Tuesday, 26 May 2026

मजीठिया पर बड़ी खबर: इस साथी को मिले 24 लाख, दिल्ली HC ने RRC को माना सही


साथियों, प्रचंड गर्मी के बीच दिल्ली से दिल को राहत देने वाली एक सुकून भरी खबर आ रही है। यहां पर Pragativadi कंपनी को दिल्ली DLC के बाद दिल्ली HC में भी मुंह की खानी पड़ी है। जिसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट रजिस्ट्रार ने 24 लाख से अधिक की राशि कंपनी के पूर्व कर्मी शिशुपाल खरे के एकाउंट में जारी कर दी। इस खबर से देश भर के मीडियाकर्मियों में उत्साह देखा जा रहा है।
आपको बता दें कि ओडिशा की कंपनी के दिल्ली ब्यूरो में काम करने वाले शिशुपाल खरे ने दिल्ली के केजी मार्ग स्थित DLC में अपना मजीठिया का क्लेम लगाया था। तब के DLC यूके सिन्हा ने इसकी सुनवाई की थी। इस दौरान कंपनी ने शिशुपाल खरे को अपना कर्मी तक मानने से इनकार कर दिया था। कंपनी ने DLC के सामने कई तर्क रखे, लेकिन शिशुपाल खरे ने pf और ESI कटने के सबूत रख कंपनी की इस चाल को नाकाम कर दिया। शिशुपाल खरे की तरफ से कई तरह के कागज DLC में लगाए। DLC ने भी एक्ट के तहत प्रदत शक्तियों का प्रयोग करते हुए कंपनी का टर्नओवर तलब किया। कंपनी ने जो जो विवाद खड़ा किया उसपर दोनों तरफ से DLC में तर्क पेश किए गए। जरूरी होने पर DLC ने दोनों पक्षों से अपना पक्ष साबित करने के लिए सबूत भी मांगे गए। इस दौरान वर्कर ने DLC में अपने पक्ष के सबूत एफिडेविट के साथ भी जमा किए।
जब कंपनी द्वारा उठाए गए सभी विवादों पर सुनवाई पूरी हो गई तो DLC ने इस केस को पूरी तरह से RRC जारी करने के लायक माना और जनवरी 2018 में वर्कर के पक्ष में RRC जारी कर दी। DLC ने अंतरिम राहत और मजीठिया के एरियर को मिलाकर कुल 16,70,881 रूपये की राशि की RRC जारी की थी। 16,70,881 रूपये की यह ही क्लेम राशि वर्कर ने DLC के सामने WJA के तहत लगाई थी। जिसमें 18 प्रतिशत चक्रवृद्धि  ब्याज भी शामिल था। 
RRC जारी होने के बाद कंपनी ने इसको दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने RRC पर स्टे लगाने से पहले कंपनी को 16,70,881 रूपये की राशि कोर्ट में जमा करने के निर्देश दिए। जिसके बाद कंपनी को इस राशि को दिल्ली HC के रजिस्ट्रार के पास जमा करवाना पड़ा। इस दौरान कंपनी केेस को डीले करने के लिए समझौता वार्ता में भी गई और कोरोना काल का भी फायदा उठाने की कोशिश की। लेकिन समझौता वार्ता भी फेल रही, क्योंकि कंपनी ने हर बार कहा कि वर्कर का मजीठिया के हिसाब से एक भी पैसा नहीं बनता है। समझौता वार्ता विफल होने के बाद कंपनी का सारा जोर किसी तरह से RRC को गलत ठहराने के पर रहा। कंपनी साथ ही इस बात को भी जोर शोर से उठाती रही कि वर्कर ने क्लेम देर से लगाया है। लेकिन कोर्ट ने RRC के एक फैक्ट को देखा और उसे पूरी तरह से सही माना।  साथ ही कोर्ट ने अपनी ऑर्डर में अवमानना याचिका 411/2014 का जिक्र करते हुए क्लेम देर से लगाने की तथ्य को भी खारिज कर दिया। 
इस साल जनवरी में आए इस ऑर्डर के खिलाफ कंपनी तुरंत DB में गई। परंतु वहां से वह स्टे नहीं ले पाई। रजिस्ट्रार ने DB का स्टे ना होने की वजह से केस की पेंडेंसी के दौरान ही जमा राशि को मय ब्याज वर्कर को जारी कर दी। जो 2018 से अब तक मय ब्याज 24 लाख से अधिक  की हो गई थी। इस खबर के साथ दिल्ली HC का फैसला भी है। आप खुद इस फैसले को पढ़ सकते हैं या अपने वकील को दे सकते हैं। यह फैसला आपके कितने काम का है यह आपका वकील ही बता सकता है। लेकिन यह फैसला हम सब के अंदर एक उत्साह का संचार जरूर कर गया है।
अंत में शिशुपाल खरे ने अपने वकील गौतम दास का तहेदिल से धन्यवाद किया जो मजबूती से उसका केस लड़ते रहे। साथ ही शिशुपाल खरे ने अपने अन्य साथियों विशेषतौर पर राजेश निरंजन और कीर्ति नाथ झा का भी धन्यवाद किया जिन्होंने शुरू से लेकर अंत तक उसकी समय समय पर मदद की और गाइड किया।
जय मजीठिया







 


























Monday, 2 March 2026

पानीपत रिफायनरी के हड़ताली मजदूरों के संग आई कर्मचारी यूनियनें, सौंपा ज्ञापन

गुरुग्राम, 2 मार्च। सेंट्रल ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू), सर्व कर्मचारी संघ, जनवादी महिला समिति, ज्ञान विज्ञान समिति और आल इंडिया लायर्स यूनियन ने राज्य कमेटी के आह्वान पर तेल शोधक कारखाना/ रिफायनरी/ पानीपत में चल रही पिछले एक सप्ताह से हड़ताल के समर्थन में उनकी मांगों को लेकर तहसीलदार को एक ज्ञापन सौंपा। जिसमें मांग की गई की हड़ताल के मद्देनजर मजदूरों की तमाम मांगों का समाधान किया जाए। 


मिनिमम वेज लागू किया जाए, काम के 8 घंटे निश्चित किए जाएं, वेतन बढ़ोतरी, सेवा सुरक्षा, कार्यस्थल पर सभी प्रबंध जैसे विश्रामगृह, शौचालय, पीने के पानी का प्रबंध, उत्पीड़न की कार्यवाहियां बंद किए जाने, मजदूरों को इंसान की श्रेणी में माना जाए, रिफाइनरी से निकाले गए तमाम मजदूरों को वापस नौकरी पर लेना, गिरफ्तार किए गए कर्मचारियों पर से झूठे मुकदमे वापस लेकर रिहा किया जाए आदि मांगों को लेकर हड़ताली मजदूरों के साथ एकजुटता प्रकट की गई। जिसमें सीटू जिला प्रधान सुरेश नौहरा, सर्व कर्मचारी संघ जिला प्रधान बसंत कुमार, जनवादी महिला समिति से उषा सरोहा, ज्ञान विज्ञान समिति से ईश्वर नास्तिक, आल इंडिया लायर्स यूनियन के जिला प्रधान राजेंद्र पाठक, सचिव विनोद भारद्वाज और गुरजिंदर सिंह ने भाग लिया।

Sunday, 1 February 2026

पत्रकारों की समस्याओं से श्रम मंत्री को अवगत कराएंगे सांसद अरुण गोविल



न्यूज पेपर एम्प्लाइज यूनियन ऑफ इंडिया के पदाधिकारियों ने सौंपा ज्ञापन

सिनेमा से संसद तक पहुंचे अरुण गोविल न केवल अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं, बल्कि अपने स्वभाव एवं व्यवहार से साबित किया है कि वह आज भी अपनों से अलग नहीं हैं। इसकी बानगी हाल में तब मिली; जब लोक सभा में अरुण गोविल ने सिनेमा जगत के उन कर्मचारियों-तकनीशियनों का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया, जिनके काम करने की अवधि से लेकर उनकी मजदूरी के भुगतान तक- कुछ भी सुनिश्चित नहीं है!


मेरठ के सांसद अरुण गोविल के इस सहयोग हेतु आभार व्यक्त करने के उद्देश्य से मुंबई स्थित ‘सिंटा' हाउस में उनका सम्मान किया गया। इस सम्मान समारोह का आयोजन फिल्मी दुनिया की 32 प्रमुख यूनियनों का नेतृत्व करने वाले महासंघ ‘फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्प्लॉईज' (FWICE) ने किया था, जिसके अध्यक्ष वी. एन. तिवारी संग ‘सिंटा' (सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन) की प्रेसीडेंट एवं अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री पूनम ढिल्लों ने श्री गोविल के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा की- ‘आगे बढ़ने के बाद अवसर मिले तो अपनों के लिए क्या-क्या सकारात्मक किया जा सकता है, इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण अरुण गोविल जी हैं!' इस अवसर पर ‘सिंटा' की कार्यकारिणी के सदस्य मुकेश ऋषि और फेडरेशन के मुख्य सलाहकार अशोक पंडित भी उपस्थित थे।

गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने कुछ समय पहले ही 29 बिखरे हुए कानूनों को इकट्ठा करते हुए चार नई श्रम संहिताएं लागू की हैं, जिसका उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल बनाना और श्रमिकों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इनमें कार्य के घंटे, न्यूनतम वेतन, पीएफ व ग्रेच्युटी के नियमों में बदलाव आदि जैसे प्रावधान शामिल हैं। चूंकि इससे ठीक पहले ही श्री गोविल ने लोक सभा में फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े श्रमिकों-तकनीशियनों की व्यथा संबंधी मुद्दा बड़ी प्रमुखता से उठाया था; इसीलिए फेडरेशन ने उनका धन्यवाद ज्ञापित किया। यहां ‘सिंटा' की जनरल सेक्रेटरी व अभिनेत्री उपासना सिंह ने सांसद का ध्यान इस समस्या की तरफ आकृष्ट किया कि हमारे जूनियर कलाकारों का भुगतान तीन-तीन महीने बाद किया जाता है, जिसके चलते उन्हें खुद का भी जीवनयापन करना दुश्वार हो जाता है!


इस मौके पर पत्रकारों द्वारा यह पूछे जाने पर कि कानून तो पहले भी पर्याप्त थे, नई संहिताओं को सरकार लागू कैसे करवाएगी? अभिनेता-सांसद अरुण गोविल ने सभी को आश्वस्त किया- ‘आप निश्चिंत रहिए... सम्पूर्ण भारतवर्ष देख रहा है कि जमीन पर अब काम हो रहा है। यह मोदी सरकार द्वारा लाई गई संहिताएं हैं, जो सिर्फ़ कानून नहीं बनाती, अपितु उन्हें पूरी जिम्मेदारी के साथ लागू करवाने के लिए भी जानी जाती है।'


अखबारों के कर्मचारियों के राष्ट्रीय संगठन ‘न्यूजपेपर इम्प्लॉईज यूनियन ऑफ इंडिया' (NEUIndia) के अध्यक्ष धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने जब यह बताया कि नई श्रम संहिताओं में आप लोगों ने ‘वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट- 1955' को कमजोर किया है, तब अरुण गोविल ने बड़ी ईमानदारी से स्वीकार किया- ‘मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है... आप एक रिप्रजेंटेशन दे देंगे तो जरूर देखूंगा कि मैं इसके लिए क्या कर सकता हूं।' तत्पश्चात श्री सिंह सहित इस यूनियन के उपाध्यक्ष शशिकांत सिंह और कोषाध्यक्ष ताराचंद राय ने श्री गोविल को जब संबंधित ज्ञापन दिया, तब भी सांसद ने आश्वस्त किया कि यूनियन के सुझावों को वह केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया के समक्ष पहुंचाने का काम करेंगे।


शशिकांत सिंह

उपाध्यक्ष 

न्यूज पेपर एम्प्लाइज यूनियन ऑफ इंडिया 

Monday, 19 May 2025

मजीठिया पर बड़ी खबरः HC के आदेश के बाद गीता रावत व रमा शुक्ला को सहारा ने ज्वाइन करवाया, एक साल का वेतन भी दिया


साथियों, नोएडा से एक बड़ी खबर आ रही है। सहारा मीडिया को दो महिला उप-संपादकों को इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद ज्वाइन करवाना पड़ा। साथ ही कंपनी ने दोनों कर्मियों को एक-एक साल का वेतन भी दिया है। इससे पहले पिछले साल हाईकोर्ट के दिए आदेश के बाद सहारा को दोनों को तीन-तीन लाख के डीडी भी सौंपने पड़े थे, परंतु प्रबंधन ने उस आदेश की पूरी तरह पालना नहीं की थी।

जिसके बाद गीता रावत और रमा शुक्ला ने दोबारा इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। उनकी तरफ से इस बार भी वरिष्ठ वकील मनमोहन सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 13 मई सुनवाई के दौरान प्रबंधन के यह मानने पर की उसने 3-3 लाख रुपये दोनों याचिकाकर्ताओं को सौंप दिए हैं, परंतु दोनों की नियुक्ति अभी तक नहीं हुई के बाद अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता 19 मई को सहारा कार्यालय में पहुंच कर ज्वाइनिंग करें। 

इसके साथ ही अदालत ने 26 मई की अगली तारीख निर्धारित करते हुए प्रबंधन को इस मामले में हलफनामा भी दायर करने का आदेश दिया। इसके साथ ही अदालत ने प्रबंधन को याचिकार्ताओं के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई ना करने का भी निर्देश दिया। अदालत ने इसके साथ प्रबंधन को ये भी आदेश दिया कि दोनों याचिकाकर्ताओं को 30 अप्रैल 2024 के अंतरिम आदेश के बाद से अब तक के वेतन का भुगतान किया जाए।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद दोनों महिला उप संपादक आज सोमवार को सेक्टर 12 स्थित सहारा मीडिया के कार्यालय में पहुंची। प्रबंधन ने हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार दोनों को एक साल का वेतन देते हुए दोनों को फिर से ज्वाइन करवाया।

मालूम हो कि सहारा मीडिया ने कई कर्मचारियों को अवैध रूप से नौकरी से निकाल दिया था। सहारा के प्रिंट में कार्यरत गीता रावत और रमा शुक्ला भी उन कर्मचारियों में शामिल थीं, जिन्होंने अपने पिछले कई महीनों का बकाया वेतन और मजीठिया वेजबोर्ड को लागू करने की मांग की थी। जिसके बाद इन्होंने नोएडा डीएलसी में अवैध सेवा समाप्ति को लेकर वाद दायर किया था और वहां से केस नोएडा लेबर कोर्ट को रेफर हो गया। लेबर कोर्ट ने 20 अक्टूबर 2023 को दोनों कर्मचारियों को पुरानी सेवा की निरंतरता के साथ पूर्व पूर्ण वेतन व अन्य समस्त हित लाभ समेत अवार्ड प्रकाशन के एक माह के अंदर सेवा में बहाल करने का आदेश दिया था।

इस अवार्ड के खिलाफ सहारा प्रबंधन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जिसमें इस अवार्ड को चुनौती दी गई थी और उसपर अमल करवाने पर रोक लगाने की मांग की गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुना। जिसके बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पहले प्रबंधन 15 दिन के भीतर गीता रावत और रमा शुक्ला को नौकरी पर बहाल करे और ज्वाइनिंग के समय दोनों को 3-3 लाख रुपये का डीडी दे, इसके बाद स्टे प्रभावी होगा। लेबर कोर्ट में गीता रावत और रमा शुक्ला की तरफ से एआर राजुल गर्ग ने मजबूत तर्क रखे।


Monday, 21 April 2025

बड़ी खबरः मजीठिया क्रांतिकारी जीतेंद्र सिंह को पत्रिका ने दिए साढ़े 21 लाख रुपये


राजस्थान पत्रिका प्रबंधन का जिलाधिकारी ग्वालियर (मध्य प्रदेश) को 19 अप्रैल 2025 को लिखा पत्र


मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लेकर पत्रकारों द्वारा लड़ी जा रही कानूनी लड़ाई में एक और मीडियाकर्मी को उनके हक का पैसा मिला है। राजस्थान पत्रिका प्रबंधन ने अपने कर्मचारी जीतेंद्र सिंह को कुल 21 लाख 46 हजार 945 रुपये अब तक दिए हैं। इस अखबार प्रबंधन ने 10 लाख 46 हजार 945 रुपये एक डिमांड ड्राफ के जरिए 17 अप्रैल 2025 को जितेंद्र को दिए हैं। फिलहाल ये पैसा जीतेंद्र सिंह के खाते मे आ गया है।

खुद राजस्थान पत्रिका प्रबंधन ने जिलाधिकारी ग्वालियर (मध्य प्रदेश) को 19 अप्रैल 2025 को लिखे एक पत्र में यह जानकारी दी है। इसके पहले जीतेंद्र सिंह को पत्रिका प्रबंधन ने 11 लाख रुपये का भुगतान 14-05-2024 को एक डिमांड ड्राफ्ट के जरिए किया था जो जीतेंद्र सिंह को मिल चुका है। इस बात की जानकारी भी राजस्थान पत्रिका प्रबंधन ने इसी पत्र में दी है।

आपको बता दें की जीतेंद्र ने पत्रिका प्रबंधन के खिलाफ लंबी अदालती लड़ाई लड़ी थी। फिलहाल जीतेंद्र सिंह को हर तरफ से बधाई मिल रही है।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

9322411335

श्रीनारायण तिवारी बनाए गये दैनिक यशोभूमि के संपादक


मुंबई से प्रकाशित लोकप्रिय हिंदी दैनिक यशोभूमि के कार्यकारी संपादक श्रीनारायण तिवारी को प्रमोशन देकर इसी समाचार पत्र का नया संपादक बनाया गया है जिससे उनके चाहने वालों मे खुशी की लहर है। 

डॉ. रामनोहर त्रिपाठी पत्रकारिता पुरस्कार तथा अन्य कई पुरस्कारों से सम्मानित श्रीनारायण तिवारी ने लोकप्रिय दैनिक जनसत्ता और संझा जनसत्ता में मुख्य संवाददाता, लोकमत समाचार और लोकमत तथा लोकमत टाइम्स में विशेष संवाददाता एवं दबंग दुनिया, एब्सलूट इंडिया, पूर्व विराम और दैनिक जागरुक टाइम्स में भी कार्यकारी संपादक के रूप में कार्य किया। उन्हें खबरों में तीखी धार और समाचार पत्र में नए कलेवर के लिए जाना जाता है, जो आज भी दैनिक यशोभूमि समाचार पत्र में दिखाई देता है।

Wednesday, 9 April 2025

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह से फिर हारा ‘दैनिक भास्कर'


मुंबई से बहुत बड़ी खबर आ रही है... मजीठिया क्रांतिकारी धर्मेन्द्र प्रताप सिंह से देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर 1 अखबार ‘दैनिक भास्कर' एक बार फिर हार गया है। मुंबई के श्रम न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश प्रशांत एच. इंगले ने धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के टर्मिनेशन वाले मामले में ‘दैनिक भास्कर' के झूठ को सच मानने से इनकार कर दिया। कुल 18 पृष्ठ के ऑर्डर की कॉपी में जज साहब ने 4 पंक्तियों के अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि:

1) यह घोषित किया जाता है कि जांच अधिकारी द्वारा की गई जांच निष्पक्ष और उचित है।

2) यह भी घोषित किया जाता है कि जांच अधिकारी के निष्कर्ष गलत हैं।

यहां बताना आवश्यक है कि मजीठिया क्रांतिकारी के तौर पर मुंबई में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की अपनी अलग पहचान है... वह हंसते हुए तंज कसते हैं- ‘हां, आज मुझे इसी नाते हर-एक अखबार का मालिक जानता है।' वैसे यह सत्य भी है। मुंबई महानगर में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह पहले पत्रकार थे, जिन्होंने किसी भी संस्थान की ओर से सबसे पहले मजीठिया अवॉर्ड की मांग की थी। मुंबई के ही वह पहले पत्रकार थे, संस्थान ने जिनका इसी मांग के चलते सीकर (राजस्थान) ट्रांसफर किया तो उन्होंने औद्योगिक न्यायालय से स्टे पा लिया। वह महाराष्ट्र राज्य के पहले पत्रकार हैं, जिनकी उपरोक्त मांग पर स्थानीय श्रम विभाग की ओर से आरआरसी (रेवेन्यू रिकवरी सर्टिफिकेट) जारी हुई थी।

इस आरआरसी के विरुद्ध कंपनी (डी. बी. कॉर्प लि.) माननीय बॉम्बे हाई कोर्ट में गई तो जस्टिस मेनन ने कहा कि सबसे पहले आप यहां 50% जमा करो, फिर हम आपको सुनेंगे। और यह तो भारत देश में पहली बार हुआ था, जब इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट पहुंची ‘डी. बी. कॉर्प लि' को वहां भी मुंह की खानी पड़ी थी। जी हां, हाई कोर्ट में कंपनी ने एफिडेविट देकर कहा था कि हम दो सप्ताह में पैसे जमा कर देंगे। फिर भी, सबसे पहले 50% जमा करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को उसकी ओर से जब सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया गया तो मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह कह कर कंपनी की पिटीशन खारिज कर दी- ‘हमें नहीं लगता कि इस आदेश में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है।' इसके बाद कंपनी ने हाई कोर्ट में यह रकम जमा भी करवा दी थी... मजीठिया के मामले में यह भी देश में पहली बार हुआ था, मगर बाद में हाई कोर्ट ने धर्मेन्द्र प्रताप सिंह सहित 5 जनों के मामले को यह कहते हुए लेबर कोर्ट भेज दिया था कि ‘लेबर कमिश्नर के पास आरआरसी जारी करने का अधिकार नहीं है।'
 
बहरहाल, ट्रांसफर पर तो धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने स्टे पा लिया था... लेकिन हार से तिलमिलाई कंपनी (डी. बी. कॉर्प लि.) के क्रोध का क्या करते, जो हर-हाल में उन्हें सबक सिखाने पर आमादा थी। इसलिए येन-केन-प्रकारेण, डेढ़ साल की लंबी डोमेस्टिक इन्क्वायरी के बाद धर्मेन्द्र प्रताप सिंह को ‘दोषी' मानते हुए जब उन्हें टर्मिनेट कर दिया गया तो उसी मामले को लेकर वह लेबर कोर्ट गए, जहां से यह हालिया ऑर्डर (पार्ट- 1) आया है। इस पर धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने बड़ी सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की है- ‘एक लंबी एवं कठिन लड़ाई के बाद का यह आरंभिक परिणाम हम सभी मजीठिया क्रांतिकारियों को सम्बल प्रदान करेगा। मुझे विश्वास है, फाइनल जजमेंट भी मेरे फेवर में आएगा।'आपको बता दें कि अब मुंबई में मजीठिया की लड़ाई लड़ने वालों में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह अकेले पत्रकार नहीं हैं... वह स्वयं ‘न्यूजपेपर एम्प्लॉयीज यूनियन ऑफ इंडिया' (NEU India) नामक राष्ट्रीय संगठन के जनरल सेक्रेटरी हैं (पत्रकारों के लिए तो कई सारे संगठन हैं... यह संगठन अखबारों में काम करने वाले हर-एक कर्मचारी के अधिकारों की लड़ाई लड़ता है) तो ‘दैनिक भास्कर’ के ही सैकड़ों साथियों का साथ उन्हें हासिल है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के मुताबिक, ‘महेन्द्र सिंह धोनी का पहला चर्चित विज्ञापन शायद वही था, जिसमें वह ‘दैनिक भास्कर' के लिए कहते नज़र आए थे- ‘ज़िद करो, दुनिया बदलो।' वह मानते हैं कि इस कैंची लाइन का उन पर बहुत असर है- ‘इसलिए मजीठिया अवॉर्ड की बात जब सामने आई तो मुझे लगा कि जो काम हमारे पूर्व के पत्रकारों ने नहीं किया, वह मैं जरूर करूंगा। वैसे भी, अखबार मालिकान पहले ही कई Wages हज़म कर चुके थे, सो मैंने आवाज़ उठाने का फैसला किया। मुझे गर्व है कि इस आवाज़ को बुलंद करने में ‘bhadas4media.com’ के अग्रज यशवंत सिंह एवं मजीठिया  क्रन्तिकारी शशिकांत सिंह ने मेरा निरंतर और मजबूत साथ दिया है... और हां, अपने एडवोकेट विनोद शेट्टी का मैं विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहूंगा। वह सच और अधिकार की इस लड़ाई को दिमाग के साथ-साथ पूरे दिल से भी लड़ रहे हैं।
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