Sunday, 27 September 2020

कितना खतरनाक है नया संशोधित श्रम कानून, पढ़ें

श्रम कानून में संशोधन से बंधुवा मजदूरी को बढ़ावा मिलेगा: अजय मुखर्जी

अब दुकान कर्मचारी की भंति पत्रकारों को सिर्फ मंहगाई भत्ता दिया जाएगा, छंटनी भी बढ़ेगी

केन्द्र सरकार द्वारा श्रम कानूनों में संशोधन को कोविड -19 की महामारी के समय चोरी छिपे लाकर बिना प्रश्नोउत्तरी के पेश कर बिना बहस के पास करवाना श्रम कानूनों के जरिए मिले सामाजिक सुरक्षा की हत्या करने के समान है।

वर्षों से प्राप्त श्रमिकों के अधिकार को इस संशोधन बिल 2020 के जरिये समाप्त कर दिया गया। वर्तमान श्रम संशोधन बिल 2020 में 300 कर्मचारी के नीचे के किसी भी संस्थान को बन्द करना मालिक के अधिकार क्षेत्र में आ गया है। वह बंद करना चाहे तो अब उसके लिए किसी की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

किसी कर्मचारी की सेवासमाप्ति, छंटनी करना जायज कर दिया गया है. श्रमिकों को वर्षों से प्राप्त औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को खत्म किया जाना, समाजिक सुरक्षा का हनन, रोजगार की गारंटी आदि को पूंजीपतियों के हाथों में सौप दिया गया है।

वर्तमान श्रम संशोधन बिल 2020 से पूर्व पत्रकार व गैर पत्रकार के हितों की सुरक्षा के लिए वेज बोर्ड का गठन किया जाता था. इसे नए बिल में समाप्त कर दिया गया है। 

अब दुकान कर्मचारी की भांति पत्रकारों को सिर्फ मंहगाई भत्ता दिया जाएगा। आने वाले दिनों में इस बिल की आड़ में बैंक, बीमा, रेलवे, भेल, कोल आदि संस्थानों में भी वेज बोर्ड को भी खत्म कर दिया जाएगा।

यह श्रम संशोधन बिल 2020 एक तानाशाही शासक की सनक की बानगी है।

देश के 70 प्रतिशत कामगार असुरक्षित हो गए हैं। जो बिल लाया गया है उस बिल के तहत राज्य बीमा कर्मचारी निगम, कर्मचारी भविष्य निधि के जरिए जो सामजिक सुरक्षा थी वो मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह कहना बेहद मुश्किल हो गया है। इस सब कुछ को अन्धेरे में रखा गया है। इस श्रम संशोधन बिल में सेवायोजक संस्थानों को मात्र 2 घंटे, 4 घंटे के लिए नियुक्ति कर कार्य लिए जाने की व्यवस्था प्रदान की गई है। न्यूनतम मजदूरी पाने का जो कामगारों का अधिकार होता है उसे भी छीन लिया गया है, जो काला कानून व तुगलकी फरमान है।

इस श्रम संशोधन बिल 2020 में वर्ष 1926 में बनी ट्रेड यूनियन ऐक्ट को भी निष्प्रभावी कर दिया गया है। अब कोई नया यूनियन बनना चाहेगा तो उस संस्थान से अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है। क्या सेवायोजक अपने संस्थान में यूनियन बनाने की अनुमति प्रदान करेगा?

कोविड-19 की महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बिल की आड़ मे 39 श्रम कानूनों में से 36 श्रम कानूनों को अगले तीन वर्षों के लिए स्थगित कर दिया। इससे कामगार असुरक्षित हो गए और उनके लिए कोई कानून का दरवाजा खुला नहीं रह गया।

कोविड-19 की महामारी के दौरान इस बिल के आने से पूर्व श्रम कानूनों में वेतन न दिए जाने पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया था कि सेवायोजक व कामगार आपसी बातचीत करके अपनी समस्या का समाधान करें। इस कानून से 15 करोड़ श्रमिकों को अपने वेतन से हाथ धोना पड़ जाएगा।

इस बिल के तहत ग्रेचुटी ऐक्ट में जो नियमित कामगार भुगतान रजिस्टर में होगे वो एक वर्ष पश्चात् सिर्फ उपादान राशि प्राप्त करने के अधिकारी होंगे। ऐसे में कैजुअल, पार्टटाइम व संविदा कर्मचारियों को कुछ भी नही मिलेगा। इस श्रम संशोधन बिल 2020 को तत्काल वापस लिया जाए ताकि श्रमिक सुरक्षित हो सकें।


अजय मुखर्जी

मंत्री / राज्य सचिव

उ0 प्र0 आखिल भारतीय ट्रेड यूनियन काँग्रेस

समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन (पत्रकार व गैर-पत्रकार)

मोबाइल नंबर- 9838438210


प्रस्तुति- शशिकांत सिंह, मुंबई


Friday, 25 September 2020

छंटनी के खिलाफ नई दुनिया के मीडियाकर्मियों का गुस्सा फूटा, काम बंद कर सड़क पर उतरे, देखें फोटो


इंदौर। नईदुनिया (जागरण समूह) में अनेक मीडियाकर्मियों ने छंटनी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया लिया। पिछले 3-4 दिन से हो रही छंटनी के खिलाफ मीडियाकर्मी ऑफिस से नीचे उतर आए और उन्‍होंने जबरदस्‍त नारेबाजी और हंगामा किया। 



कल एक साथ ऑफ रोल वाले 7-8 कर्मचारियों को निकाल दिया गया। इससे 2-3 को छोड़ सभी कर्मचारी भड़क गए। वो सब ऑफिस से बाहर आ गए और हंगामा और नारेबाजी की। 

ऑफिस के कर्मचारियों का गुस्सा सहयोगी कर्मचारी जितेंद्र रिछारिया और जितेंद्र व्यास के खिलाफ भी भड़क गया है। पूरा ऑफिस एकजुट हो गया, लेकिन जितेंद्र रिछारिया ने उनका साथ नहीं दिया और वो नए आए संपादक सद्गुरु शरण अवस्थी के पिट्ठू बनकर काम करते रहे।


जितेंद्र व्यास का भी यही हाल है। संपादक इन सबसे बेफिक्र हैं। उन्होंने साफ बोल दिया कि जिसको जाना है जाए और अखबार तो निकलेगा ही। उन्होंने भोपाल एडिशन से पेज मंगवाकर इंदौर एडिशन छापने की तैयारी कर ली है।

ज्ञात हो कि पत्रकार, डेस्क कर्मचारी व अन्य कर्मचारियों को नौकरी से हटाने के विरोध में कल शाम यानी बृहस्‍पतिवार को नई दुनिया में भारी हंगामा हुआ और सभी कर्मचारी नई दुनिया के परिसर में आकर बैठ गए। सभी ने काम करने से मना कर दिया और मालिकों, संपादक और आला अधिकारियों को मनमानी बंद करने की बात कही। इस पर सीईओ संजय शुक्ला ने सभी को मनाने की कोशिश की। कई चाटुकार अब भी संपादक की गोद मे बैठे हुए हैं।


इसी प्रकरण पर आदित्य पांडेय फेसबुक पर लिखते हैं-


नईदुनिया ने जो सुनहरे दिन देखे थे आज उनका अंत इस तरह हुआ कि इसके मीडियाकर्मी सड़क पर उतरने को मजबूर हो गए।

बुरे दिन तभी शुरू हो चुके थे जब यह पुराने मालिकों के पास था लेकिन अब तो हद हो गई है। सारे अखबार मालिक एक हो गए हैं इसलिए बड़ी मुश्किल भी झेल पा रहे हैं लेकिन मीडिया कर्मियों का एकजुट होना मुश्किल रहा है।

आज सड़क पर आने की नौबत ही न आती यदि हंट मैन की तरह लाए गए श्रवण गर्ग की ज्यादती पर ही सब साथ खड़े हो गए होते।

जब कुछ साथियों ने मजीठिया केस लगाए तो नौकरी कर रहे कर्मी उनसे उनसे नजरें चुराते थे, साथ देने की बात तो बहुत दूर है। मालिकों की हिम्मत इसी वजह से बढ़ती रही।

आज भी कुछ लोग मालिकों के लिए खड़े हैं और बाकी सड़क पर हैं। मालिकों को शर्म नहीं आती क्योंकि वो तो उन्होंने बेच खाई है लेकिन कुछ बातों पर हमें भी शर्म आनी ही चाहिए।

[साभार: bhadas4media.com]

मीडियाकर्मियों और श्रमिकों के वेतन कटौती तथा छंटनी के मामले की सुनवाई 23 नवंबर को करेगा सुप्रीमकोर्ट


एक तरफ जहां श्रम सुधार बिल के  ससंद में पास हो जाने के बाद 300 या उससे कम कर्मचारियों वाली कंपनियों में छंटनी के लिए किसी तरह की सरकारी अनुमति न लेने के मामले की हर तरह आलोचना श्रमिक संगठन कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ मीडियाकर्मियों और श्रमिकों के वेतन कटौती तथा छंटनी के मामले की सुनवाई 23 नवंबर को सुप्रीमकोर्ट करेगा। इस मामले को सुप्रीमकोर्ट की साइट पर 23 नवंबर को सुनवाई की संभावित सूची में इस मामले को लिस्टेड किया गया है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस अशोक भूषण,जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एम.आर.शाह की बेंच करेगी। इससे पहले पिछले महीने में इस मामले की सुनवाई हुई थी। देश भर के मीडियाकर्मियों की लॉक डाउन में हुई छंटनी और वेतन कटौती मामले पर सुनवाई करते हुए पिछले महीने माननीय सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले को डायरी नम्बर 10983/2020 से टैग कर दिया। अब दोनों मामलों को एक साथ सुना जाएगा।

डायरी नम्बर 10983 /2020 में इसी तरह के एक मामले की सुनवाई विचाराधीन थी। इन दोनों मामलों को 23 नवंबर को सुना जाएगा। डायरी नम्बर 10983 /2020 की सुनवाई करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने निजी नियोक्ताओं, कारखानों, उद्योगों को फौरी राहत देते हुए कहा था कि निजी नियोक्ताओं, कारखानों, उद्योगों के खिलाफ सरकार कोई कठोर कदम नहीं उठाएगी, जो लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों को मजदूरी देने में विफल रहे। ये व्‍यवस्‍था देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार के श्रम विभाग वेतन भुगतान के संबंध में कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच बातचीत करवाएं। मजदूरों को 54 दिन के लॉकडाउन की मजदूरी के भुगतान के लिए बातचीत करनी होगी। उद्योग और मज़दूर संगठन समाधान की कोशिश करें।

इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को 29 मार्च के अपने आदेश की वैधानिकता पर जवाब दाखिल करने के लिए 4 और सप्ताह दिए थे, जिसमें सरकार ने मजदूरी के अनिवार्य भुगतान का आदेश दिया था। अगली सुनवाई जुलाई के अंतिम सप्ताह में होनी थी। जिसकी लिस्टिंग 27 जुलाई को हुई थी।

अब इन दोनों मामलों को एक साथ सुना जाएगा। इसके पूर्व मीडियाकर्मियों की तरफ से प्रस्तुत एडवोकेट को संशोधित याचिका पेश करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया था।


शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

9322411335

Thursday, 24 September 2020

रिपब्लिक के जोकर को मीडियाकर्मियों ने धुना


- मुंबई में बीच सड़क पर सरेआम हुई प्रदीप की पिटाई

- जोकर प्रदीप बोला, चाय-बिस्किट वाले हैं मुंबई के पत्रकार

मुंबई में कल एनसीबी के आफिस के आगे मुंबई के पत्रकारों ने रिपब्लिक भारत के जोकर प्रदीप भंडारी को धो डाला। कारण, प्रदीप लाइव कवरेज करते हुए कैमरा घुमाकर अन्य पत्रकारों को दिखाते हुए बोला कि ये चाय-बिस्किट वाले पत्रकार हैं। ये क्या सच दिखाएंगे, हम आपको सच दिखाएंगे। इसका विरोध करने पर प्रदीप ने एनडीटीवी और एवीपी के पत्रकारों के साथ अभद्रता की तो पत्रकारों ने प्रदीप को धुन दिया। प्रदीप ने भी ट्वीट कर मारपीट की बात कही है।

दरअसल, देश के मुख्यधारा के इलेक्ट्रानिक मीडिया में अब पत्रकार नहीं हैं। पत्रकार रूपी एक्टर और जोकर भर गए हैं। अधिकांश न्यूज चैनलों के एंकर और पत्रकार सर्कस के जोकर लगते हैं, क्योंकि अब न्यूज चैनलों का फंडा पत्रकारिता करना नहीं है, बल्कि जनता का इंटरटेंनमेंट करना है। स्टूडियों में एक मुख्य जोकर चार अन्य चिल्लाने वाले जोकरों को बुलाकर मुर्गा फाइट कराता है। सब अजीब-अजीब से हास्यापद टॉपिक होते हैं। भारत की बुनियादी समस्याओं से कहीं अधिक चीन और पाकिस्तान की बर्बादी दिखाई जाती है। रोजी-रोटी की बात न कर हिन्दू-मुसलमान की बात की जाती है। कारण यह भी है कि कारपोरेट घरानों के एक विशेष वर्ग ने मीडिया पर कब्जा कर लिया है और वो नहीं चाहता है कि मीडिया सत्ताविरोधी या जनपक्षधरता की बात करे। 

दूसरी बात न्यूज चैनलों को टीआरपी के लिए इतनी मेहनत करने के बाद पता चलता है कि स्टार और सोनी जैसे चैनल उनसे पांच से दस गुणा अधिक देखे जा रहे हैं और विज्ञापनों का अधिकांश हिस्सा भी वहीं ले जाते हैं तो चैनलों के आकाओं ने उन्हें कह दिया है कि जोकरी करो, एंकरिंग करो, लेकिन पत्रकारिता नहीं। इसी का परिणाम रिपब्लिक के जोकर प्रदीप भंडारी की पिटाई के रूप में हुई है। देखिए अभी तो बहुत इंटरटेनमेंट बाकी है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

Thursday, 17 September 2020

मीडिया को भी बेरोजगारी दिवस की बधाई



- हिन्दुस्तान देहरादून, अमर उजाला ऋषिकेश के साथियों को बधाई

- हिन्दी खबर के पवन लालचंद को भी बधाई

लगभग 15 दिन पहले किसी साथी पत्रकार का फोन आया कि हिन्दुस्तान ने देहरादून से स्टाफर फोटोग्राफर प्रवीण डंडरियाल, डेस्क पर कार्यरत नरेंद्र शर्मा और प्रदीप बहुगुणा को विदाई दे दी है। सात अन्य को भी निकाल दिया गया है। मेरे सभी साथी चाहते हैं कि मैं मार्केट में बदनाम हूं तो मैं ही ये पोस्ट भी लिखूं। मुझे लगा मैं सच में बदनाम हो गया हूं सच लिखने के लिए। मुझे अपने पर गुस्सा आया कि मैं ही क्यों लिखूं। दूसरे क्यों नहीं लिखते। गालियां अकेले मैं ही क्यों खाऊं। सो नहीं लिखा। गुस्सा यह भी था कि सब पत्रकार चुप बैठे हैं। डरपोक कहीं के। जब पत्रकार अपनी आवाज नहीं उठाते हैं तो मैं क्यों भगत सिंह बना फिरूं इनके लिए। यही सोचकर नहीं लिखा।

लिखने से होगा भी क्या? दुश्मन ही बढ़ रहे हैं मेरे। सच की कीमत चुका रहा हूं। अभी 50 लाख रुपये के मानहानि के दावे से निपटा हूं। कोरोना महामारी के बीच पिछले तीन महीने में देहरादून से लेकर ऋषिकेश के थानों और पुलिस चौकियों के चक्कर काटे हैं। अब जाकर कुछ राहत मिली है और फिर शुरू। पर कमबख्त दिल ही नहीं मानता। देहरादून के सहारा में मैं अकेला पत्रकार हूं जो नैनीताल हाईकोर्ट में सहारा के खिलाफ केस लड़ रहा है। 

अब भडास पर खबर है तो मैं हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला देहरादून से निकाले गए पत्रकारों को बेरोजगार दिवस की बधाई दे रहा हूं। अमर उजाला में कोरोना की खबर लिखी तो वो भी भड़क गए। आज अमर उजाला के कई साथी कोरोनाग्रस्त हैं। भुगतो। जब मैंने हिन्दी खबर चैनल पर वेतन न दिए जाने पर एक खबर लिखी तो साथी लोग भड़क गए थे। आज वहां से पवन लालचंद की भी विदाई हो गई, जबकि वो एक अच्छे पत्रकार हैं। दरअसल, मीडिया में अब अच्छे पत्रकारों की जरूरत नहीं है। .... टाइप पत्रकार चाहिए या दलाल टाइप। जो ऐसा कुछ नहीं है, वो अब गिने-चुने बचे हैं। ऐसे में पत्रकारों को भी बेरोजगार दिवस की बधाई।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]


हिन्दुस्तान समूह के मीडियाकर्मी हार न मानें, केस ठोकें

हिन्दुस्तान टाइम्स समूह में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को बिना कारण नौकरी से निकाला जा रहा है। कर्मचारियों पर दबाव डाला जाता है और न करने पर निकाला जाता है। कारण साफ है कि 3000 करोड़ का सालाना कारोबार करने वाले अखबार समूह में वेजबोर्ड का कोई कर्मचारी नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स समूह कानून को ठेंगा दिखा कर भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के दम पर निरंतर कर्मचारियों का शोषण कर रहा है। 

यहां न्याय के लिए कर्मचारियों को कितना भटकना पड़ता है इसकी एक छोटी सी मिसाल यह है कि हिन्दुस्तान टाइम्स समूह ने अपने यहां कार्यरत 472 कर्मचारियों को महात्मा गांधी की जन्मतिथि 02 अक्‍टूबर 2004 को निकाल बाहर किया था। 2012 में यह कर्मचारी केस जीते। कोर्ट ने साफ कहा था कि कर्मचारियों का कोई दोष नहीं है और प्रबंधन ने साजिश करके निकाला है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक मामला फाइनल होने के बावजूद कर्मचारी बकाया वेतन और नौकरी के लिए तरस रहे हैं। 

न्याय व्यवस्था ऐसी कि आम आदमी ताकता रह जाए। आम आदमी किसी मामले में बार-बार कोर्ट जाए तो जुर्माना और अगर मैनेजमेंट जाए तो बड़े-बड़े वकील और कोर्ट उनके प्रति नरम रुख रखता रहा है। 

इन दिनों अखबारों में छंटनी की बेतहाशा खबरें चिंतित करने वाली हैं। कोरोना से मीडियाकर्मियों के मरने का सिलसिला जारी है। रिपोर्टिंग करने वाले मीडियाकर्मी, न्यूज एडिटर और एडिटर आदि को तो सरकारी सहायता मिल जाती है लेकिन डेस्क पर काम करने वाले तथा अन्य मीडियाकर्मियों को न तो कोई सहायता और न ही उनके अपने संस्थानों से कोई मुआवजा ही मिल रहा है और इसके पीछे मीडिया संस्थानों के मालिकों का अपने कर्मचारियों के प्रति प्रतिकूल व्यवहार माना जा रहा है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो मनमाने ढंग से वेतन दिया जाता है। प्रिंट मीडिया के लिए समय-समय पर वेतन आयोग गठित किए जाते रहे हैं और वर्तमान में मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार वेतन देय है लेकिन ज्यादातर संस्थानों ने इससे बचने के लिए कम वेतन पर मीडियाकर्मियों की भर्ती की है। 

हिन्दुस्तान टाइम्स और हिन्दुस्तान अखबार चलाने वाले मीडिया ग्रुप ने तो वर्ष 2002 से ही वेज बोर्ड कर्मचारियों का शोषण शुरू कर दिया था जो अब तक जारी है। हिन्दुस्तान टाइम्स समूह के सैंकड़ों कर्मचारी कोर्ट से केस जीतने के बाद भी अभी तक कई सौ करोड़ रुपये बकाये के इंतजार में कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स समूह संस्थान से शुरू हुई बीमारी आज सभी संस्थानों में पहुंच गई है जहां मैनेंटमेंट में उच्च पदों पर तो मोटी तनख्वाहों पर कर्मचारी रखे जाते हैं और उन्हें विज्ञापन और येन-केन प्रकारेण नैतिक-अनैतिक ढंग से पैसा जुटाने का काम सौंपा जाता है लेकिन रिपोर्टिंग से लेकर, डेस्क पर काम करने वाले तथा अन्य मीडियाकर्मियों को कम तनख्वाह पर मनमाने ढंग से 50 या 100 रुपये के स्टाम्प पर नौकरी के कांट्रैक्ट थमाया जाता है जिसके अनुसार उनका प्रोविडेंट फंड से लेकर, ग्रेच्युटी का अंशदान तक उनकी तनख्वाह से काटा जाता है और सारी कटौती के बाद कर्मचारी मामूली टेक-होम सेलरी लेकर बंधुआ और मजबूर जीवन जीने को मजबूर हैं। 

2014 से मोदी सरकार बनने के बाद से तो स्थिति और भी खराब हो गई है। भाजपानीत सरकारों ने कभी भी मजीठिया वेजजबोर्ड की रिपोर्ट को लागू करवाने की प्रयास नहीं किया। उल्टे भाजपानीत राज्य सरकारों के अधिकारियों से मीडिया संस्थानों के मालिकों से मिलकर संबंधित न्यायालयों में इस आशय की झूठी रिपोर्टें फाइल की कि सभी मीडिया संस्थानों में वेजबोर्ड लागू हैं। 

मीडिया की दुर्दशा की लंबी गाथा है। वो लोग दूसरों का क्या भला करेंगे जो अपने कर्मचारियों का शोषण करने में सबसे आगे हैं और उनके कर्मचारी आम जनता का क्या भला करेंगे जब वो खुद शोषण का शिकार हों, लेकिन एक बात जो सबको ज्ञात होनी चाहिए वो यह है कि ठेके पर कार्यरत इन कर्मचारियों को चुपचाप नहीं बैठना चाहिए। लेबर कोर्ट इस तरह के मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं करता। अत: इस प्रकार के मामलों में उच्च न्यायालय में कम्पनसेशन के तहत मीडिया संस्थानों पर केस करने के लिए एकजुट होना चाहिए, क्योंकि ऐसे ज्यादातर मामले इकतरफा एग्रीमेंट से जुड़े होते हैं और जितने वर्षों तक कम तनख्वाह में काम किया है उसके पूरे वेतनमान के भुगतान के लिए वेजबोर्ड के अनुसार वेतन की गणना करके सीधे भुगतान के लिए संबंधित लेबर कमिश्नर के यहां पूरा वेतन दिलवाने के लिए शिकायत दायर करनी चाहिए क्योंकि वेजबोर्ड में इस बात का प्रावधान किया गया है कि कर्मचारी भले ही ठेके पर हो लेकिन उसे वेजबोर्ड द्वारा अधिसूचित वेतन से कम वेतन नहीं दिया जा सकता। 

खबरें आ रही हैं कि हिन्दुस्तान टाइम्स समूह में सबसे ज्यादा छंटनी का दौर चल रहा है इसलिए कर्मचारियों से निवेदन है कि वे अपने वेतन की गणना वेजबोर्ड के अनुसार करके अपने संबंधित लेबर कमिश्नर आफिस में बकाया वेतन भुगतान की शिकायत दायर करें व आगे के वेतन व इकतरफा नौकरी के कांट्रैक्ट को चैलेंज करते हुए मुआवजे के लिए संबंधित उच्च न्यायालयों की शरण लें। 

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित।

[साभार:  bhadas4media.com]


हिंदुस्तान देहरादून से भी दस मीडियाकर्मी हटाए गए

हिंदुस्तान अखबार से जिस कदर निर्ममता से पूरे देश भर से पत्रकारों को नौकरी से निकाला गया, वह अपने आप में एक मिसाल है। कहने को तो इस देश में लोकतंत्र है, नियम कानून का राज है लेकिन मीडिया हाउसों के मालिकों के चरणों में लोकतंत्र नतमस्तक दिखता है। इन्हें किसी का डर नहीं। न श्रम विभाग से, न कोर्ट से, न अफसर से, न मंत्री से, न अपने कर्मियों से। ये सबसे बड़े अलोकतांत्रिक और अमानवीय लोग हैं।

हिंदुस्तान अखबार से मीडियाकर्मियों को निकाले जाने के क्रम में सूचना है कि देहरादून संस्करण से भी कइयों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। 

बताया जा रहा है कि देहरादून हिंदुस्तान से कुल दस लोग निकाले गए हैं। इनमें तीन स्टाफर हैं और 7 स्टिंगर हैं। 

सूत्रों के मुताबिक जिन स्टाफर्स को कार्यमुक्त किया गया है उनके नाम हैं- प्रदीप बहुगुणा, नरेंद्र शर्मा और चीफ फोटो जर्नलिस्ट प्रवीण डंडरियाल। 

कार्यमुक्त किए गए स्टिंगर्स में कुणाल, रश्मि, संजय, अजय आदि हैं। 

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित। 

[साभार:  bhadas4media.com]