Tuesday, 3 November 2020

मजीठिया: राष्ट्रीय सहारा बनारस के मीडियाकर्मी को मिली जीत


वाराणसी में मजीठिया वेज बोर्ड मामले की लड़ाई लड़ रहे काशी पत्रकार संघ व समाचारपत्र कर्मचारी यूनियन को आज एक और सफलता हासिल हुई। मजीठिया मामले में राष्ट्रीय सहारा के खिलाफ बनारस में विनोद शर्मा ने केस जीत लिया है। वाराणसी श्रम न्यायालय ने विनोद शर्मा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रीय सहारा प्रबंधन को आदेश दिया है कि वह विनोद शर्मा को मजीठिया वेतन आयोग की संस्तुतियो के अनुरूप बकाये का भुगतान करे।

राष्ट्रीय सहारा हिन्दी दैनिक में विनोद शर्मा उप सम्पादक पद पर स्थायी रूप से कार्य कर रहे थे। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुरूप वेतन भुगतान की उनके लगातार मांग करने पर अखबार प्रबंधन टालमटोल करता रहा। बाद में सहारा प्रबंधन ने विनोद शर्मा की सेवा अवैधानिक रूप से समाप्त कर दी।

इस बीच मजीठिया मामले की लड़ाई लड़ रहे काशी पत्रकार संघ ने समाचारपत्र कर्मचारी यूनियन के सहयोग से स्थानीय श्रम न्यायालय में वाद दाखिल किया। वरिष्ठ अधिवक्ता अजय मुखर्जी व उनके सहयोगी आशीष टण्डन की मजबूत पैरवी का नतीजा रहा कि श्रम न्यायालय ने फैसला विनोद शर्मा के पक्ष में सुनाया।

श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी अमेरिका सिंह ने अपने फैसले में विनोद शर्मा के बकाये का भुगतान मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार करने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि सेवायोजक के ऐसा न करने पर अभिनिर्णय की तिथी से श्रमिक सम्पूर्ण वेतन पर सात प्रतिशत वार्षिक व्याज पाने का अधिकारी होगा।

काशी पत्रकार संघ अध्यक्ष राजनाथ तिवारी, महामंत्री मनोज श्रीवास्तव, पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार, संजय अस्थाना, विकास पाठक, योगेश गुप्त के साथ ही समाचारपत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी ने इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि इसके लिए पूरी कार्यसमिति बधाई के पात्र है, जिसकी एकजुटता और संघर्ष का परिणाम है कि लगातार सार्थक नतीजे आ रहे है।


शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

9322411335

वेजबोर्ड न देने वाले मालिकों को पत्रकार ने कोर्ट में घसीटा, सम्मन जारी




नई दिल्ली। खुद की तिजोरी भरने वाले मीडिया मालिकों को अपने अधीन काम करने वाले कर्मियों का तनिक खयाल नहीं रहता। ये सरकारी नियमों के तहत मिलने वाले वेतन व अन्य देय को भी देने में कतराते हैं। ऐसे ही एक मामले में एक पत्रकार ने अपने मालिकों को कोर्ट में तलब कराया है। कोर्ट ने सम्मन जारी करते हुए सबको तलब किया है।

मामला श्रमजीवी पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय का है। ये 1 जनवरी 2006 से लेकर 30 जून 2016 तक एनएनएस ऑनलाईन प्राइवेट लिमिटेड नामक मीडिया कंपनी में न्यूज कोआर्डीनेटर के पद पर कार्यरत रहे।

पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय ने मजीठिया वेतनमान न मिलने की शिकायत श्रम विभाग में की। उनका आरोप है कि जबसे वे एनएनएस ऑनलाईन प्रा लि में न्यूज कोआर्डीनेटर के पद पर कार्य कर रहे हैं, तबसे उनको कंपनी ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार कोई लाभ नहीं दिया।

श्रमजीवी पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय की शिकायत पर श्रम अधिकारी ए के बिरूली एवं इंस्पेक्टर मनीश कुमार ठाकुर ने एनएनएस आनलाइन मीडिया प्रबंधन को शोकॉज नोटिस जारी कर दिया। इस शोकाज नोटिस में मीडिया प्रबंधन का पक्ष मांगा गया। साथ ही जरूरी दस्तावेज के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया गया।

प्रबंधन ठेंगा दिखाते हुए किसी सुनवाई पर उपस्थित नहीं हुआ। न ही कोई प्रत्युत्तर दिया। इस तरह एनएनएस आनलाइन मीडिया प्रबंधन ने श्रम विभाग, इसके अधिकारियों और दिल्ली सरकार की अवहेलना की।

श्रम इंस्पेक्टर मनीष कुमार ठाकुर ने जवाब न देने वाले मीडिया प्रबंधन के खिलाफ कोर्ट में आपराधिक शिकायत प्रस्तुत की। न्यायालय ने दस्तावेजों को देखने के बाद आरोपी नंबर एक राजेश गुप्ता (डायरेक्टर एवं मालिक) एवं पांच अन्य आरोपियों के खिलाफ सम्मन जारी किया है।

(source: bhadas4media.com)

Sunday, 18 October 2020

सर्वोच्‍च न्यायालय ने दोहराया- कोई भी स्टे छह महीने के भीतर स्वतः हो जाएगा समाप्त


उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले को दोहराते हुए कहा है कि उच्च न्यायालय सहित किसी भी अदालत द्वारा दिया गया कोई भी स्टे छह महीने के भीतर स्वतः समाप्त हो जाएगा, जब तक कि अच्छे कारणों के लिए विस्तारित न किया जाए। एशियन रेसुरफेसिंग रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड बनाम सीबीआई मामले में उच्चतम न्यायालय ने छह महीने के भीतर स्थगन आदेश की अवधि समाप्त करने की व्यवस्था दी थी। बृहस्‍पतिवार को जस्टिस रोहिंग्टन फली नरीमन, नवीन सिन्हा और केएम जोसेफ की तीन-जजों की पीठ ने इसे पुनः दोहराया है।


पीठ ने न्यायमूर्ति एके गोयल, रोहिंग्टन नरीमन और नवीन सिन्हा की पीठ द्वारा दिए गए फैसले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा है कि ऐसे मामलों में जहां स्थगन आदेश दिया जाता है, वह आदेश की तारीख से छह महीने की समाप्ति पर स्वतः खत्म हो जाएगा, जब तक कि एक स्पीकिंग आदेश द्वारा उसे बढ़ा नहीं दिया जाता है। स्पीकिंग आदेश में यह शामिल किया जाना चाहिए कि मामला इतनी असाधारण प्रकृति का था कि स्थगन आदेश मुकदमे को अंतिम रूप देने से अधिक महत्वपूर्ण था। ट्रायल कोर्ट जहां सिविल या आपराधिक कार्यवाही के स्थगन आदेश का प्रस्तुतिकरण किया जाता है, वहां स्थगन आदेश के छह महीने से आगे की तारीख तय नहीं की जा सकती है, ताकि प्रवास की अवधि समाप्त होने पर कार्यवाही शुरू हो सके, जब तक कि स्टे के विस्तार के आदेश का प्रस्तुतिकरण न हो जाए।

जस्टिस रोहिंग्टन फली नरीमन, नवीन सिन्हा और केएम जोसेफ की तीन-जजों की पीठ ने कहा कि दिसंबर 2019 में, अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, पुणे ने एक आदेश पारित करके उच्चतम न्यायालय द्वारा अनिवार्य रूप से छह महीने की अवधि समाप्त होने के बाद मुकदमे को फिर से शुरू करने से इनकार कर दिया और इसके बजाय पार्टियों को मुकदमे को फिर से शुरू करने के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख करने के लिए कहा। पीठ ने कहा कि हमें देश भर के मजिस्ट्रेटों को याद दिलाना चाहिए कि भारत के संविधान के तहत हमारी पिरामिड संरचना में उच्चतम न्यायालय शीर्ष पर है, और फिर उच्च न्यायालय। इस तरह के आदेश हमारे फैसले के पैरा 35 के सामने उड़ान भरते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि देश भर के मजिस्ट्रेट हमारे पत्र और भाव के आदेश का पालन करेंगे।

इस प्रकार, पीठ ने अपना फैसला दोहराते हुए कहा कि उच्च न्यायालय सहित किसी भी न्यायालय द्वारा जो भी ठहराव दिया गया है, वह स्वचालित रूप से छह महीने की अवधि के भीतर समाप्त हो जाता है, और ‘जब तक कि हमारे निर्णय के अनुसार, अच्छे कारण के लिए विस्तार नहीं दिया जाता है, ट्रायल कोर्ट छह महीने की पहली अवधि की समाप्ति पर है, मुकदमे की तारीख तय करके उसकी सुनवाई शुरू करेगी।’ पीठ ने अब एसीजेएम, पुणे को मामले की सुनवाई तुरंत शुरू करने का निर्देश दिया है।

गौरतलब है कि जस्टिस आदर्श कुमार गोयल, जस्टिस रोहिंग्टन और जस्टिस नवीन गुप्ता की पीठ ने मार्च 2018 में एशियन रिसर्फेसिंग रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो मामले में एक अहम फैसला दिया था है। पीठ ने कहा कि किसी भी दीवानी और आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही पर छह महीने से अधिक रोक अर्थात स्थगनादेश नहीं रह सकता। पीठ ने यह भी कहा कि जिन मुकदमों की कार्रवाई पर पहले से रोक लगी हुई है, उस पर रोक आज से छह महीने बाद खत्म हो जाएगी। पीठ ने कहा था कि मुकदमे की कार्रवाई पर अनिश्चितकालीन रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। इस सुधार की दरकार न सिर्फ भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में है, बल्कि सभी दीवानी और फौजदारी मामलों में है। पीठ ने कहा कि कार्यवाही पर रोक लगने से मामला अनिश्चितकाल के लिए लटक जाता है।

पीठ ने हालांकि यह कहा है कि कुछ अपवाद मामलों में कार्यवाही पर रोक छह महीने से अधिक जारी रह सकती है, लेकिन इसके लिए अदालत को बाकायदा आदेश पारित करना होगा। ये ऐसे मामले होंगे, जिनके बारे में अदालत को लगता हो कि उन मुकदमों पर रोक, उनके निपटारे से अधिक जरूरी है। पीठ ने यह फैसला भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर दिया था।

पीठ ने यह भी कहा था कि कभी-कभी तो रोक हटने की सूचना की जानकारी नहीं पहुंचती है, जिस कारण कार्यवाही भी शुरू नहीं हो पाती है। लिहाजा पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर परीक्षण कर सकता है, लेकिन ट्रायल पर रोक छह महीने से अधिक तक नहीं लगा सकता। पीठ ने कहा था कि उन तमाम दीवानी और आपराधिक मामले जिनमें कार्यवाही पर रोक लगी हुई है, उन पर रोक आज से छह महीने बाद खत्म हो जाएगी।

पीठ ने यह भी कहा था कि भविष्य में किसी भी मुकदमे की कार्यवाही की रोक छह महीने की अवधि तक के लिए ही लगाई जाएगी। यदि रोक छह महीने से अधिक होती है तो अदालत को आदेश पारित करना होगा। आदेश में बताना होगा कि वह मामला क्यों अपवाद है और ट्रायल पर रोक उसके निपटारे से अधिक महत्वपूर्ण क्यों है। पीठ  ने कहा था कि मुकदमों पर रोक की अवधि छह महीने के बाद खत्म हो जाए तो ट्रायल कोर्ट को खुद बिना किसी इंतजार के कार्यवाही शुरू कर देनी होगी।

पीठ ने कहा था कि किसी मामले में आरोप तय होने का आदेश पारित किया जाता तो वह आदेश न तो अंतरिम होता है और न ही अंतिम। हाई कोर्ट के समक्ष जब मामला परीक्षण के लिए आए तो कोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मामले के जल्द निपटारे में अनावश्यक बाधा न हो। हाई कोर्ट भी इस संबंध में निर्देश जारी कर सकता है। साथ ही हाई कोर्ट यह निगरानी कर सकता है कि दीवानी या आपराधिक मामले लंबे समय तक लंबित न पड़े रहें। पीठ ने इस आदेश की प्रति सभी हाई कोर्ट तक पहुंचाने के लिए कहा था, जिससे कि इस संबंध में जरूरी कदम उठाए जा सकें।

जेपी सिंह

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

[janchowk.com से साभार] 

ESIC ने बेरोजगारी भत्ते के लिए क्लेम की अंतिम तारीख बढ़ी

नई दिल्ली। कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से जिन लोगों की नौकरी चली गई है। उन्हें अब परेशान होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि केंद्र सरकार ने बेरोजगारी भत्ते के क्लेम के लिए आखिरी तारीख 30 जून, 2021 कर दी है। यानि कोरोना काल में नौकरी गंवाने वाले कर्मचारी जो अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना के तहत इंश्योर्ड हैं, वे तीन महीने की 50% वेतन पाने के लिए अब 30 जून 2021 तक आवेदन कर सकेंगे।

दूसरी ओर जिन लोगों ने 24 मार्च से 31 दिसंबर 2020 के बीच नौकरी गंवाई है, वे इस योजना के तहत तीन महीने की 50% सैलरी के हकदार होंगे। उन कामगारों को भी इसका फायदा मिलेगी जिन्हें फिर से नौकरी मिल गई है। देश में अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना की सुस्त रफ्तार को देखते हुए कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) ने आवेदन करने की अंतिम तिथि को बढ़ाने का फैसला किया है।

ESIC तहत कोई भी बीमाकृत कर सकता है आवेदन

ESIC के तहत बीमाकृत कोई भी कर्मचारी बेरोजगारी भत्ता के लिए अपना दावा पेश कर सकता है। यह भत्ता तीन महीने की आधी सैलरी के रूप में दी जाएगी। ईएसआईसी इसके लिए 44 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान करने जा रही है। ESIC की तरफ से इस बेरोजगारी भत्ता के लिए 19 सितंबर को बेरोजगारी राहत को 25 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी तक दिया गया था। लेकिन बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदन करने वालों की संख्या उम्मीद से काफी कम दिख रही है। श्रम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कोरोना की वजह से बेरोजगार होने वाले अब तक 5 लाख कर्मचारियों ने इस भत्ते के लिए आवेदन नहीं किया है। इसे देखते हुए आवेदन की तिथि को आगे बढ़ाया गया है।

ऐसे कर सकेंगे क्लेम

50 फीसदी सैलरी के क्लेम के लिए कर्मचारियों को ESIC के पोर्टल पर ऑनलाइन क्लेमफॉर्म भरकर उसे सबमिट करना होगा और भरे गए फॉर्म का प्रिंटआउट, एफिडेविट, बैंक अकाउंट डिटेल्स और आधार कार्ड की कॉपी के साथ संबंधित ESIC शाखा जमा कराना होगा। आप चाहें तो पोस्ट के जरिए या फिर खुद जाकर इसे जमा कर सकते हैं। देश में अभी 3.49 करोड़ परिवार ESIC में रजिस्टर्ज हैं जिसके तहत 13.56 करोड़ लोगों को इससे जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं।

[ajhindidaily.in से साभार]

Sunday, 11 October 2020

कोरोना काल में बड़ी खबर: SC के इस ऑर्डर के बाद मप्र में मजीठिया केसों की सुनवाई फिर शुरू, आप भी करें ऐसा...


मप्र हाईकोर्ट के इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट का छह माह में निराकरण करने वाला आदेश अपने राज्य की कोर्ट में लगाएं, जल्द शुरू हो जाएगी आपके केस की सुनवाई

इंदौर। मजीठिया क्रांतिकारियों के लिए मप्र से बहुत अच्छी और राहतभरी खबर आई है। मप्र हाईकोर्ट ने राज्य की सभी कोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल आदि द्वारा समय-सीमा में सुनवाई करने के आदेश वाले सभी प्रकरणों में ट्रायल इत्यादि शुरू कर केस का निराकरण जल्द से जल्द करने का आदेश दिया है। इससे इंदौर-भोपाल आदि शहरों में मजीठिया केस की तारीखें लगने भी लग गई हैं। इससे यहाँ के मजीठिया क्रांतिकारियों के चेहरे खुशी से खिल उठे हैं। अन्य राज्यों के मजीठिया क्रांतिकारी भी मप्र हाईकोर्ट के इस आदेश का संदर्भ देकर अपने-अपने राज्यों की हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अपील करें तो उनके केस की भी जल्द सुनवाई शुरू हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि कोरोना संक्रमण के कारण देशभर में लॉकडाउन लग जाने के कारण लेबर कोर्ट भी बंद हो गए थे। पिछले दिनों कोर्ट खुल तो गए लेकिन वहां सिर्फ जमानत, चेक बाउंस और अत्यंत आवश्यक केस ही सुने जा रहे हैं। लेबर कोर्ट का हाल तो और भी बुरा है। कुछ शहरों की अदालतों को छोड़कर अधिकांश लेबर कोर्ट में स्टाफ ड्यूटी तो आ रहा है, लेकिन किसी भी केस की सुनवाई नहीं हो रही। ऐसे में मप्र हाईकोर्ट के आदेश से शुरू हुई सुनवाई ने मजीठिया क्रांतिकारियों में जान फूंक दी है। 


ऐसे खुली राह - 

मप्र हाईकोर्ट द्वारा 19 अगस्त 2020 को जारी मेमो में राज्य के सभी कोर्ट को आदेश दिया गया है कि वे अपने यहां विचाराधीन सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल आदि द्वारा समय-सीमा में सुनवाई करने के आदेश संबंधी सभी प्रकरणों में ट्रायल इत्यादि शुरू कर केस का जल्द से जल्द निराकरण करें। इसके लिए हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एसएलपी (क्रिमिनल) 11315/2019 अंकित माहेश्वरी उर्फ चिंटू विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य में दिनांक 14 अगस्त 2020 को पारित आदेश का हवाला दिया है। 


आपको यह करना होगा-

मप्र से बाहर के मीडियाकर्मियों को अपने राज्य में मजीठिया केसों की बंद पड़ी सुनवाई शुरू करवाने के लिए मप्र हाईकोर्ट द्वारा 28 अगस्त को जारी मेमोरेंडम और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मजीठिया केसों का निराकरण छह माह में करने संबंधी आदेश की प्रति के साथ आवेदन प्रस्तुत करना होगा। ऐसा करने से संबंधित न्यायालय भी उस राज्य की लेबर कोर्ट को मजीठिया केस की सुनवाई शुरू करने का आदेश दे सकती है।

Monday, 5 October 2020

गुजरात सरकार की मनुष्य विरोधी अधिसूचना रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों को ओवर टाइम देना जरूरी बताया


देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को स्पष्ट आदेश दिया कि कोविड 19 के मौजूदा समय में अगर किसी श्रमिक ने 12 घंटे काम किया है तो उसे 6 घंटे की ड्यूटी पर 30 मिनट का ब्रेक दिया जाएगा, इसके बाद ही आगे कार्य लिया जाएगा। साथ ही उसे ओवरटाइम भी देना होगा।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय गुजरात मजदूर सभा द्वारा दाखिल रिट पिटीशन (सिविल) संख्या 708/2020 गुजरात मजदूर सभा एन्ड अदर्स वर्सेज द स्टेट ऑफ गुजरात के मामले की सुनवाई कर रही थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने मजदूरों को लेकर गुजरात सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को भी रद्द कर दिया है।

दरअसल गुजरात सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना में कहा गया था कि मजदूरों को ओवरटाइम मजदूरी का भुगतान किए बिना अतिरिक्त काम करना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि कोरोना महामारी के कारण अर्थव्यवस्था की स्थिति बुरी हो गई है, ऐसे में मजदूरों को उचित मजदूरी नहीं दिया जाना इसका एक कारण हो सकता है। साथ ही शीर्ष अदालत ने 19 अप्रैल से लेकर 20 जुलाई तक के ओवरटाइम का भुगतान करने का भी आदेश दिया।

इस मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान मजदूरों को गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मजदूरों को अपनी आजीविका से हाथ धोना पड़ा। पीठ ने कहा कि कानून का प्रयोग जीवन के अधिकार और मजबूर श्रम के खिलाफ नहीं किया जा सकता है।

आपको बता दें कि गुजरात सरकार द्वारा जारी 17 अप्रैल की अधिसूचना में कहा गया था कि उद्योगों को लॉकडाउन की अवधि के दौरान फैक्ट्री अधिनियम के तहत अनिवार्य कुछ शर्तों में छूट दी जाती है। इसमें श्रमिकों को 6 घंटे के अंतराल के बाद 30 मिनट का ब्रेक दिया जाएगा और आगे 6 घंटे और काम करवाया जाएगा। यानि की मजदूर को 12 घंटे तक काम करना होगा।

गुजरात सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में यह भी कहा गया था मजदूर द्वारा किए गए ओवरटाइम काम के बदले उसे सामान्य मजदूरी का ही भुगतान किया जाएगा।

इस अधिसूचना को फैक्टरी अधिनियम की धारा 5 के तहत जारी किया गया था, जो सरकार को सार्वजनिक आपातकाल की स्थिति के दौरान फैक्ट्री अधिनियम के दायरे से कारखानों को छूट देने की अनुमति देती है।

इस धारा के मुताबिक, सार्वजनिक आपातकाल से अभिप्राय एक गंभीर आपातकाल की स्थिति है, जो भारत की सुरक्षा को खतरे में डालती है चाहे युद्ध या बाहरी आक्रमण या आंतरिक गड़बड़ी हो।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार उद्योगों को धारा 5 के तहत छूट नहीं दे सकती है, क्योंकि महामारी को सार्वजनिक आपातकाल नहीं माना जा सकता है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि 20 अप्रैल से 19 जुलाई की अवधि के दौरान सभी मजदूरों को उनके द्वारा किए गए ओवरटाइम मजदूरी का भुगतान किया जाना चाहिए।

आपको बताते चलें कि कई राज्य सरकारों ने इसी तरह कोरोना की आड़ में श्रम संशोधन किया और मजदूरो को 12 घंटा कार्य करना अनिवार्य कर दिया था। इसी रास्ते पर कई अखबार मालिक भी चलने की सोच रहे थे जिनके कदम पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी तथा वाइस प्रेसिडेंट न्यूज़ पेपर एम्प्लॉयज यूनियन ऑफ इंडिया।

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Wednesday, 30 September 2020

मोदी ने मीडियाकर्मियों के अधिकारों का कैसे किया पूर्ण सत्यानाश, विस्तार से पढ़िए-समझिए

-रविंद्र अग्रवाल–

श्रम सुधार के नाम पर मोदी सरकार ने अखबार मालिकों के साथ मिलकर श्रमजीवी पत्रकारों और अखबार कर्मचारियों के वैधानिक अधिकारों का एक तरह से गैंगरेप कर डाला है। पहले से ही मजीठिया वेजबोर्ड की नौ वर्ष से चली आ रही लड़ाई में कठिन आर्थिक हालातों के बावजूद पूरी रसद के साथ लड़ रहे श्रमजीवी पत्रकारों और अखबार कर्मचारियों की पीठ में केंद्र सरकार ने जो छूरा घोंपा है, उसकी पीड़ा से निजात पाने के लिए फिर से एक और कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

नए कानूनों में जहां श्रमजीवी पत्रकार की हालत एक दिहाड़ी मजदूर से भी बदतर कर दी गई है, तो वहीं अन्य अखबार कर्मचारियों को भी आम मजदूरों की श्रेणी में ला खड़ा किया गया है। वो भी तब जबकि श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम, 1955 के लागू होने के बाद पहली बार हजारों की संख्या में श्रमजीवी पत्रकार और गैर पत्रकार अखबार कर्मचारी अपने संशोधित वेतनमान और एरियर के लिए अखबार मालिकों के जुल्‍मोसितम सहते हुए पिछले नौ वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ने को एकजुट हुए थे।

हमारी इस एकता को 56 इंच के सीने वाली मोदी सरकार का सीना झेल नहीं सका और अखबार मालिकों के घड़ियाली आंसूओं और चापलूसी के सामने सिकुड़ गया। ऐसे में एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत श्रम सुधारों के नाम पर श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य अखबार कर्मचारियों को विशेष अधिकार, केंद्रीय कर्मचारियों के समान वेतनमान और अन्य विशेष रियायतें देने वाले अधिनियमों को ही खत्म कर दिया गया। श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1955 तथा श्रमजीवी पत्रकार (मजदूरी की दरों का निर्धारण) अधिनियम, 1958 विधेयकों की रचना एक श्रमजीवी पत्रकार और अखबार कर्मचारी को अन्य श्रमिकों से अलग दर्जा, वेतन और विशेष कानूनी अधिकार देने के लिए की गई थी, ताकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नींव ना हिलने पाए और पत्रकारिता के प्रोफेशन को पूंजीपतियों की रखैल मात्र बनकर ना रहना पड़े।

हालांकि प्रिंट मीडिया में कार्पोरेट कल्चर आने के बाद से खासकर श्रमजीवी पत्रकार काफी कठिन दौर से गुजर रहे हैं और अब तक किसी भी पार्टी या विचारधारा की सरकार ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था। ऐसे में जब 56 इंच का सीना होने का दावा करने वाली मोदी सरकार से उपरोक्त श्रमजीवी पत्रकार अधिनियमों में संशोधन करके इन्हें और मजबूत करने की उम्मीद की जा रही थी तो इस सरकार ने इस पर मेहनत करने के बजाय इस मर्ज को जड़ से उखाड़ने के लिए पत्रकारिता के हाथ ही कलम कर दिए हैं।

खासकर अनुबंध अधिनियम के तहत श्रमजीवी पत्रकारों के भविष्य को असुरक्षित करके रख दिया गया था। इस पर रोक लगाने की मांग लंबे अर्से से की जा रही थी। अब हालत यह हो गई है कि अखबार मालिक नए श्रम नियमों के तहत एक श्रमजीवी पत्रकार को कभी भी सड़क पर ला सकते हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक श्रमजीवी पत्रकार और समाचारपत्र स्थापना में काम करने वाला अन्य कर्मचारी अचानक नौकरी चले जाने पर एक आम मजदूर की तुलना में रोजगार ही प्राप्त नहीं कर सकेगा, क्योंकि आम मजदूर को तो कहीं भी मजदूरी करके परिवार चलाने के साधन मौजूद हैं, मगर श्रमजीवी पत्रकार और अखबारों में काम करने वाले अन्य कर्मचारियों के परिवारों के लिए तो भूखों मरने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचेगा।

अगर ऐसा नहीं है तो उपरोक्त अधिनियमों को समाप्त करने वाली मोदी सरकार और उसके अधिकारी ही बताएं कि एक श्रमजीवी पत्रकार और अन्य अखबार कर्मचारी के लिए नौकरी जाने के बाद परिवार चलाने को क्या-क्या विकल्प होंगे।

उधर, मौजूदा परिस्थिरतियों में जबकि प्रिंट मीडिया को चुनौती देने के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया और वेब मीडिया दस्तक दे चुका है, तो ऐसे में उपरोक्तर अधिनियमों को और सशक्त बनाने की जरूरत महसूस की जा रही थी।

श्रमजीवी पत्रकार और गैर-पत्रकार अखबार कर्मचारियों के संगठन लंबे अर्से से इन अधिनियमों में इलेक्ट्रानिक मीडिया और वेब मीडिया में काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों और गैरपत्रकार कर्मचारियों को भी शामिल करने की मांग करते आ रहे थे। इन्हें नए श्रम कानूनों में जगह तो दे दी गई, मगर विशेषाधिकार समाप्त करने के कारण इसके कोई मायने ही नहीं बचे हैं। वहीं इन अधिनियमों के उल्लंघन पर सख्त प्रावधान करने की भी जरूरत थी, जो किए भी गए हैं, मगर नेकनीयती से नहीं। वहीं श्रमजीवी पत्रकारों की ठेके पर नियुक्तियों को रोकना भी जरूरी समझा जा रहा था, मगर ऐसा करके सरकार अखबार मालिकों को नाराज नहीं करना चाहती, भले ही लाखों अखबार कर्मचारी और उनके परिवार सरकार से नाराज हो जाएं। ऐसे में अधिनियमों  को सशक्त बनाने के बजाय समाप्त करने का निर्णय केंद्र सरकार की बदनीयती को ही दर्शा रहा है।

यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि अखबारों में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकार और अन्य कमर्चारी आम मजदूरों से अलग परिस्थितियों में काम करते हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 07 फरवरी, 2014 को अखबार मालिकों की याचिकाओं पर सुनाए गए अपने फैसले (इससे पूर्व के फैसलों सहित) में भी इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि अखबार कर्मचारियों को आम श्रमिकों से अलग परिस्थितियों, खास विशेषज्ञता और उच्च दर्जें के प्रशिक्षण के साथ काम करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें वेजबोर्ड की सुरक्षा के साथ ही इस बात का भी ख्याल रखना जरूरी है कि समाज की दिशा और दशा तय करने वाले पत्रकारिता के व्यवसाय से जुड़े श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य अखबार कर्मचारियों की जीवन शैली कम वेतनमान के कारण प्रभावित ना होने पाए।

नए श्रम कानूनों में सभी विशेष अधिकार समेटे गए

मोदी सरकार के नए श्रम कानूनों में श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य अखबार कर्मचारियों के लिए ऐसा कोई भी विशेष प्रावधान नहीं शामिल किया है, जो उन्हें उपरोक्त दो अधिनियमों में दिया गया था। इसमें खासकर हर दस वर्ष की अवधि के बाद वेजबोर्ड का गठन, छंटनी की स्थिति में विशेष प्रावधान, काम के घंटे, छुट्टियों की व्यवस्था, पहले से घोषित वेतनमान ना दिए जाने पर बिना किसी समयसीमा के रिकवरी की व्यवस्था और संशोधित वेमनमान के तहत एरियर लंबित होने पर नौकरी से ना हटाए जाने की व्यवस्था शामिल हैं। नए श्रम कानूनों में श्रमजीवी पत्रकार और समाचारपत्र स्थापना की परिभाषा तो शामिल की गई है, मगर बाकी सभी विशेष अधिकार छीन लिए गए हैं।

पूर्व के वेजबोर्डों के तहत बकाए की रिकवरी का प्रावधान नहीं

वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट, 1955 निरस्त किए जाने के साथ ही अब इसकी रिकवरी की धारा 17 भी निष्प्रभावी हो जाएगी। ऐसे में नए श्रम कानूनों पर राष्ट्रपति के हस्तााक्षर होते ही माननीय सुप्रीम कोर्ट के 19 जून, 2017 के फैसले के तहत मजीठिया वेजबोर्ड के तहत संशोधित वेतनमान के एरियर की रिकवरी का वाद (नए मामलों में) दायर करने के लिए कोई प्रावधान ही नहीं बचेगा, क्योंकि नए श्रम कानूनों में पूराने मामलों में रिकवरी के लिए आवेदन करने की व्यवस्था ही नहीं है। मोदी सरकार द्वारा पहले ही पारित की जा चुकी श्रम संहिता 2019 के प्रावधानों के तहत ही रिकवरी की व्यवस्था की गई है। इसमें सिर्फ न्यूनतम वेतनमान के मामलों में दो वर्ष के भीतर रिकवरी के लिए आवेदन करने का प्रावधान है।

ऐसे में जो अखबार कर्मचारी यह सोच कर मजीठिया वेजबोर्ड के तहत रिकवरी नहीं डाल रहे थे कि पहले से लड़ रहे साथियों का फैसला आने पर उन्हें भी घर बैठे नोटों का बैग मिल जाएगा, वो अब कहीं के भी नहीं रहे हैं। इनके लिए अब रिकवरी का केस डालने का अवसर तब तक के लिए ही बचा है, जब तक कि नए श्रम कानूनों पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर नहीं हो जाते। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जिन साथियों ने रिकवरी के केस डीएलसी के पास डाल दिए हैं या जिनके विवाद लेबर कोर्ट में लंबित हैं, उन्हें नए श्रम कानूनों के तहत कोई नुकसान नहीं होने वाला है। उनके ये लंबित विवाद नए कानूनों के तहत गठित होने वाले नए इडंस्ट्रिनयल ट्रिब्यूनल में स्वत: ही शिफ्ट हो जाएंगे।


वेजबोर्ड नहीं अब न्यूनतम मजदूरी पर पलेंगे अखबार कर्मचारी

नए श्रम कानूनों में श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य अखबार कर्मचारियों को अब तक मिले वेजबोर्ड के अधिकार को ही समाप्त कर दिया गया है। वो भी ऐसे समय में जबकि मजीठिया वेजबोर्ड के लिए हजारों अखबार कर्मचारी अपनी नौकरी गंवा कर श्रम न्यायालयों में लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि अखबार मालिकों ने कभी भी अपनी मर्जी से कोई भी वेजबोर्ड को अक्षरश: लागू नहीं किया है और हर बार इसे माननीय सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर मुंह की खाई है।

अखबार मालिक शुरू से ही खासकर वेजबोर्ड को लेकर श्रमजीवी पत्रकार अधिनियमों को निरस्त करवाने की कोशिशों में जुटे रहे हैं, मगर किसी भी सरकार ने उनके इस मंसूबे का समर्थन नहीं किया था। मोदी सरकार ने उनकी इस मंशा को पूरी करते हुए यह कलंक अपने माथे सजा लिया है और अब उसे इसका खामियाजा भुगतने को तैयार रहना होगा। नए कानूनों में मोदी सरकार ने श्रमजीवी पत्रकारों को न्यूानतम मजदूरी तय करने के लिए एक कमेटी का गठन करने का लॉलीपाप भी दिया है, जो हाथी से उतारकर गधे की सवारी करवाने के समान है। ऐसा इसलिए क्योंकि श्रमजीवी पत्रकारों और अखबार कर्मचारियों के लिए पहले लीविंग वेजेज के तहत वेजबोर्ड का गठन होता था, जो केंद्रीय कर्मचारियों के समान था। अब मिनिमम वेजेज के सिद्धांत पर दिहाड़ी मजदूरों की तर्ज पर न्यूनतम वेतन तय होगा। वह भी सिर्फ श्रमजीवी पत्रकारों के लिए। अन्य अखबार कर्मचारियों के लिए ऐसा प्रावधान कहीं नजर नहीं आ रहा है।


देश के स्वततंत्र होते ही शुरू हुआ था चिंतन, अब सजा दी चिता

खासकर श्रमजीवी पत्रकारों के काम के जोखिम और विशेषज्ञता को देखते हुए उन्हें पूंजीपतियों का बंधुआ बनने से रोकने और लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने को लेकर देश के आजाद होते ही चिंतन शुरू हो गया था। पहले अखबारों का प्रकाशन और संचालन व्यक्तिगत तौर पर समाज चिंतक, देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में शामिल सेनानी और प्रबुद्ध पत्रकार करते थे। आजादी के बाद जैसे ही पूंजीपतियों या उद्योगपतियों ने अखबारों को व्यवसाय के तौर पर संचालित करना शुरू किया तभी से पत्रकारों के वेतनमान, काम के घंटों और बाकी श्रमिकों से अलग विशेषाधिकार देने की मांग उठनी शुरू हो गई।

इसे देखते हुए पहली बार वर्ष 1947 में गठित एक जांच समिति ने सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी, फिर 27 मार्च 1948 को ब्रिटिश इंडिया के केंद्रीय प्रांत और बेरार (Central Provinces and Berar) प्रशासन ने समाचारपत्र उद्योग के कामकाज की जांच के लिए गठित जांच समिति ने सुझाव दिए और 14 जुलाई 1954 को भारत सरकार द्वारा गठित प्रेस कमीशन ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट दी थी। इसके अलावा एक अप्रैल 1948 को जिनेवा प्रेस एसोसिएशन और जिनेवा यूनियन आफ न्‍यूजपेपर पब्लिसर्श ने 01 अप्रैल 1948 को एक संयुक्त समझौता किया था। इस तरह व्यापक जांच और रिपोर्टों के आधार पर तत्कालीन भारत सरकार ने श्रमजीवी पत्रकार व अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1955 तथा श्रमजीवी पत्रकार (मजदूरी की दरों का निर्धारण) अधिनियम, 1958 को लागू किया था। इतना ही नहीं भारत के संविधान के अनुच्छेद 43 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) के तहत भी उपरोक्त दोनों अधिनयम संवैधानिक वैधता रखते हैं। ऐसे में इन विधेयकों को इस तरह चोरीछिपे लागू करवाना असंवैधानक है और इसे हर हालत में माननीय सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की जरूरत है। इसके लिए हमारी यूनियन के अलावा अन्य यूनियनें भी प्रयासों में जुट गई हैं।