Sunday, 31 May 2020

मजदूरों, श्रमिकों और रोज कमाने वालों के हित में सरकार को कुछ सुझाव


1- केंद्र सरकार सभी मजदूरों और कामगारों, फेरीवालों तथा रिक्शा ठेला चलाने वालों का चाहे वह किसी भी फील्ड में हो कैम्प लगाकर निशुल्क रजिस्ट्रेशन करके उनका पूरा डेटा और बैंक डिटेल अपने पास रखे तथा जिनका बैंक खाता नहीं है उनका खाता अनिवार्य खुलवाए।

2- सरकार आधार कार्ड की तरह इनको एक निशुल्क डिजिटल कार्ड दे और ये मजदूर, रिक्शा वाले ठेला वाले, हॉकर, श्रमिक जिस राज्य में काम कर रहे हैं।उ सका डेटा राज्य सरकार के श्रम विभाग में हो।


3- बिना इस डिजिटल कार्ड के कार्य करने की अनुमति न दी जाए जिससे मजबूरी में ये सभी लोग कार्ड बनवाएं। और श्रम निरीक्षक कल कारखानों, बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन पर जाकर इस बात की जांच करें कि बिना कार्ड के कोई वर्कर काम तो नही कर रहा है। अगर कर रहा है तो उसके मालिक और वर्कर दोनों को फाइन लगाएं। जिससे वर्कर कार्ड बनवा लें।

4- लॉकडाउन जैसे हालात पैदा होने पर सीधे इन मजदूरों, रिक्शावाले ठेला वाले, फेरी वालों के खाते में 15-15 हजार रुपये तीन महीने के लिए ट्रांसफर कर दिए जाएं। ताकि कोई भी मजदूर या रिक्शा ठेला वाले, फेरी वाले उन तीन महीने में घर से बाहर न निकले। देखिए कोई मजदूर बाहर नहीं निकलेगा। फिर अगर वह बिना ठोस कारण के निकल रहा है तो उसे फाइन लगाया जाए।

5- सभी लोगों को कोरोना की निशुल्क जांच कराना अनिवार्य किया जाए और इसके लिए निजी अस्पतालों और स्वयंसेवी संस्थाओं, नगर सेवक और ग्राम प्रधानों की मदद से कलेक्शन सेंटर सभी स्कूलों में बनाया जाए।

6- जिन कर्मचारियों को उनके मालिकों ने वेतन नहीं दिया या वेतन काटा उनसे राज्य सरकार का श्रम विभाग उनकी तीन साल की बैलेंसिट और प्रॉफिट एन्ड लॉस एकाउंट और कर्मचारियों की लिस्ट मंगाए और वास्तव में वह कंपनी घाटे में जा रही है तो उससे कर्मचारियों की पूरी लिस्ट और कर्मचारियों का बैंक डिटेल लेकर कर्मचारियों के खाते में सरकार उनकी सेलरी का पैसा तीन महिने ट्रांसफर करें और कंपनी मालिक से पांच साल में इसकी बिना ब्याज के इसकी वसूली करे।

7- सभी छोटी बड़ी कंपनियों को यह अनिवार्य किया जाए कि बिना नियुक्ति पत्र, आईकार्ड दिए आप किसी कर्मचारी को नहीं रख पाएंगे और नियुक्ति पत्र की डिजिटल प्रति राज्य सरकारों के श्रम विभाग को भी देना अनिवार्य होना चाहिए। अगर कंपनी मालिक ऐसे नहीं करते तो उन्हें भारी जुर्माना लगाया जाए।

8- किसी कर्मचारी का ट्रांसफर टर्मिनेशन या प्रमोशन होता है तो उसकी भी सूचना कंपनी अधिकारियों को श्रम विभाग को देना अनिवार्य हो ताकि श्रम विभाग के पास पूरा डेटा रहे।

9- लॉकडाउन के दौरान जितने कर्मचारियों की छंटनी हुए है उन्हें सरकार कुछ राहत दे तथा प्रयास करे कि जिन कंपनियों ने उनकी छटनी की है उन्हें वापस काम पर रखें अगर वास्तव में वह घाटे में नहीं जा रही हैं तो।

10- सरकार फ्रीलान्स कार्य करने वालों, मार्केटिंग वालों और छोटे दुकानदारों का भी अलग कटेगरी में रजिस्ट्रेशन करे और उन्हें राहत दे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता
9322411335

Saturday, 30 May 2020

मुट्ठी भर को छोड़ दें तो आज भी अधिकांश पत्रकार ईमानदार


- कारपोरेट जर्नलिज्म के खतरे और चुनौतियां भी हैं बहुत
- ऐसे में क्यों कहते हो, मीडिया बिकाऊ है!

आज सुबह राष्ट्रीय सहारा देहरादून के एक साथी का फोन आया। पूछा, यार वो राशन बांट रहे थे न तुम। मुझे भी दिला दो। बात मजाक में थी लेकिन मर्म सीधा सा था कि सहारा ने अप्रैल माह का वेतन अब तक नहीं दिया। पिछले छह साल से सहारा में ऐसा ही हो रहा है। दिल्ली पंजाब केसरी के फोटो जर्नलिस्ट के.के. शर्मा और आगरा दैनिक जागरण के पंकज कुलश्रेष्ठ का कोरोना के कारण निधन हो चुका है। देश भर में कई पत्रकार, छायाकार और अन्य मीडियाकर्मी कोरोना महामारी के बीच भी डटे हुए हैं। उनके पास न पीपीई किट है, न अच्छे मॉस्क और न लंबे माइक। हर पल कोरोना का संकट और उससे भी अधिक नौकरी जाने का भय। देश के सभी प्रमुख न्यूजपेपर मालिकों ने सबसे पहले इन्हीं सड़क पर फिरने वाले पत्रकारों का कत्लेआम किया।

सैकड़ों पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को केवल फोन से ही सूचना मिली कि कल से आफिस मत आना। इनमें नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान समेत कई बड़े अखबार शामिल हैं।

ये पत्रकार कौन हैं? क्या बेईमान हैं? क्या ग्लेमर के कारण? क्या उन्होंने मिशनरी बनने की शपथ ली है? आखिर क्यों चुनते हैं ये वो पेशा? कई सवाल जनमानस के मन में होते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि पत्रकार वो होते हैं जिनके जज्बात होते हैं, दूर तक देखने और जूझने की ताकत होती है। जिनके मन में आग होती है, वही पत्रकार होते हैं।

एक शब्द सीधा दिल को चुभता है कि मीडिया बिकाऊ है। मैं कहता हूं, महज दस प्रतिशत पत्रकार ही बिकाऊ होते हैं लेकिन 90 प्रतिशत ईमानदार हैं। हां, इतना जरूर है कि इन ईमानदारों की कमान बेईमानों के पास होती है। तो क्या ये कसूर ईमानदार पत्रकारों का है? या व्यवस्थागत खामियां का या प्रबंधन के लालच का।

आज पत्रकारिता के अनेकों जोखिम हैं। सरकार बेवजह केस कर देती है। जेल भेज देती है। रासुका, आपदा, यूएपीए आदि सब कानून हम पर भी लागू होते हैं यानी पत्रकार न हुए गैगस्टर या बदमाश हो गए। हम पर नेता और माफिया हमला कर देते हैं। जान तक ले लेते हैं। पिछले कुछ समय से पत्रकारों पर जानलेवा हमलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। चार-पांच साल में देश में 70 से ज्यादा पत्रकारों की हत्याएं हो चुकी हैं। यदि गौरी लंकेश की बात छोड़ दी जाएं तो देश में किसी पत्रकार की हत्या पर कहीं चूं तक नहीं हुई। यदि नेता और माफिया छोड़ दें तो नक्सली मार देते हैं। पत्रकार अच्युतानंद साहू भी नक्सलियों के हमले के शिकार हो गए थे।

इस सबके बावजूद अधिकांश पत्रकार निडर, ईमानदार और स्वाभिमानी हैं। वो भूखें रह जाएंगे पर किसी से कुछ न कहेंगे। आरएनआई ने पिछले दो माह के आंकड़े जारी कर कहा है कि कोरोना के कारण हिन्दी मीडिया को 4500 करोड़ का नुकसान हुआ है। और अगले सात महीने तक यह नुकसान बढ़कर ढाई लाख करोड़ तक हो सकता है। यानी मीडियाकर्मियों की नौकरी आगे भी खतरे में ही है।

लॉकडाउन के दौरान देखते ही देखते मीडिया में पत्रकारों का कत्लेआम शुरू हो गया और आज तक जारी है लेकिन मजाल कया है कि केंद्र सरकार ने एक भी कदम उठाया हो। कुछ एक पत्रकार संगठनों ने भी सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर को चिट्ठी लिख कर इतिश्री कर ली। न जनता और न नेता, न अफसर, कोई पत्रकारों के हितों की बात नहीं करता। यह हम पत्रकारों की नियति है कि हम दूसरों के दुख-दर्द का ढिंढोरा जग में पीटते हैं और खुद गुप-चुप अपना दुख सह लेते हैं। फिर ऐसे में क्यों कहते हो, कि मीडिया बिकाऊ है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

Hindi Journalism is to Emerge Strong after Corona Time

Lucknow May 30. Indian federation of Working Journalists (IFWJ) today organised a Webinar on ‘Hindi journalism: Future and its Challenges’ on the occasion of Hindi Patrakarita Diwas. All speakers were of the view that while the media as a whole is passing through the economic recession, Hindi media like others has also been very badly hit during the Corona time. Hundreds of media houses have pulled down their shutters and thousands of employees have either lost their jobs or their wages have been drastically reduced.

The latest issue of the Hindi monthly ‘Media Manch’ being published from Lucknow for the last twenty-two years was also released on this day. The IFWJ Vice President Hemant Tiwari told that the Media Manch is distinct from other newspapers and magazines because it is not brought out by any industrial house but by a dedicated journalist T B Singh. The magazine is closely associated with the problems of the public. In the present issue itself, it has highlighted the difficulties and problems of the migrant workers. Tiwari said that the IFWJ is the only organisation of journalists, which has organised three Webinars in the month of May. The first was on International Labour Day, the second was on May 3 to celebrate the World Journalism Day and this is the 3rd in the series when have assembled to rededicate ourselves for the cause of Hindi journalism. Speaking on the occasion Senior journalist Rajeev Ojha said that Hindi has very big reach as it is one of the three big languages of the world.

Its market is expanding very rapidly and hopefully, the new generation will pull the Hindi journalism out of the economic crisis that it is facing today.

IFWJ Vice President KM Jha deplored that many media houses have been using the Corona as a pretext to retrench the employees and thereby adding their difficulties and sufferings. The editor of the Hindi daily Aaj Samaj, Ajay Shuka said that Hindi journalism will become strong by espousing the truth and maintaining its credibility. The editor of Dainik Bhaskar in Mumbai Vijay Singh said that the role of Hindi journalism in Corona time has been excellent and praiseworthy and it has not only scotched the rumours spread by social media but also-provided correct information to the public, which has been appreciated by everybody. Devkinandan Mishra of Rashtriya Sahara said that it is an undeniable fact that now journalism has become a force to reckon with and nobody can ignore it. Gone are the days when the politicians and authorities used to conceal their misdeeds by showering favours on the select media houses and persons but now it is very difficult to manage it, thanks to the phenomenal growth of the digital media.

MS Kanchan Srivastava who has been associated with many Hindi and English newspapers and magazines said that the economic aspect of Hindi journalism has always been weak even before the Corona. She said that it has been a tragedy that Hindi journalists have been paid less than others despite their better performance. This must be changed to ensure the quality and credibility of Hindi journalism. IFWJ Secretary Siddharth Kalhans, hosted the Webinar and threw light on the significance of the Hindi Patrakarita Diwas to remember the sacrifices of our ancestors, who encouraged us to firmly work in the service of Hindi journalism. The editor of Kaimur Times, Vijay Shankar Chaturvedi, who has been raising the issues of Adivasis through his magazine congratulated everybody on the Hindi Patrakarita Diwas. Shri Chaturvedi has been working for the development of Hindi journalism from various international fora.

IFWJ Secretary-General Parmanand Pandey said that the scope and acceptability of Hindi journalism are growing day by day.

He said that we must be obliged to non-Hindi speaking journalists like Baba Vishnu Rao Paradkar, Rajaram Khadilkar,

Laxminarayan Garde and Vidyabhaskar etc.  who shaped Hindi journalism in its initial years. Among others who participated in the Webinar was Dada Hemant Shukla, Rajesh Mishra, Santosh Gupta, Ck Pandey, Mikul Mishra, Sudhanshu Kumar (Bihar) and

Ajay Trivedi ( UP).

हिंदुस्तान टाइम्स में भयानक ‘कत्लेआम’, कई संपादकों समेत 150 फायर, दो एडिशन बंद


शोभना भरतिया के मालिकाना हक वाले अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स और बिजनेस अखबार मिंट से बड़ी और दुखद खबर आ रही है. यहां से डेढ़ सौ से ज्यादा कर्मियों की छंटनी किए जाने की सूचना है। कुल स्टाफ का 27 परसेंट छंटनी का शिकार हुआ है।

बताया जा रहा है कि एचटी प्रबंधन ने एक सर्वे एजेंसी की सेवाएं ली थी और उसकी सलाह पर ये छंटनी की है। छंटनी के दायरे में एचटी और मिंट दोनों अखबार हैं। मिंट अखबार भी शोभना भरतिया का है जो अंग्रेजी बिजनेस डेली है।

बताया जा रहा है कि हिंदुस्तान टाइम्स की मैनेजिंग एडिटर सौम्या भट्टाचार्या को भी फायर कर दिया गया है।

सीनियर एडिटर्स पूनम सक्सेना, मंजुला नारायण, पदमा राव पर भी गाज गिराए जाने की सूचना है। हालांकि पदमा राव ने एक पोस्ट लिखकर ये बताया है कि उन्हें हटाया नहीं गया है बल्कि उन्होंने खुद हफ्ते भर पहले रिजाइन दे दिया है।

देखें पदमा राव की एफबी पोस्ट…

उधर, पता चला है कि हिंदुस्तान टाइम्स ने दो एडिशंस भी बंद कर दिए हैं। पटना और पुणे संस्करणों की तालाबंदी की खबर है। चर्चा है कि नोएडा और गुड़गांव एडिशंस भी बंद किए जा सकते हैं।

कोरोना व लाकडाउन के चलते प्रिंट मीडिया में चौतरफा फायर जारी है। हर मीडिया हाउस छंटनी व बंदी की राह पर है। एचटी में इतने बड़े पैमाने पर हुए ‘कत्लेआम’ से मीडियाकर्मियों में दहशत हैं।

[साभार: भड़ास4मीडिया.कॉम]

Thursday, 28 May 2020

दुखद खबर: डीडी न्यूज दिल्ली के 50 वर्षीय कैमरामैन की कोरोना से मौत

- निजी अस्पताल की लापरवाही
- डीडी न्यूज के स्टाफ की भी होगी टेस्टिंग

कोरोना के इस संकट काल में मीडिया के लिए दुखभरी खबर है। डीडी न्यूज दिल्ली के 50 वर्षीय कैमरामैन योगेश कुमार का निधन मंगलवार को fortis हॉस्पिटल शालीमार बाग में हो गया। पहले यह बताया गया था कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई लेकिन जांच में उन्हें कोरोना पाजिटिव पाया गया। परिजनों का कहना है कि उन्हें 2 दिन से गले में खराश थी और सीने में अचानक तेज दर्द होने पर fortis शालीमार बाग़ एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया था जहां के डाक्टरों ने कोविड-19 का शक होने के चलते उन्हें एडमिट नहीं किया और डॉ की लापरवाही के चलते उनका निधन हो गया।

उनके अनुसार योगेश कुमार 21 मई को डीडी न्यूज गए थे और उसके बाद से ही उनकी तबीयत खराब हो गई थी वह अपने पीछे 21 वर्षीय अध्यनरत पुत्री और 18 वर्षीय पुत्र को छोड़ गए हैं। वहीं उनके परिजनों के साथ ही आफिस के उन लोगों से भी संपर्क किया जा रहा है जो उनके संपर्क में आए थे। कोरोना से कैमरामैन की मौत से डी डी न्यूज के साथ साथ अन्य संस्थानों में कार्यरत उन कर्मचारियों में डर का माहौल है जो वर्षों से काम करने के बाद भी अभी तक परमानेंट नहीं किए गए हैं और न ही उनका कोई बीमा ही हुआ है। ऐसे में बीमार होने पर ना तो सरकार उनकी जिम्मेदारी लेगी ना ही संस्थान।

वैसे ये खबर पूरी मीडिया में फ़ैल चुकी है, मगर सरकारी दबाव और रिपोर्ट सार्वजानिक न होने की वजह से कोई कुछ लिखने और बोलने से डर रहा है।

(एक साथी की रिपोर्ट के आधार पर) 

Wednesday, 27 May 2020

IFWJ Expresses Dismay over Arbitrary Sacking of Media Employees

Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) is shocked and dismayed at the bloodbath in many newspapers in the time of Coronavirus. The Hindustan Times, considered to be one of the wealthiest newspapers of the country, has sacked more than 150 employees from its Delhi office. It is reported that its management is going to pull down the shutters of the Patna and Pune editions. Another top newspaper, the Times of India, has also taken the recourse of retrenching the employees on a very large scale and for closing some of its editions. Many newspapers like Dainik Bhaskar and Rajasthan Patrika have adopted the dirtiest possible tricks to remove the employees without even paying them their legitimate dues.

In a statement, the IFWJ President BV Mallikarjunaih, Vice-Presidents, Hemant Tiwari and Keshab Kalita have asked the governments of Delhi, Assam, Maharashtra and Rajasthan to intervene forthwith so that jobs of the journalists and non-journalists can be saved at the time of the terrible Pandemic. It is highly distressing that a newspaper like ‘The Telegraph’ of the ABP Group, which claims to be the leader of righteousness (?) has asked all the employees of its Guwahati edition to resign to be effective from 31st May. This newspaper claims to have the fifth-highest readership in the country. Similarly, another popular Assamese weekly ‘Sadin’ of Pratidin group has laid off most of its employees by giving a paltry compensation of one month’s salary.

IFWJ has called upon the leaders of all political parties to exert pressures on the governments to take stern action against the cruelty of media houses, who are terminating the services of employees by throwing the labour laws to the wind without any qualms and compunctions. .

Parmanand Pandey

Secretary-General: IFWJ

Saturday, 23 May 2020

'जागरण' की खबरें चुरा कर निकल रहा है 'यशोभूमि'



हमारे देश में 'नंबर वन' होने का दावा कौन-सा अखबार नहीं करता है? कोई राज्य में शीर्ष पर होने का दावा करता है तो कोई शहर में, जबकि देश में भी अपने आप को नंबर वन बताने के लिए अखबारों में होड़ लगी रहती है... आश्चर्य है कि अपने दावे को मजबूती प्रदान करने के लिए ये अखबार जहां अनजानी-सी भी एजेंसियों की सर्वे रिपोर्ट का हवाला दे देते हैं, वहीं उसके आधार पर अपने ही अखबारों में खुद के नंबर वन होने का विज्ञापन भी बड़ी बेशर्मी से प्रकाशित करते हैं!

इसलिए हम यहां पर सबूत के साथ जो खबर देने जा रहे हैं, वह पाठकों की आंखें खोलने के लिए पर्याप्त तो है ही, बहुत महत्वपूर्ण भी है... जी हां, मुंबई में नंबर वन होने का दावा करने वाला 'दैनिक यशोभूमि' नामक समाचार-पत्र इन दिनों बड़ी निर्लज्जता के साथ उस 'दैनिक जागरण' की खबरें चोरी करके प्रकाशित कर रहा है, जो स्वयं को भारत का नंबर वन अखबार बताता है!

जैसा कि आपको पता ही है, वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के प्रभाव को रोकने के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र में लाकडाउन है, जिसके चलते कई अखबारों का प्रकाशन बंद है तो प्रकाशित हो रहे ज्यादातर अखबारों के कर्मचारियों के लिए वर्क @ ह़ोम लागू है... 'यशोभूमि' भी उन्हीं में से एक है, जिसका दफ्तर कुछ  समय पहले ही मध्य मुंबई से शिफ्ट होकर नवी मुंबई चला गया है! जाहिर है कि लाकडाउन के इस दौर में दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले स्टाफ का दफ्तर पहुंचना आसान नहीं है, फिर भी 'यशोभूमि' इस हालात में एक तीर से कई निशाने साध रहा है... अपने कर्मचारियों को कम करने की शरारत से बाज नहीं आ रहा है!

संस्थान के नजदीकी लोगों द्वारा प्रबंधन से संपर्क करने पर टका-सा जवाब दे दिया जाता है कि अभी आने की जरूरत नहीं है, पर यदि कोई दफ्तर में आना ही चाहे तो उसके लिए प्रबंधन का स्पष्ट आदेश है- 'आ जाओ, मगर लिख कर देना पड़ेगा कि यदि 'कुछ' हुआ तो उसके जिम्मेदार तुम खुद रहोगे!' और दूसरे, चाटुकारनुमा उन कर्मचारियों की बदौलत अखबार का प्रकाशन भी नियमित रूप से कर रहा है, जो 'जागरण' सहित उत्तर / मध्य भारत में प्रकाशित होने वाले कई अखबारों- 'अमर उजाला', 'हिंदुस्तान', 'दैनिक भास्कर' आदि की खबरों को चुरा कर ज्यों की त्यों 'यशोभूमि' में इस्तेमाल कर रहा है!

यहां पर संलग्न कटिंग में 'यशोभूमि' की हालिया खबरों पर गौर कीजिए, जो 'जागरण' में अथवा उसकी साइट पर पहले ही प्रकाशित / प्रसारित हो चुकी हैं!

















यह सही है कि हिंदी अखबारों में यहां-वहां से खबरें उठाने की एक पुरानी परंपरा रही है, मगर इतना तो लिहाज रहता ही आया है कि 'साभार' के तहत संबंधित अखबार के प्रति अहसान भी जता दिया जाता है ! यह बात अलग है कि 'यशोभूमि' ने खबर उठाने के बजाय बाकायदा चोरी की है... सेम टु सेम कामा और फुल स्टाप के साथ 'जागरण' के ही शीर्षक से लेकर उसकी फोटो तक का इस्तेमाल धड़ल्ले से करने में मशगूल है, लिहाजा अब की बार मामला बिगड़ता नज़र आ रहा है ! पता चला है कि 'जागरण' के मुंबई ब्यूरो द्वारा कानपुर स्थित अपने मुख्यालय को यह सबूत भेज दिया गया है और आगे की कार्रवाई के लिए 'जागरण' की लीगल टीम शीघ्र ही 'यशोभूमि' के खिलाफ सख्त कदम उठा सकती है!

-मुंबई से दीपक भैया की रिपोर्ट