Sunday, 7 May 2017

Majithia: Regarding withdrawal of the Contempt case against Prabhat Khabar

I have been getting queries from all over the country about the withdrawal of the Contempt Petition (C) 108/2015 titled ‘Satya Prakash Chaudhary vs Kamal Kishore Goenka’. This case was filed through me in the Supreme Court by eight courageous and intrepid journalists of Prabhat Khabar. I must say that they have fairly good understanding of trade unionism and believe in value based journalism. One of them is Satya Prakash Chaudhary, who is the Executive Editor of the Prabhat Khabar in Siligudi in North Bengal and the other person is Manoj Kumar Sinha from Ranchi. Both of them have been regularly interacting with me regarding the case. When the Management started harassing and victimising them and many others, they approached the Labour Commissioner, who proved to be ineffective in rendering any help to employees.
Needless to mention, that the Management was scared of the Contempt Petition in the Supreme Court. So, it opened the negotiation channel with employees and assured them that their salaries would be increased, continuity of service would remain intact and all disciplinary proceedings would be dropped. Employees were almost economically broken and it was not possible for them to sustain for long. They consulted me and I told them that the final call of the withdrawal of the case had to be taken by them only because I worked as their attorney in the Supreme Court. I also told them that ‘negotiation’ is one of the most accepted and recognised form of the trade unionism and in the process, sometimes you have to move one step backward in order to achieve two steps forward. Therefore, they decided to withdraw the case.
After all, they have gained significantly by filing their case in the Supreme Court, so, in a way, it was their victory. I have graduated to Advocacy through trade unionism and therefore welfare of the workers is of the uppermost importance for me. This was the reason that I gave my NOC without batting my eyelids. Nevertheless, they have promised me to pay the agreed amount of my fee. Senior Advocate Gopal Jain made the request for withdrawal of the case. Incidentally, Shri Gopal Jain is the elder brother of a left-leaning and a noted TV journalist Srinivasan Jain, who works for the NDTV24.
I wish all the best to my friends in Prabhat Khabar and I hope that they would keep the spirit of ‘unity and struggle’ burning among all the employees.

[Parmanand Pandey]


पढ़े- मजीठिया: प्रभात खबर के कुछ कर्मियों ने किया समझौता, मिथिलेश का इनकार http://patrakarkiawaaz.blogspot.in/2017/05/blog-post_57.html





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मजीठिया वीरों को समर्पित एक कविता

आ गया समय निकट अब जीत न्याय की होगी
इतिहास में दर्ज कहानी मजीठिया वीरों की होगी

मुश्किलें सही पर अन्याय, अनीति के आगे झुके नहीं
भामाशाहों की घुड़की के आगे कदम कभी रुके नहीं

उनके धैर्य और साहस की गाथा अमर रहेगी
हम न रहेंगे, तुम न रहोगे बस बातें अमर रहेंगी

धूर्त, कायरों को आने वाली नस्लें धिक्कारेंगी
स्वाभिमान बेचने वालों को उनकी संतानें धिक्कारेंगी

अपने हक की आवाज उठाने का जिसमें साहस ना हो
वह कैसा है पत्रकार जिसका आचरण बृहनला जैसा हो

अतीत झांक कर देखो कलम तुम्हारी क्रांति बीज बोती थी
चाहे जितनी हो तलवार तेज गुट्ठल होकर रह जाती थी

वही कलम आज कुछ पैसों की खातिर दासी लगती है
पत्रकारिता तो अब लाला बनियों की थाती लगती है

हमने अपना श्रम बेचा है जमीर का तो सौदा किया नहीं
खबरदार सदा मौन रहने का व्रत तो है हमने लिया नहीं

न्यायालय की नाफरमानी की सजा भुगतने को तैयार रहो
शोषण करने वालों काल कोठरी में रहने को तैयार रहो

देखेंगे धन बल, सत्ताबल कितना काम तुम्हारे आता है
कौन है वह माई का लाल जो तुम्हें बचाने आता है

मनोज शर्मा
(जुझारु और क्रांतिकारी साथी मनोज शर्मा हिंदुस्‍तान बरेली में संपादकीय सेवाएं देने के साथ-साथ वकालत भी करते हैं।) 




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मजीठिया: प्रभात खबर के कुछ कर्मियों ने किया समझौता, मिथिलेश का इनकार

झारखंड और बिहार के प्रमुख समाचार पत्र प्रभात खबर के कुछ कर्मचारियों द्वारा माननीय सुप्रीमकोर्ट में लगाए गए अखबार प्रबंधन के खिलाफ अवमानना मामले को सुप्रीमकोर्ट से वापस ले लिया गया है। उधर, प्रभात खबर के ही एक अन्‍य कर्मचारी मिथिलेश कुमार ने प्रबंधन के आगे न झुकने का फैसला लिया है।

बताते हैं कि प्रभात खबर प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच कोई समझौता हुआ है, जिसके बाद इन कर्मचारियों ने अपना मामला सुप्रीमकोर्ट से वापस ले लिया है।
प्रभात खबर के कमल कुमार गोयनका के खिलाफ इसी समाचार पत्र के वरिष्ठ समाचार संपादक सत्यप्रकाश चौधरी और इसी अखबार के 7 कर्मचारियों ने माननीय सुप्रीमकोर्ट में केस नंबर 108 के तहत अवमानना का केस लगाया था। इस केस के लगाने के बाद प्रबंधन के हाथ पैर फूल गए और पहले कर्मचारियों में किसी का सिलीगुड़ी तो किसी का अन्यत्र स्थानांतरण किया गया। यहीं नहीं कई कर्मचारियों को बाहर का रास्ता भी दिखा दिया गया था।

प्रबंधन ने अपने आपको बचाने के लिए इन सात कर्मचारियों से समझौता कर लिया और बकायदा इसकी जानकारी फाइनल सुनवाई के दिन जिस दिन इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया गया माननीय सुप्रीम कोर्ट को भी दी। ऐसी जानकारी मिली है कि कर्मचारियों को प्रबंधन ने समझौते का आफर दिया था। जिसे कर्मचारियों ने स्वीकार किया और यह समझौता होने के बाद प्रभात खबर के सत्यप्रकाश चौधरी वर्सेज कमल कुमार गोयनका मामले को माननीय सुप्रीमकोर्ट से वापस ले लिया गया। इस मामले में प्रभात खबर के सत्यप्रकाश चौधरी ने यह तो स्वीकार किया कि उन्‍होंने और उनके साथियों ने सुप्रीम कोर्ट से अपना केस वापस ले लिया है, मगर यह नहीं बताया कि प्रभात खबर प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच क्या समझौता हुआ है।
हालांकि सूत्रों का दावा है कि प्रभात खबर के इन कर्मचारियों को प्रबंधन ने कोई खास लाभ नहीं दिया है। सत्यप्रकाश चौधरी ने कहा कि उन्‍होंने अपना पक्ष फेसबुक पर लिखा है।

दूसरी ओर प्रभात खबर के ही आरा (बिहार) के ब्‍यूरो चीफ मिथिलेश कुमार ने प्रबंधन के सामने झुकने से साफ इंकार कर दिया है और साफ कहा है कि वे बिना अपनी मेहनत की पाई पाई लिए पीछे हटने को तैयार नहीं है। मिथिलेश ने खुद फोन करके जानकारी दी कि उनके पास भी प्रबंधन का आफर आया था, मगर वह संतोष जनक नहीं था और मैं अपनी मेहनत का एक एक पैसा लिए बिना पीछे हटने वाला नहीं हूं। मिथिलेश ने अपने तबादले के विरोध में सुप्रीमकोर्ट में केस नंबर 998/2016 दायर किया हुआ है। जबकि जिन कर्मचारियों ने अपना मुकदमा वापस लिया है उसका 2015 का केस नंबर 108 है।

मजीठिया वेजबोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे मिथिलेश कुमार का प्रबंधन ने तबादला कर दिया तो कुमार ने सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपने एडवोकेट दिनेश तिवारी के जरिये गुहार लगा दी थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मिथिलेश के ट्रांसफर पर अंतरिम रोक लगा दी थी। मगर फिर भी प्रभात खबर प्रबंधन ने उन्‍हें ज्वाईन नहीं कराया। जिसके बाद यह मामला 3 मई 2017 को मिथिलेश कुमार के अधिवक्ता दिनेश तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट  में न्यायाधीश रंजन गोगोई के सामने रखा था।
प्रभातखबर के कुछ अन्य कर्मचारियों ने भी कहा है कि वे फिलहाल अपना पूरा अधिकार लिए प्रबंधन से समझौता नहीं करने जा रहे हैं। क्‍योंकि प्रबंधन उनसे समझौते के नाम पर छलावा कर रहा है।  

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट
9322411335

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हिन्दुस्तान बरेली ने आईटी मैनेजर समेत दस कर्मियों को बाहर निकाला, जी बिजनेस में भी छंटनी


बरेली। मजीठिया वेजबोर्ड के अनुरूप वेतन और भत्ते ना देने के मामले में अवमानना के केस में सुप्रीम कोर्ट के संभावित कड़े फैसले के आने से पहले ही हिन्दुस्तान प्रबंधन बुरी तरह बौखला गया है। बौखलाहट में हिन्दुस्तान प्रबंधन ने स्टाफ को और भी कम करना शुरू कर दिया है ताकि मजीठिया मांगने और प्रबंधन की मुखालफत करने के लिए शेष बचे कर्मचारी हिम्मत ना जुटा सकें। इस समय हिंदुस्तान बरेली में स्टाफ बहुत कम है। जो लोग कार्यरत हैं, वे अभी भी पांच-पांच आदमियों के काम का बोझ उठाकर उफ्फ भी नहीं कर पा रहे हैं। ये लोग मजीठिया वेतनमान व एरियर मिलने की उम्मीद पाले हुए नौकरी कर रहे हैं।

ऐसी सूचना आ रही है कि प्रबंधन ने बरेली यूनिट के आईटी मैनेजर हरिओम गुप्ता को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। उनकी जगह पर लखनऊ से रमेश कुमार ने आकर आईटी मैनेजर की कुर्सी संभाल ली है। हरिओम गुप्ता को पहले नोयडा बुलाया गया फिर उनको मना कर दिया गया। इतना ही नहीं, हिन्दुस्तान प्रबंधन ने कई सालों से बरेली यूनिट में कार्यरत गरीब मेहनतकश चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के भी पेट पर लात मार दी है। ये कर्मचारी रोजी-रोटी खोकर सड़क पर आ गए हैं। इनमें ऑफिस कर्मचारी विपिन कुमार राणा, राजेश कुमार शर्मा, माली विजयपाल, हाउस कीपर सुभाष वाल्मिकी, प्रोडक्शन के सुशील कुमार और पैकिजिंग सेक्शन के चार कर्मचारी हैं।

चपरासी के बतौर अब सिर्फ अर्जुन सिंह तोमर ही कार्यरत हैं। उनके भी कार्य करने के घंटे बढ़ा दिए गए हैं। कल तक चपरासी पानी पिलाते थे। अब हर कर्मचारी के आगे एक बार पानी की बोतल भरकर रख दी जा रही है। पहले चपरासी दो बार कंपनी की ओर से चाय वितरण करते थे। अब नई व्यवस्था में चाय की मशीन ऑफिस के अंदर ही लगा दी गयी है। जिस कर्मचारी को चाय पीनी हो, वह स्वयं मशीन पर जाकर चाय लेकर पिए।

सुप्रीम कोर्ट की लगातार अवमानना करके न्यायपालिका को खुली चुनौती दे रहे बेख़ौफ़ हिन्दुस्तान प्रबंधन के बरेली में मजीठिया को लेकर इस कड़े कदम से हड़कंप मचा हुआ है। ख़ामोशी से नौकरी कर रहे कर्मचारियों की भी अब उम्मीद टूटने लगी है कि वफ़ादारी के एवज में प्रबंधन उनको बिना लड़े मजीठिया वेजबोर्ड का कोई लाभ देगा। अभी तक क्लेम ना करने वाले चुपचाप नौकरी कर रहे हिन्दुस्तानी भी अब नए हालात पर मंथन कर रहे हैं।

मालूम हो कि बरेली में 31 मार्च को डीएलसी ने हिंदुस्तान के चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा के पक्ष में 25,64,976 रूपये, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के पक्ष में 33,35,623 रूपये और सीनियर सब एडिटर निर्मलकांत शुक्ला के पक्ष में 32,51,135 रूपये की वसूली के लिए हिन्दुस्तान बरेली के महाप्रबंधक/यूनिट हेड और स्थानीय संपादक के नाम आरसी जारी करके जिलाधिकारी, बरेली को भेज दी थी जो कि वसूली की प्रक्रिया में है।

इस बीच, फिल्म सिटी नोएडा से सूचना आ रही है कि इनक्रीमेंट के दिन ही जी बिजनेस चैनल से दर्जन भर से ज्यादा पत्रकार बाहर निकाल दिए गए। जी बिजनेस के कर्मचारी इनक्रीमेंट की चिट्ठी का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन उन्हें एचआर विभाग ने बिना कारण बताए नौकरी से चलता कर देने की चिट्ठी दे दी। जो लोग निकाले गए हैं उनमें डेस्‍क प्रभारी, प्रोग्रामिंग प्रभारी, सीनियर प्रोड्यूसर, पांच प्रोड्यूसर, एक एंकर और दो एएफपी शामिल हैं।


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Thursday, 4 May 2017

जेल जाने के खौफ से जागरण प्रबंधन ने की योगी से मुलाकात


महाराष्ट्र में भी सीएम और उनकी बीबी से मिलने का अखबार मालिक लगा रहे हैं जुगाड़

जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट की अवमानना को लेकर देशभर के अखबार मालिकों में खौफ का माहौल है। सूत्रों का दावा है कि सुप्रीमकोर्ट के सख्‍त तेवर के बाद सभी अखबार मालिक अब अपने अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पटाने में लगे हैं। दैनिक जागरण से सूत्रों ने खबर दी है कि सुप्रीमकोर्ट के बुधवार को अपनाए गए कड़े तेवर के बाद लखनऊ में दैनिक जागरण प्रबंधन की एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गयी। उसके बाद जागरण के आलाअधिकारियों ने गोपनीय रूप से राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। सूत्रों का तो यहाँ तक दावा है कि योगी आदित्यनाथ से जागरण प्रबंधन ने मंगलवार को भी मिलने का प्रयास किया था मगर योगी आदित्यनाथ ने उन्हें मंगलवार को समय नहीं दिया। उसके बाद बुधवार को जागरण प्रबंधन की योगी आदित्यनाथ से बैठक हुई। हालांकि अभी तक सूत्रों के इस दावे की पुष्टि नहीं हुई है। सूत्रों का तो यहाँ तक दावा है कि मुख्यमंत्री से मुलाकात की योजना को जागरण प्रबंधन ने काफी गुप्त रखा। यहाँ तक की जागरण के मालिकों की गाड़ी चलाने वाले ड्राइवरों की जगह मुख्यमंत्री से मिलने के लिए जाते समय बाहरी ड्राइवरों की सेवाएं ली गयी।

महाराष्ट्र से भी खबर आ रही है कि यहाँ कई अखबार मालिक जहाँ मुख्यमंत्री से मुलाकात के लिए समय मांग रहे हैं वही कई अखबार मालिक तो मुख्यमंत्री की श्रीमती जी से ही मिलकर अपनी समस्या उन्हें बताने वाले हैं। कई अखबार मालिक तो मुख्यमंत्री की श्रीमती जी के सम्मान समारोह आयोजित करने का जुगाड़ लगाकर अपनी बात उनके तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

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Wednesday, 3 May 2017

मजीठिया: अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना पर सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित


जयपुर। देशभर के प्रिंट मीडिया संस्थानों द्वारा जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों लागू नहीं करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने पर देशभर के पत्रकारों व गैर पत्रकारों की ओर से दायर अवमानना याचिकाओं पर बुधवार, 3 मई 2017 को सुनवाई पूरी हो गई। दोनों पक्षों मीडिया संस्थानों और पत्रकार-गैर पत्रकारों की तरफ से बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

बुधवार को भी पत्रकारों-गैर पत्रकारों के व़कील कॉलिन, परमानंद पाण्डे, उमेश शर्मा ने जोरदार पैरवी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मीडिया संस्थान अपने कर्मचारियों को वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप एरियर व वेतनमान नहीं दे रहे हैं। बल्कि वेजबोर्ड की मांग करने वाले कर्मचारियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्हें बर्खास्‍त करके या तबादला करके प्रताड़ित किया जा रहा है। इस संबंध में कोर्ट के समक्ष कर्मचारियों के हलफनामे व कंपनी की बैलेंसशीट भी पेश की गई। साथ ही वकीलों ने ऐसे हालात में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना नहीं करने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने, जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को मीडिया संस्थानों में लागू करवाने और प्रता‍ड़ित किए गए कर्मचारियों को रिलीफ दिलवाने की गुहार की।

मीडिया संस्थानों के वकीलों ने भी 20जे की आड़ लेते हुए कोर्ट से कहा कि कर्मचारी अपनी स्वेच्छा से बेजबोर्ड नहीं लेने की लिखकर दे रहे हैं। मीडिया संस्थानों ने कोई अवमानना नहीं की है और ना ही कर्मचारियों पर दबाव व प्रताड़ना की गई है। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस रंजन गोगई की दो जजों की खंडपीठ ने अवमानना याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया।

यह है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी, 2014 को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरुप पत्रकारों व गैर पत्रकार कर्मियों को वेतनमान, एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप नवम्बर 2011 से एरियर और अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं, लेकिन इस आदेश की पालना मीडिया संस्थानों नहीं की। देश के नामी गिरामी अखबार समूह राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, पंजाब केसरी जैसे अखबारों में वेजबोर्ड लागू नहीं किया गया और नवभारत टाइम्स, अमर उजाला आदि में लागू किया गया भी तो आधा अधूरा। मीडिया संस्थानों ने वेजबोर्ड देने से बचने के लिए मीडियाकर्मियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं चाहिए।

जिन कर्मचारियों ने इनकी बात नहीं मानी, उन्हें स्थानांतरण करके प्रताड़ित किया जा रहा है और बहुत बड़ी संख्‍या में कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिसमें दैनिक जागरण द्वारा गांधी जयंती पर 2 अक्‍टूबर 2015 को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर दिल्‍ली, नोएडा, हिसार, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के लगभग 350 कर्मियों भी शामिल हैं।

मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू करवाने में विभिन्‍न राज्‍यों के श्रम विभागों की कोताही ही भी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आई। वेजबोर्ड लागू नहीं करने पर पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिकाएं दायर की। देश भर से सभी बड़े अखबारों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं लगी हुई हैं।


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