है । आप सुप्रीमकोर्ट का आर्डर पढ़िये उसमें मैनेजमेंट ने पांच इश्यू उठाये थे। जिनमें से एक इश्यू 20 जे भी था। मैनेजमेंट के वकील बोल रहे हैं ये नया इश्यू लेकर आये हैं जो पूरी तरह गलत है। आपको बतादें कि जागरण के मैनजमेंट ने पहले तो पी.पी. राव को लाया। फिर वे चले गये। फिर उनके बाद कपिल सिब्बल को लाया। कपिल सिब्बल भी चले गये। फिर जागरण वाले आर्यमान सुंदरम को लेकर आये। आर्यमन जी काफी अच्छे और बड़े एडवोकेट हैं। उसके बाद उसके बाद फिर पिछली तारिख पर पी. पी. राव आये थे। अबकी बार फिर तारिख पड़ी तो उन्होने अनिल दिवान को खड़ा कर दिया। अब अनिल दिवान जी ने केस को देखा नहीं है शायद। जब ये भी जागरण का केस देख लेंगे तो वे भी दैनिक जागरण को अच्छी सलाह देंगे। 10 जनवरी को क्या होगा?  इस पर परमानंद पांडे कहते हैं ये लोग अपना आब्जेक्शन रखेंगे और हम उसका जवाब देंगे। हमारा साफ कहना है कि हमारा कहना है कि आपने कंटेम्प्ट किया और आपका कहना है कि आपने कंटेम्प्ट नहीं किया। अब हमारा एक ही तर्क है कि आप प्रूफ करों कि आपने कंटेम्प्ट नहीं किया। इस मुद्दे में थोड़ा भटकाव हुआ है। लीगल प्वाईंट में हम भटकाव के रास्ते पर गये हैं। दैनिक जागरण, दैनिक भाष्कर, प्रभातखबर और राजस्थान पत्रिका सहित कई अखबारों ने 20 जे का सहारा लिया और कह रहे हैं इन्होने अपने से 20 जे का आप्शन चुना है। इसलिये कंटेम्प्ट नहीं बनता है। ये बचने का तरीका भी मालिकों ने खोजा है। हमें इधर उधर की बातें शुरु में ही ना करके सीधे मुद्दे पर आना चाहिये था कि इन्होने कंटेम्प्ट किया है और इसी पर जोर भी देना चाहिये था। हमारा सीधा कंटेम्प्ट का सवाल था और यही मुद्दा भी था। अब बिना लीगल इश्यू तय हुये मामला आगे नहीं बढ़ेगा।

[शशिकांत सिंह]
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Sunday, 20 November 2016

मजीठिया: यह है 16 नवंबर, 2016 की तारीख का कोर्ट आर्डर


जागरण प्रकाशन लिमिटेड की ओर से सीनियर काउंसिल श्री अनिल दीवान ने उपस्थित होकर मामले के प्रतिभागी द्वारा तैयार की गईं कानूनी प्रस्तुतियों पर विचार किए जाने को लेकर प्रारंभिक आपत्ति दर्ज करवाई गई कि यह नए सवाल उठाती हैं जो इस न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के दायरे से बाहर जा रही हैं, इस संबंध में अवज्ञा का आरोप लगाया गया। श्री दीवान ने आगे कहा कि अवमानना के अधिकार क्षेत्र की कसरत में इस तरह के सवालों पर निर्णय नहीं लिया जा सकता है।

दूसरी ओर, दूसरे समाचारपत्र प्रतिष्ठानों की ओर से उपस्थित हुए सीनियर वकील श्री गोपाल सुब्रमण्यम, श्री सलमान खुर्शीद, श्री विजय हंसारिया ने अपना पक्ष रखते हुए सीनियर काउंसिल श्री कोलिन गोन्साल्वेस द्वारा मामले में तैयार कानूनी प्रस्तुतियों पर पक्ष रखने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता बताई और इस मामले में निर्देश मांगे। काबिल वकीलों ने चार सप्ताह का समय देने की प्रार्थना की। उक्त परिस्थितियों में हम इन मामलों की सुनवाई को 10 जनवरी, 2017 तक स्थगित करते हैं। तय तिथि पर सीनियर काउंसिल श्री अनिल दीवान द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति पर भी विचार किया जाएगा। अतिरिक्त शपथपत्र/ दस्तावेज, यदि कोई हो, इस बीच में दायर किए जा सकते हैं।


[अनुवाद: रविंद्र अग्रवाल]



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गोपाल सुब्रमण्यम ने मजीठिया लागू करवाने का आश्वासन दिया


देश भर से इस बात को लेकर पूछताछ की जा रही है कि 16 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया मामले में हुई सुनवाई के दौरान क्या हुआ। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में कई अखबार कर्मी मौजूद थे। उन्होंने बाकी साथियों को इस संबंध में सूचनाओं का आदान-प्रदान भी किया है, फिर भी जिज्ञासा बनी हुई है। हालांकि इस दिन अखबार कर्मियों के पक्ष में कोई भी सुनवाई नहीं हुई। इस दौरान विशेषतौर पर इनाडू अखबार के प्रकाशक उषोदया पब्लिकेशन्स की ओर से उस समय आशा की किरण दिखाई दी, जब सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रामण्यम ने यह कहते हुए कोर्ट से समय की मांग की कि वह मजीठिया वेजबोर्ड कार्यान्वयन से जुड़े विवरण पर अपने मुवक्किल एवं अखबार के मालिक रामोजी राव से चर्चा करना चाहते हैं।

यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि इनाडू देश का पहला अखबार है, जिसने अविभाजित आंध्रप्रदेश के प्रत्येक जिला मुख्यालय से समाचार प्रकाशित करना शुरू किया था। इसके चलते अब तेलंगाना राज्य के भी हर जिला मुख्यालय से यह अखबार प्रकाशित हो रहा है। यह एक व्यापक प्रसारित अखबार है और इसका मालिक रामोजी राव, दोनों ही राज्यों की राजनीति और नौकरशाही ढांचे में व्यापक रसूख रखता है। यह माना जाता है कि रामोजी राव जो कभी सीपीआई कार्डधारक था, अब मीडिया मुगल बनने के बाद किसी के भी कैरियर और भविष्य की संभावनाओं को बना और बिगाड़ सकता है। यही कारण है कि दोनों राज्यों का कोई भी राजनेता उसके रंगरूप की परवाह किए बिना उसकी इच्छा और चाहत के खिलाफ नहीं जा सकता।

मजीठिया वेजबोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद इस अखबार के सैकड़ों कर्मचारियों को इस्तीफा देने को मजबूर किया गया, मगर प्रहसन यह है कि इन्हें या तो बाऊचर पेमेंट पर या फिर एडहॉक आधार पर नौकरी पर रख लिया गया। दोनों राज्यों के श्रम विभागों को इतना साहस नहीं है कि वे इस मीडिया मुगल को कानून का पालन करने के लिए कह सकें। ऐसे में वे व्यावहारिक रूप से रामोजी राव के नौकर बनकर रह गए हैं। सीनियर काऊंसिल गोपाल सुब्रमण्यम के लिए यह चुनौती होगी, जिन्होंने जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस अभय मनोहर सप्रे की बैंच को यह आश्वासन दिया है कि वह अपने प्रबंधन पर इस न्यायालय के आदेशों को अक्षरश: लागू करवाने के लिए दबाव बनाएंगे। उन्हें यह कहते सुनना खुशी की बात थी कि क्रियान्वयन का मतलब चेहरे को ढकने वाला क्रियान्वयन नहीं होता बल्कि संपूर्ण क्रियान्वयन होता है। वहीं उषोदया पब्लिकेशन्स के कर्मचारियों ने अपने रिज्वाइंडर में कहा है कि समाचारपत्र ने उचित तरीके से नहीं बल्कि मजीठिया वेज बोर्ड के क्रियान्वयन का ढोंग किया है।
बुधवार की तारीख को पूर्व के आदेशानुसार लीगल इश्यू तय किए जा रहे थे, मगर बहस शुरू होने से पूर्व ही दैनिक जागरण की ओर से उपस्थित हुए सीनियर एडवोकेट अनिल दीवान ने इश्यू तय करने को लेकर प्रारंभिक आपत्तियां दर्ज करवा दीं। हालांकि जस्टिस गोगोई ने उसकी आपत्तियों को निरस्त कर दिया, मगर इस बीच गोपाल सुब्रमण्यम उठ खड़े हुए और अपने मुवक्किल की ओर से फैक्ट वेरिफाई करने का सयम मांग लिया, ताकि वे तथ्यात्मक स्थिति के संबंध में कोर्ट को रिपोर्ट कर सके। कोर्ट ने सकारात्मक दावे के साथ किए गए उनके निवेदन को आसानी से स्वीकार कर लिया।

यहां यह बात काफी दिलचस्प है कि इस मामले के सबसे बड़े अवमानना करने वाले समाचारपत्र जागरण प्रकाशन लिमिटेड की प्रबंधन इस मामले की लगभग प्रत्येक सुनवाई के दौरान अपने वकीलों को बदलती आ रही है। यह सिलसिला सीनियर एडवोकेट पीपी राव से शुरू हुआ था, फिर अगली सुनवाई में सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल आए और जब कपिल सिब्बल ने अखबार की पैरवी से इनकार कर दिया तो दूसरे सीनियर एडवोकेट आर्यमन सुंदरम को लाया गया। जब उन्होंने देखा कि अखबार को बचाने का कोई रास्ता नहीं है, तो उन्होंने खुद को मामले से हटा लिया। हैरानी की बात है कि दैनिक जागरण प्रबंधन ने इस बार की सुनवाई पर 16 नवंबर को एक ओर सीनियर वकील अनिल दीवान को पेश कर दिया। यह कहा जा रहा है कि जब दीवान को भी जागरण प्रबंधन के स्पष्ट घटियापन का पता चलेगा तो संभवत: वे भी इस कुख्यात प्रबंधन का बचाव करने को सहमत नहीं हो पाएंगे।

परमानंद पांडे
सक्रेटरी जनरल -आईएफडब्ल्यूजे

[अनुवाद: रविंद्र अग्रवाल]




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