Wednesday, 3 May 2017

मजीठिया: अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना पर सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित


जयपुर। देशभर के प्रिंट मीडिया संस्थानों द्वारा जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों लागू नहीं करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने पर देशभर के पत्रकारों व गैर पत्रकारों की ओर से दायर अवमानना याचिकाओं पर बुधवार, 3 मई 2017 को सुनवाई पूरी हो गई। दोनों पक्षों मीडिया संस्थानों और पत्रकार-गैर पत्रकारों की तरफ से बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

बुधवार को भी पत्रकारों-गैर पत्रकारों के व़कील कॉलिन, परमानंद पाण्डे, उमेश शर्मा ने जोरदार पैरवी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मीडिया संस्थान अपने कर्मचारियों को वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप एरियर व वेतनमान नहीं दे रहे हैं। बल्कि वेजबोर्ड की मांग करने वाले कर्मचारियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्हें बर्खास्‍त करके या तबादला करके प्रताड़ित किया जा रहा है। इस संबंध में कोर्ट के समक्ष कर्मचारियों के हलफनामे व कंपनी की बैलेंसशीट भी पेश की गई। साथ ही वकीलों ने ऐसे हालात में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना नहीं करने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने, जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को मीडिया संस्थानों में लागू करवाने और प्रता‍ड़ित किए गए कर्मचारियों को रिलीफ दिलवाने की गुहार की।

मीडिया संस्थानों के वकीलों ने भी 20जे की आड़ लेते हुए कोर्ट से कहा कि कर्मचारी अपनी स्वेच्छा से बेजबोर्ड नहीं लेने की लिखकर दे रहे हैं। मीडिया संस्थानों ने कोई अवमानना नहीं की है और ना ही कर्मचारियों पर दबाव व प्रताड़ना की गई है। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस रंजन गोगई की दो जजों की खंडपीठ ने अवमानना याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया।

यह है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी, 2014 को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरुप पत्रकारों व गैर पत्रकार कर्मियों को वेतनमान, एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप नवम्बर 2011 से एरियर और अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं, लेकिन इस आदेश की पालना मीडिया संस्थानों नहीं की। देश के नामी गिरामी अखबार समूह राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान टाइम्स, पंजाब केसरी जैसे अखबारों में वेजबोर्ड लागू नहीं किया गया और नवभारत टाइम्स, अमर उजाला आदि में लागू किया गया भी तो आधा अधूरा। मीडिया संस्थानों ने वेजबोर्ड देने से बचने के लिए मीडियाकर्मियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं चाहिए।

जिन कर्मचारियों ने इनकी बात नहीं मानी, उन्हें स्थानांतरण करके प्रताड़ित किया जा रहा है और बहुत बड़ी संख्‍या में कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिसमें दैनिक जागरण द्वारा गांधी जयंती पर 2 अक्‍टूबर 2015 को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर दिल्‍ली, नोएडा, हिसार, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के लगभग 350 कर्मियों भी शामिल हैं।

मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू करवाने में विभिन्‍न राज्‍यों के श्रम विभागों की कोताही ही भी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आई। वेजबोर्ड लागू नहीं करने पर पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिकाएं दायर की। देश भर से सभी बड़े अखबारों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं लगी हुई हैं।


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RESOLUTION TO MARK WORLD PRESS FREEDOM DAY, 2017

New Delhi. On the eve of World Press Freedom Day, May 3, 2017, we the members of the Delhi Union of Journalists uphold our right to report, comment, write and express our views and observations through the electronic and visual media frankly, freely and fearlessly.

We deeply regret the growing intolerance in our country which threatens the freedoms of both the media and the citizenry. A climate of fear is being created through increasing attacks on common people by goons and vigilantes.  Attacks on the media are growing. Journalists in conflict prone areas are being beaten up, hounded out, jailed or killed.

Journalists who expose corruption are also being targeted. A new weapon is the use of ‘slap suits’ or defamation cases against journalists. These entangle journalists in expensive court battles with the sword of heavy punitive damages hanging over their heads. Media outfits often leave the journalist to fight such battles on their own, particularly if the journalist is a freelancer.

The other routinely used weapon is targeted verbal attacks through the social media. Trolling seems to have become the norm, with Google, Facebook and similar media refusing to take any serious action to stop it. Women journalists in particular face sexually abusive comments for daring to voice their opinions.

We also condemn the growing pressures on media persons to conform to certain manufactured political narratives. We regret that the electronic media in particular is being misused by a nexus of corporate and political interests to promote sectarian hatreds, Islamophobia, Pakistan phobia and other ills. We call upon all journalists to resist such pressures and refrain from promoting divisive, polarizing and communal political agendas. 

We urge all journalists to retain their independence and report freely and objectively in these difficult times when the media’s credibility is under serious threat. A free media is an essential element of democracy and we must defend it with all our skills.


[Press Release]

Tuesday, 2 May 2017

जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड मामले में अवमानना पर सुनवाई आज



देश भर के प्रिंट मीडिया कर्मियों के वेतन और एरियर तथा प्रमोशन से जुड़े जस्टिस मजीठिया व़ेजबोर्ड मामले में अखबार मालिकों द्वारा किए गए सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना मामले पर आज बुधवार 3 मई 2017 को माननीय सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई होगी। यह सुनवाई कोर्ट नंबर चार में आयटम नंबर नौ के तहत होगी। इस सुनवाई को लेकर देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों की नजर सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर होगी। इस सुनवाई को लेकर अखबार मालिकों के चेहरे पर अभी से हवाईयां उड़ने लगी हैं। मीडियाकर्मियों की तरफ से इस मामले में बुधवार को एडवोकेट प्रशांत भूषण, वरिष्‍ठ व़कील कोलिन गोंसाल्विस, चर्चित एडवोकेट उमेश शर्मा और परमानंद पांडे आदि अपना पक्ष रखेंगे। आपको बता दें कि अगर अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना का मामला साबित हो गया तो उन्हें जेल भी जाना पड़ेगा और मीडियाकर्मियों को उनका बकाया एरियर भी ब्याज के साथ देना पड़ेगा। साथ ही वेतन वृद्धि भी करनी पड़ेगी। इस सुनवाई के लिए देश भर के प्रिंट मीडिया के पत्रकार नई दिल्ली में डेरा डाल चुके हैं।  

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
9322411335

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Thursday, 27 April 2017

मजीठिया: अगली सुनवाई तीन मई को



देश भर के मीडियाकर्मियों के वेतन और एरियर से जुड़ी जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड मामले में अखबार मालिकों के खिलाफ चल रहे अवमानना मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट में गुरुवार को दो चरणों में सुनवाई हुई।

सुनवाई के दौरान अखबार मालिकों की तरफ से पहले दैनिक जागरण के एडवोकेट अनिल दिवान के निधन पर समय लेने का प्रयास किया गया, मगर विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अखबार मालिकों को कोई भी रियायत देने से मना कर दिया। उसके बाद सुनवाई में चर्चित एडवोकेट प्रशांत भूषण ने शानदार तरीके से मीडियाकर्मियों का पक्ष रखा। इस दौरान सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंसाल्विस और एडवोकेट उमेश शर्मा तथा परमानंद पांडे ने भी मीडियाकर्मियों का दर्द अदालत के समक्ष रखा। उसके बाद दोपहर तीन बजे का समय अखबार मालिकों के एडवोकेट को दिया गया। जिन्‍होंने अपने तर्क अदालत के समक्ष रखे। अब इस मामले की अगली सुनवाई तीन मई को निर्धारित की गई है। आज हुई सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष पूरी तरह मीडियाकर्मियों से भरा हुआ था और देशभर के मीडियाकर्मी इस दौरान सुनवाई के लिए सुप्रीमकोर्ट में उपस्थित थे।


शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
9322411335

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Wednesday, 26 April 2017

मजीठिया: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कल तक के लिए टली



मजीठिया वेजबोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज यानि 26 अप्रैल को अखबार मालिकों के खिलाफ चल रहे अवमानना मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। इसे कल तक यानि 27 अप्रैल तक के लिये टाल दिया गया है। तकनीकी भाषा में कहें तो आज यह सुनवाई समयाभाव के कारण बोर्ड पर नहीं आ पायी। अब गुरुवार को इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर चार में आयटम नंबर 9 के तहत होगी। अखबार मालिकों ने केंद्र सरकार द्वारा गजट होने और माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा आदेशित किए जाने के बाद भी अपने मीडियाकर्मियों को जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड का लाभ नहीं दिया। इसी को लेकर अवमानना के सैकड़ों केसों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है।

बताते हैं कि एक पुराने मामले की सुनवाई बुधवार को चल रही थी जिसकी सुनवाई में लंबा समय लग गया, इसलिए बाकी मामलों को गुरुवार तक के लिये टाल दिया गया। ये सुनवाई सुप्रीमकोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई की खंडपीठ करेगी। इस सुनवाई में मीडियाकर्मियों की तरफ से जाने माने एडवोकेट प्रशांत भूषण और सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंसाल्विस तथा चर्चित एडवोकेट उमेश शर्मा एवं परमानंद पांडे मीडियाकर्मियों का पक्ष रखेंगे।

इस मामले की सुनवाई कई महीने बाद हो रही है। पहले इस अवमानना मामले की सुनवाई सिर्फ मंगलवार को होती थी, मगर पहली बार नए कंप्यूटराइज सिस्टम का उपयोग किया गया और मंगलवार को होने वाली ये सुनवाई अब रविवार को छोड़कर किसी भी दिन होगी। 27 अप्रैल को होने वाली अवमानना मामले की सुनवाई पर देश भर के मीडियाकर्मियों और अखबार मालिकों की नजर है। माना जा रहा है कि 27 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में सुप्रीमकोर्ट कुछ कड़ा कदम उठा सकता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
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Saturday, 22 April 2017

MCD चुनाव: पत्रकार साथियों इस बार वोट उसे ही दें जो आपकी सुने



मतदाताओं को वोट की कीमत समझाने वाले पत्रकार साथियों अब आपको भी अपने वोट की कीमत समझनी चाहिए। नौकरी में रहते हुए हमारी मजबूरी होती है कि हम संस्‍थान की नीतियों के विरुद़ध नहीं लिख सकते हैं। ऐसे में हम कई बार जमीनी हकीकत को भी नजरअंदाज कर चुनाव के वक्‍त किसी एक ही पार्टी के पक्ष में लगातार रिपोर्टिंग करते हैं, क्‍योंकि हमारे अपने संस्‍थान के उस राजनीतिक पार्टी से कोई न कोई हित जुड़े हुए होते हैं। हम पाठक को वो ही पढ़ाना या दिखाना चाहते हैं जो हमारा संस्‍थान चाहता है, ना कि पाठक या दर्शक। ये हमारी पेशागत नहीं पापी पेट की मजबूरी होती है। ऐसे कई कारणों से ही ये मीडिया मालिक हमारा शोषण करते हैं और हम उर्फ तक भी नहीं कर पाते। क्‍योंकि हम जानते हैं कि ताकतवर मीडिया मालिकों के प्रभाव में प्रशासन हमारी नहीं सुनने वाला। यही कारण है कि आज मजीठिया वेजबोर्ड मांगने वाले देशभर के हमारे दैनिक भास्‍कर, दैनिक जागरण, राजस्‍थान पत्रिका आदि के कई हजार साथियों को या तो नौकरी से निकाल दिया गया या उन्‍हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। हम अभी तक पूरी तरह से एकजुट नहीं हो पाए हैं इसलिए हम अखबार मालिकों के दमन चक्र का लगातार शिकार हो रहे हैं।

हाल ही में नोएडा में देश के नामी अखबारों में शामिल हिंदुस्‍तान ने 15-16 मशीन के साथियों का जबरन इस्‍तीफा ले लिया और ऐसी सूचनाएं आ रही हैं कई अन्‍य को भी जबरन इस्‍तीफा देने का दवाब बनाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि खुद इस्‍तीफा नहीं दिया तो हम खुद तुम्‍हें निकाल कर तुम्‍हारी गेजुय्‍टी आदि भी रोक देंगे। ऐसी ही एक अन्‍य सूचना आई है कि दैनिक जागरण के उच्‍चाधिकारियों ने भोपाल में कर्मचारियों के साथ बैठक कर नई दुनिया के कर्मचारियों पर केस वापस लेने का दबाव बनाया और जो साथी मुखर हुआ उसे बैठक से बाहर जाने का आदेश दिया। भोपाल में ही डेरा जमाए अधिकारी ये भी धमकी दे रहे हैं कि आपने ऐसा नहीं किया तो हम भोपाल की प्रिटिंग यूनिट को ही बंद कर देंगे।     

यही हाल देश के अन्‍य नामी गिरामी अखबारों का भी है, जो लगातार आपके हकों पर डाका डाल रहे हैं या उसके लिए तरह तरह के प्रपंच रच रहे हैं। यहां ये भी कहना चाहूंगा कि सरकारें हमारे लिए वेजबोर्ड तो बना देती हैं, परंतु प्रभावशाली मीडिया मालिकों के कारण इसे पूरी तरह से लागू कराने में कोई दिलचस्‍पी नहीं लेती। यदि वे चाहे तो क्‍या कुछ नहीं हो सकता, क्‍या अखबार मालिक सरकार से ऊपर हैं।
ऐसे कई उदाहरण हैं जहां अपने खिलाफ रिपोर्ट लिखने वाले कई पत्रकारों की नौकरी केंद्र व कई राज्‍यों की सरकारों ने समय समय पर खा ली। जब वे अपने खिलाफ लिखने वाले पत्रकार की नौकरी खा सकते हैं तो क्‍या अपनी ताकत का प्रयोग कर पत्रकारों का शोषण नहीं रुकवा सकते। रुकवा सकते हैं, परंतु ऐसा नहीं होता कारण आप भी जानते हैं।

साथियों जब तक हम एकजुट नहीं होंगे, तब तक हमारा शोषण इसी तरह होता रहेगा। मैं दिल्‍ली निवासी तो नहीं हूं परंतु इतना जानता हूं कि यहां हमारे साथियों की तादाद बहुत अच्‍छी संख्‍या में है। यहां कुछ एक ऐसे पोलिंग बूथ भी हैं जहां वे अपने परिजनों के वोटों के साथ एमसीडी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। आप को बस इतना ही आंकलन करना है कि कौन सी पार्टी मीडिया धरानों की नाराजगी मोल लेकर खुलकर पत्रकारों का पक्ष लेती है या पत्रकारों के पक्ष में अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए कानून में कुछ अच्‍छे प्रावधान करती है। आखिरी में आप से इतना ही कहना चाहूंगा कि मजीठिया के लिए संघर्षरत अपने हजारों साथियों का ध्‍यान रखते हुए इस बार अपना व अपने परिवार के वोट का सही इस्‍तेमाल करें।

जय मजीठिया

रवि कुमार, मप्र

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