साथियों, प्रचंड गर्मी के बीच दिल्ली से दिल को राहत देने वाली एक सुकून भरी खबर आ रही है। यहां पर Pragativadi कंपनी को दिल्ली DLC के बाद दिल्ली HC में भी मुंह की खानी पड़ी है। जिसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट रजिस्ट्रार ने 24 लाख से अधिक की राशि कंपनी के पूर्व कर्मी शिशुपाल खरे के एकाउंट में जारी कर दी। इस खबर से देश भर के मीडियाकर्मियों में उत्साह देखा जा रहा है।
आपको बता दें कि ओडिशा की कंपनी के दिल्ली ब्यूरो में काम करने वाले शिशुपाल खरे ने दिल्ली के केजी मार्ग स्थित DLC में अपना मजीठिया का क्लेम लगाया था। तब के DLC यूके सिन्हा ने इसकी सुनवाई की थी। इस दौरान कंपनी ने शिशुपाल खरे को अपना कर्मी तक मानने से इनकार कर दिया था। कंपनी ने DLC के सामने कई तर्क रखे, लेकिन शिशुपाल खरे ने pf और ESI कटने के सबूत रख कंपनी की इस चाल को नाकाम कर दिया। शिशुपाल खरे की तरफ से कई तरह के कागज DLC में लगाए। DLC ने भी एक्ट के तहत प्रदत शक्तियों का प्रयोग करते हुए कंपनी का टर्नओवर तलब किया। कंपनी ने जो जो विवाद खड़ा किया उसपर दोनों तरफ से DLC में तर्क पेश किए गए। जरूरी होने पर DLC ने दोनों पक्षों से अपना पक्ष साबित करने के लिए सबूत भी मांगे गए। इस दौरान वर्कर ने DLC में अपने पक्ष के सबूत एफिडेविट के साथ भी जमा किए।
जब कंपनी द्वारा उठाए गए सभी विवादों पर सुनवाई पूरी हो गई तो DLC ने इस केस को पूरी तरह से RRC जारी करने के लायक माना और जनवरी 2018 में वर्कर के पक्ष में RRC जारी कर दी। DLC ने अंतरिम राहत और मजीठिया के एरियर को मिलाकर कुल 16,70,881 रूपये की राशि की RRC जारी की थी। 16,70,881 रूपये की यह ही क्लेम राशि वर्कर ने DLC के सामने WJA के तहत लगाई थी। जिसमें 18 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज भी शामिल था।
RRC जारी होने के बाद कंपनी ने इसको दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने RRC पर स्टे लगाने से पहले कंपनी को 16,70,881 रूपये की राशि कोर्ट में जमा करने के निर्देश दिए। जिसके बाद कंपनी को इस राशि को दिल्ली HC के रजिस्ट्रार के पास जमा करवाना पड़ा। इस दौरान कंपनी केेस को डीले करने के लिए समझौता वार्ता में भी गई और कोरोना काल का भी फायदा उठाने की कोशिश की। लेकिन समझौता वार्ता भी फेल रही, क्योंकि कंपनी ने हर बार कहा कि वर्कर का मजीठिया के हिसाब से एक भी पैसा नहीं बनता है। समझौता वार्ता विफल होने के बाद कंपनी का सारा जोर किसी तरह से RRC को गलत ठहराने के पर रहा। कंपनी साथ ही इस बात को भी जोर शोर से उठाती रही कि वर्कर ने क्लेम देर से लगाया है। लेकिन कोर्ट ने RRC के एक फैक्ट को देखा और उसे पूरी तरह से सही माना। साथ ही कोर्ट ने अपनी ऑर्डर में अवमानना याचिका 411/2014 का जिक्र करते हुए क्लेम देर से लगाने की तथ्य को भी खारिज कर दिया।
इस साल जनवरी में आए इस ऑर्डर के खिलाफ कंपनी तुरंत DB में गई। परंतु वहां से वह स्टे नहीं ले पाई। रजिस्ट्रार ने DB का स्टे ना होने की वजह से केस की पेंडेंसी के दौरान ही जमा राशि को मय ब्याज वर्कर को जारी कर दी। जो 2018 से अब तक मय ब्याज 24 लाख से अधिक की हो गई थी। इस खबर के साथ दिल्ली HC का फैसला भी है। आप खुद इस फैसले को पढ़ सकते हैं या अपने वकील को दे सकते हैं। यह फैसला आपके कितने काम का है यह आपका वकील ही बता सकता है। लेकिन यह फैसला हम सब के अंदर एक उत्साह का संचार जरूर कर गया है।
अंत में शिशुपाल खरे ने अपने वकील गौतम दास का तहेदिल से धन्यवाद किया जो मजबूती से उसका केस लड़ते रहे। साथ ही शिशुपाल खरे ने अपने अन्य साथियों विशेषतौर पर राजेश निरंजन और कीर्ति नाथ झा का भी धन्यवाद किया जिन्होंने शुरू से लेकर अंत तक उसकी समय समय पर मदद की और गाइड किया।
जय मजीठिया







