Monday, 13 July 2020

न्यूज एजेंसी PTI को सबक सिखाने में जुटी मोदी सरकार, ठोंका करोड़ों का जुर्माना

केंद्र की मोदी सरकार ने समाचार एजेंसी पीटीआई को सबक सिखाने का काम शुरू कर दिया है। चीनी राजदूत के इंटरव्यू से नाराज मोदी सरकार ने इस न्यूज एजेंसी पर 84.4 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। पीटीआई से कहा गया है कि उसने वर्ष 1984 से उस सरकारी बिल्डिंग के किराए का भुगतान नहीं किया है, जिससे इसका कामकाज संचालित होता है। ज्ञात हो कि पीटीआई का ये आफिस संसद मार्ग पर स्थित है।

पीटीआई पर लीज की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए 84.48 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है। इसी लीज के तहत पीटीआई को दिल्ली में संसद मार्ग कार्यालय के लिए भूमि आवंटित की गई थी।

ज्ञात हो कि केंद्र सरकार चीनी राजदूत सन सुन वेइदोन का इंटरव्यू पीटीआई द्वारा लिए जाने के जवाब में पीटीआई को दंडित कर रही है। पीटीआई को 84.48 करोड़ रुपये का डिमांड नोटिस जारी किया गया है। भुगतान के लिए 7 अगस्त का टाइम दिया गया है। न देने पर 10 प्रतिशत ब्याज लगेगा। किसी भी स्पष्टीकरण के लिए पीटीआई को एक सप्ताह का समय दिया गया है। कहा गया है कि पीटीआई ने 1984 के बाद से जमीन के किराए का भुगतान नहीं किया है। बेसमेंट के एक कार्यालय में बदलाव कर भूमि-आवंटन की शर्तों का दुरुपयोग किया है। लीज के अनुसार बेसमेंट का उपयोग केवल स्टोर के मकसद से करना था।

[साभार: bhadas4media.com]

एक्सप्रेस ग्रुप में गुप-चुप तरीके से बड़े पैमाने पर हो रही छंटनी

इंडियन एक्सप्रेस जैसे बड़े ग्रुप में छंटनी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। चुपके-चुपके चोरी से एक-एक कर निकला जा रहा है। HR से कॉल किया जाता है और ऑफिस आने को बोला जाता है। गेट पर आई कार्ड और लैपटॉप लेकर टर्मिनेशन के बारे मे मुंह से बोल कर निकाल दिया जा रहा है। कोई मेल या लेटर ऑफ़ टर्मिनेशन नहीं दिया जा रहा।

बहुत ही गुप्त तरीके से यह सब एक हफ्ते से चल रहा है। प्रिंट – इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस और जनसत्ता से छंटनी कर दी गई है।

अब ऑनलाइन की लिस्ट तैयार है। कुछ को बुधवार 15 जुलाई को ऑफिस में लैपटॉप के साथ बुलाया गया है। ऐसे में कर्मचारी घबराए हुए हैं और समझ नहीं पा रहे कि क्या करें। कर्मचारियों के साथ कोई नहीं खड़ा है – ना सरकार, ना सुप्रीम कोर्ट।

स्थिति बहुत ख़राब है

अगर कोई एक्सप्रेस ग्रुप का स्टाफ कठिन कदम जैसे की आत्महत्या इत्यादि करता है, तो सिर्फ और सिर्फ एक्सप्रेस ग्रुप का प्रबंधन जिम्मेदार होगा। छोटे-छोटे कर्मचारियों को निकाला जा रहा है, लेकिन जो लोग बॉस हैं, जिनकी मोटी सैलरी है, वो आराम से घर पर रह रहे हैं। आखिर उनको क्यों नहीं निकाला जा रहा?
एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

[साभार: bhadas4media.com]

Sunday, 12 July 2020

मजीठिया: हाईकोर्ट का दैनिक भास्कर को 35 परसेंट राशि जमा करने का आदेश


राजस्थान के कोटा से मजीठिया क्रांतिकारियों के लिए अच्छी खबर आई है। यहां मजीठिया की लड़ाई लेबरकोर्ट से जीतने वाले दैनिक भास्कर के 43 कर्मचारियों की 35 प्रतिशत भुगतान राशि भास्कर प्रबंधन को राजस्थान हाइकोर्ट में जमा करना होगा।

कोटा दैनिक भास्कर के मामले में पिछले दिनों हाईकोर्ट जयपुर में दैनिक भास्कर प्रबंधन के वरिष्ठ अधिवक्ता कमलाकर शर्मा की ओर से पैरवी की गई और रिकवरी को स्टे करने के लिए बड़ी बड़ी दलीलें पेश की गई। ऊपर वाले की दुआ से संयोग यह रहा कि उसी समय राजस्थान पत्रिका के कर्मचारियों की ओर से किसी अन्य मामले में पैरवी के लिए एडवोकेट धर्मेंद्र जैन वहां उपस्थित थे। उन्होंने कोर्ट की परमिशन लेकर कर्मचारियों की ओर से पक्ष रखा और उसमें कामयाब भी रहे। धर्मेंद्र जैन जी को बहुत-बहुत साधुवाद।

यह कहा हाईकोर्ट ने

भास्कर प्रबंधन को अगर कोटा लेबर कोर्ट के आदेश पर स्टे लेना है तो हाईकोर्ट में 35% राशि जमा करानी होगी, तभी इस पर स्टे की कार्रवाई हो पाएगी, वो भी तीन सप्ताह के अंदर। इन 43 कर्मचारियों का टोटल 6 करोड़ 80 लाख रुपये का मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार बकाया निकलता था जिसमे से 35 परसेंट राशि लगभग ढाई करोड़ रुपये भास्कर प्रबंधन को कोर्ट में तीन सप्ताह के अंदर जमा करना पड़ेगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी
9322411335

नवदुनिया भोपाल में कोरोना विस्फोट, 18 मीडियाकर्मी आए चपेट में

नवदुनिया भोपाल में कल 12 पत्रकार कोरोना possitive मिले थे, आज और 6 हो गए। जबकि तीन और लोगों की तबीयत खराब हो गई है। इन्होंने भी आज अपने सैंपल दिए हैं।

छह पॉजिटिव में से सिर्फ एक पॉजिटिव घर पर था, जबकि बाकी सभी से आफिस में काम कराया जा रहा था।

गजब के संपादकीय प्रभारी हैं।

अब भी नहीं मान रहे हैं। खुद घर मे बैठे हुए हैं और लोगों पर आफिस आने दबाव डाल रहे हैं। प्रशासन सो रहा है।

कोरोना संक्रमण को लेकर भोपाल की स्थिति खराब हो रही है। दैनिक भास्कर के सर्कुलेशन डिपार्टमेंट में भी एक शख्स पॉजिटिव आया है। लोगों ने मांग की है कि पूरे प्रेस काम्प्लेक्स को ही कंटेन्मेंट जोन घोषित कर देना चाहिए।

[साभार: bhadas4media.com]

Saturday, 11 July 2020

IFWJ Protests Appointment of Sanjay Gupta to the Prasar Bharati Board


Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) has protested to the appointment of Sanjay Gupta, the owner-director of the Dainik Jagaran newspaper as one of the members of the Prasar Bharati (Broadcasting Corporation of India) Board for a period of more than five years. Gupta is known for denying wages, victimizing journalists, and no-journalist employees with gay abandon by browbeating and bribing the officials of the different departments. All labour laws are thrown to the winds in his establishment and workers, including journalists, are made to work under the constant fear and the pressure of the management.

IFWJ has pointed out that not long ago Dainik Jagran was indicted for indulging into unfair trade practices and publishing paid news. Further, this newspaper under the stewardship of Gupta has not only failed to pay the due wages to the employees according to Majithia Wage Board’s recommendation but has terminated, transferred, and changed the service conditions of hundreds of employees. Recently, it has closed many units at different publication centres without following the due process of law. Hundreds of journalist and non-journalist employees are running from pillar to post to get justice but the management remains unmoved.

In a statement, the IFWJ Secretary -General Parmanand Pandey has asked the Central Government to annul the appointment of Sanjay Gupta and replace him with any sensitive and respectable person, who can be helpful in framing and shaping the media policy of the Prasar Bharati. The credibility is the essence of media, which can be instilled only by those, who are known for their probity and integrity. Sanjary Gupta, certainly, does not in that category and therefore his induction in the Prasar Bharati will erode its image, said the IFWJ.

Bhagwan Bhardwaj,
Office -Secretary: IFWJ

Friday, 10 July 2020

सरकार को आइना दिखाया तो मजीठिया क्रांतिकारी गुणानंद समेत दो पत्रकारों पर केस, थाने में किया तलब



वाह ! मेरी डबल इंजन त्रिवेंद्र सरकार तम तो ग़जब ही ढा रहे हो, हम ये भी नहीं कहेंगे कि ऊपर वाले की लाठी से तो डरो, क्योंकि हम जानते हैं ऊपर ऐसा कुछ भी एग्जिस्ट नहीं करता जिससे आशा लगाएं। हमारा इतना कहना है अपराधी साथ लिए चल रहे हो और निर्दोषों पर जुलम ढा रहे हो, हम पूछना चाहते हैं क्यों अपनी बर्बादी का रास्ता बना रहे हो। जिन पत्रकारों को जेल में होना चाहिए उनको मलाई और जो आइना दिखाएं उन्हें जेल, मुक़दमें, गैंगस्टर लगाने की साजिश  ये तो ग़जब ही ढाया जा रहा है...
त्रिवेंद्र भाई आप स्वयं आकर बताइए आखिर क्या अपराध किया देहरादून के पत्रकार Gunanand Jakhmola व मसूरी के Shoorveer Bhandari जैसे बेबाक पत्रकारों ने सिवाय तथ्यों के साथ रिपोर्टिंग करने के कि आपकी पुलिस ने उनपर मुकदमा कायम कर थाने में तलब कर दिया?

सीएम Trivendra Singh Rawat भैजी कार्यवाही किस पर करनी है किसका सम्मान करना है? नालायक सलाहकार नहीं बता पा रहे हैं तो हमसे पूछिये हम बताएंगे साथ ही पत्रकार Avikal Thapliyal जी की संलग्न रिपोर्ट पढ़िए...


सरकारी जांच को आंच नहीं कलमकारों को थाने में बुलावा
न्याय की लाठी पिक एंड चूज नहीं करती मेरे सरकार!

उत्तराखंड के आकाश में बदली भी छायी है और उमस भी है। इस उमस में आई एक खबर ने कसक भी बढ़ा दी। दरअसल, मुख्यमंत्री ने खुफिया विभाग को सोशल मीडिया पर नजर रखने की विशेष सलाह दी है। पूरे विश्व में सोशल मीडिया जनता की आवाज बन चुका है। ये इसलिए भी तेजी से हो रहा है कि मुख्यधारा का मीडिया तमाम तरह के आरोपों में घिरता जा रहा है।

इस खबर के बाद मुझे लगभग दो महीने पूर्व घटित हुए दो बहुचर्चित व अवाक कर देने वाले शासकीय हादसे याद हो आएं। सचिवालय से जुड़े इन प्रकरणों में शासकीय गलती ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए जो किसी भी कीमत पर अक्षम्य नहीं कहे जा सकते। इन दोनों मामलों में शासन स्तर पर चल रही जांच किस मोड़ तक पहुंची, यह किसी को नही पता। कौन दोषी, किसे मिले सजा। यह सब भी अंधेरे में है।

दरअसल, मुख्यमन्त्री जी को अपनी खुफिया टीम का बेहतर इस्तेमाल उन अधिकारियों की खुफियागिरी में करना चाहिए जो दिन रात माल बनाने में लगे हैं। जांच ऐसे लोगों की होनी चाहिए जो सत्ता की हनक में जमीनों के कब्जे समेत वन टू का फोर और फोर, टू का वन कर रहे हैं।

पहला मसला, उत्तराखंड शासन द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के स्वर्गीय पिता के श्राद्ध कर्म के लिए निर्दलीय विधायक अमनमणि का पास जारी करना। पास का लिखित आदेश करने वाले अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश व अन्य अधिकारियों पर महामारी एक्ट व आपदा एक्ट के उल्लंघन का गंभीर मामला बनता है। योगी जी के स्वर्गीय पिता के कर्म कांड से जुड़े इस अजब गजब मुद्दे पर उच्च न्यायालय ने भी पूछा है कि किन परिस्थितियों में अमनमणि को कड़े लॉकडाउन में उत्तराखंड के बद्रीनाथ और केदारनाथ का पास जारी किया गया। लेकिन अभी तक इस हाई प्रोफाइल मामले में अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश यह नहीं बता पाए हैं कि वो पास किसके कहने पर जारी किया गया। नियमों का खुला उल्लंघन कर पास कैसे जारी हो गए। इस प्रकरण को दो महीने से अधिक हो गए, लेकिन शासन की जांच का अता पता नहीं। अलबत्ता, अपने उच्चाधिकारी ओमप्रकाश के लिखित आदेश के बाद पास जारी करने वाले पीसीएस अधिकारी का रुद्रप्रयाग तबादला कर दिया गया। यहां यह भी बता दें कि अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश मुख्यमन्त्री त्रिवेंद्र जी के विश्वस्त और मुख्य सचिव की कुर्सी के प्रबलतम दावेदार हैं। इस प्रकरण में किसी भी जिम्मेदार अधिकारी पर मुकदमा नहीं।

दूसरा मसला, उत्तराखंड के करोड़ों की छात्रवृत्ति के मामले में निलंबित अधिकारी गीता राम नौटियाल की शासन स्तर पर चुपचाप बहाली। इसकी जांच मुख्य सचिव स्तर पर हो रही है। बहाली का यह मसला उठने के बाद पता चला कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र जी और समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य को तो पता ही नही था। बहाली का शोर मचने के बाद अगले दिन गीता राम नौटियाल को फिर निलंबित कर दिया गया। करोड़ों रुपये के बहुचर्चित छात्रवृत्ति घोटाले के आरोपी गीता राम नौटियाल की बहाली करने के पीछे कौन-कौन अधिकारी थे। इस रहस्य का खुलासा अभी तक नहीं हुआ है। जबकि जांच मुख्य सचिव स्तर से हो रही है।
लेकिन, कुछ वास्तविक पत्रकारों की कलम से निकले शब्दों पर तत्काल थाने में मामला दर्ज हो रहा है। सुना है कि वास्तविक पत्रकार गुणानंद जखमोला और शूरवीर भंडारी को देहरादून थाने में तलब किया गया है। इसमें कोई दोराय नहीं कि ये दोनों पत्रकार दलाल व ब्लैकमेलर कैटेगरी में कतई नहीं है।

चैतू, न्याय की लाठी तो समान रूप से पड़नी चाहिए। कुछ बहुचर्चित माल खींचू अधिकारियों की खुफियागिरी करवाइए सरकार। ऐसे सफेदपोशों पर मामला दर्ज करवाइए। माल भी निकलेगा और कलंक भी हटेगा। न्याय की लाठी पिक एंड चूज नही करती मेरे सरकार! बोल चैतू, जय उत्तराखंड, जय बद्रीविशाल।

[Bhargava Chandola की फेसबुक वॉल से साभार]

नोट: गुणानंद सहारा के खिलाफ मजीठिया वेजबोर्ड का मुकदमा भी लड़ रहे हैं। उन्‍हें देहरादून लेबर कोर्ट से एक मामले में जीत भी हासिल हो चुकी है और दूसरा मामला अभी चल रहा है। गुणानंद प्रशासन की कमियों के खिलाफ लगातार तीखा हमला करते रहते हैं।

Monday, 6 July 2020

होनहार पत्रकार तरुण सिसौदिया की रहस्यमयी मौत ! एम्स दिल्ली की चौथी मंजिल से कूदकर दी जान




आज एक दुखद खबर मिली कि दिल्ली के एम्स अस्पताल की चौथी मंजिल से कूदकर पत्रकार तरुण सिसौदिया ने आत्महत्या कर ली। 37-38 वर्षीय तरुण दैनिक भास्कर में शिक्षा बीट देखता था। कुछ लोग कह रहे हैं कि भास्कर प्रबंधन ने उसे नौकरी से निकाल दिया था, लेकिन भास्कर में कार्यरत उसके साथियों ने इस संबंध में टिप्पणी नहीं की।

सूत्रों का कहना है कि तरुण कोरोना पाजिटिव होने के बाद एम्स के आईसीयू में था और बाद में कोरोना वार्ड में आ गया। जानकारी के अनुसार तरुण ने एम्स की कई खामियों के बारे में बताया तो एम्स प्रबंधन ने उसका मोबाइल छीन लिया था। परिजनों से भी बात नहीं करने दी जा रही थी। इसके बाद उसे दोबारा आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया था। उसके दोस्तों का कहना है कि तरुण को कैंसर बताया जा रहा है जो कि विश्वसनीय नहीं है। पहले कभी उसका एक्सीडेंट हुआ था। लेकिन वो इतना बीमार कभी नहीं रहा। सच क्या है कुछ कहा नहीं जा सकता है कि जब तक इस मामले में जांच न हो। जो घटित हुआ वह बहुत ही पीड़ादायक है और हमने एक अच्छा पत्रकार असमय ही खो दिया। विनम्र श्रद्धांजलि।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]