Monday, 18 April 2022

अमर उजाला के 75 साल, वर्तमान और भविष्‍य में गर्व करने लायक कुछ नहीं


आज यानि 18 अप्रैल, 2022 को अमर उजाला अखबार अपनी स्‍थापना के गौरवमयी 75 वर्ष पूरे करने का जश्‍न मना रहा है। इस क्षण को पाठकों के साथ सांझा करने के लिए पाठकों को बेचे जाने वाले कुल पन्‍नों में से दो पन्‍ने खर्च किए गए हैं। जहां तक दैनिक अमर उजाला के गौरवमयी प्रकाशन की बात है तो नि:संदेह अखबार ने पिछले 75 वर्षों में से अधिकांश समय पत्रकारों और पत्रकारिता के आदर्शों को स्‍थापित करने के लिए हर संभव प्रयत्‍न किए। इससे सभी जानकार सहमत होंगे कि ये प्रयास इस समाचारपत्र के संस्‍थापकों स्‍वर्गीय डोरीलाल अग्रवाल और स्‍वर्गीय मुरारीलाल माहेश्‍वरी से लेकर स्‍वर्गीय अतुल माहेश्‍वरी तक पीढ़ी दर पीढ़ी चले। अतुल माहेश्‍वरी के देहावसान के बाद इस समाचारपत्र के आदर्श व परंपरा बरकरार है इसको लेकर और किसी को हो ना हो इस अखबार में कार्यरत हर उस कर्मचारी को संदेह है, जिसका इन 75 वर्षों में तिनका भर भी योगदान रहा है।

खैर इस संभावित या कहें बनावटी जश्‍न के रंग में भंग डालने की इस लेखक को जरूरत इसलिए महसूस हुई कि उसने भी इस अखबार के आदर्शों व संपादकीय परंपरा के उच्‍च मानकों के बीच काम करके खुद को परिष्‍कृत किया है। लेकिन जिस प्रकार के दावे आज के अंक में ‘संकल्‍प का उजाला विश्‍वास की शक्‍ति’ के शीर्षक से किए जा रहे हैं, वो इस अखबार की वर्तमान परिस्‍थितियों को देखते हुए महज बनावटी या कहें ढोंग से कम नहीं है। हालांकि जहां तक पाठकों की बात है तो नि:संदेह अभी तक उनका विश्‍वास इस समाचारपत्र बना हुआ हो सकता है, मगर उन्‍हें इस समाचारपत्र की अंतरात्‍मा के दूषित होने का पता लगने में ज्‍यादा समय नहीं लगेगा। फिलहाल एक अखबार की निष्‍पक्षता, उद्यमशीलता और लोकप्रियता के उच्‍च मानक और आदर्श कागज पर काली या रंगीन स्‍याही से उकेरे शब्‍द और तस्‍वीरें ये सब तय नहीं करते। इसके पीछे होता है एक संस्‍थान के साथ जुड़े कर्मचारियों का अनुभव और उद्यम। एक अखबार के मामले में संपादकीय विभाग का निष्‍पक्ष और निरभीक दिमाग ही इसकी आत्‍मा मानी जाती है।

मौजूदा दौर के अमर उजाला में ये सब बातें नहीं दिखाई दे रही हैं। खासकर अतुल माहेश्‍वरी के देहांत के बाद तो इस अखबार का दिमाग यानी संपादकीय विभाग तो पूरी तरह से कॉपरपोरेट मैनेजरों के यहां गिरवी रख दिया गया है। हालांकि इसकी शुरुआत इस अखबार के विनिगमीकरण के साथ ही हो चुकी थी, मगर संपादकीय को अच्‍छी तक समझने और मजबूत पकड़ रखने वाले अतुल माहेश्‍वरी ने कॉरपोरेट मैनेजरों को इसमें घुसपैठ करने का जरा भी मौका नहीं दिया था। बाकी कई दिक्‍कतों के बावजूद उन्‍होंने संपादाकीय संस्‍था को असली अमर उजाला की परपंपराओं से बांधे रखा था। उनके जाने के बाद आगे की पीढ़ी ने इन्‍हें पूरी तरह से समाप्‍त कर दिया और पूर्ववर्ती मालिकों के समय से स्‍वच्‍छंद बह रही संपादकीय संस्‍था पर से मौजूदा मालिकों ने अपना वरदहस्‍त उठा कर कॉरपोरेट मैनेजरों पर रख दिया है।

अब हालात ये हैं कि संपादक नौकरी बजा रहे हैं और संपादकीय विभाग पन्‍ने काले और रंगीन करने की परंपरा निभा रहा है। खबरों का तीखापन और प्‍लानिंग पूरी तरह से गायब है। कर्मचारी मजबूरी में काम कर रहे हैं, क्‍योंकि उन्‍हें पता है यहां से गए तो कहीं के नहीं रहेंगे। समूह संपादक का पद गायब है। जो संपादकीय विभाग देखते थे वो रिटायरमेंट के बाद लाला जी से सैटिंग करके अपनी पगार बनाए हुए हैं और न्‍यूज एजेंसी का कामकाज देख रहे हैं। ऐसा होने की एक और बड़ी वजह मजीठिया वेजबोर्ड है। इससे बचने के लिए पिछले दस वर्षों से कई प्रकार के हथकंडे अपनाते हुए अखबार की गरिमा और कर्मचारियों के ‘विश्‍वास की शक्‍ति’ को नष्‍ट कर दिया गया है। जबकि पिछले बेजबोर्ड के समय ऐसा नहीं किया गया था। जैसे-तैसे कर्मचारियों को मनीसाना वेजबोर्ड के लाभ दिए गए थे। इस बार ना तो अतुल माहेश्‍वरी रहे और ना ही इस अखबार के पहले संपादकीय में लिखे गए शब्‍दों की कीमत रही। सिर्फ कीमत है तो बैलेंसशीट में दिखने वाले मोटे मुनाफे और चापलूस मैनेजरों की।

कर्मचारियों के वैध हकों को मारने के लिए पिछले कुछ वर्षों में अमर उजाला ने जो घटिया चालें चली हैं, ऐसा काम शायद ही स्‍वर्गीय मालिकों के समय पहले कभी किया गया हो। हालात ऐसे हैं कि पहले तो गैर-पत्रकार कर्मचारियों के जबरन इस्‍तीफे लेकर उन्‍हें अपने ही मैनेजरों द्वारा बनाई गई कंपनियों में डाला गया, फिर संपादकीय विभाग के सभी रिपोर्टरों से इस्‍तीफे लेकर एक न्‍यूज एजेंसी बनाकर उसमें डालने का काम शरू किया। इस बीच अमर उजाला पब्‍लिकेशंस लिमिटेड का नाम बदलकर अमर उजाला लिमिटेड किया और फिर प्रिंटिंग प्रेसों को एक सब्सीडरी कंपनी बनाकर इसमें शिफ्ट करके कर्मचारियों और अधिकारियों की आंख में धूल झोंकी गई। अमर उजाला की कमाई को अन्‍य कंपनी में लगाने की बातें भी समाने आ रही हैं। इस तरह के कई फर्जीबाड़े किए गए हैं। यह सारी कवायद सिर्फ और सिर्फ कर्मचारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के तहत बढ़ा हुआ वेतन देने से बचने के लिए की गई है। हालांकि यह भी सच है कि अमर उजाला ऐसा करने वाला अकेला अखबार नहीं है, बाकी अखबारों की भी यहीं हालत है, मगर बाकी अमर उजाला की तरह नहीं थे। खासकर अपने कर्मचारियों के हकों के मामले में। अब तो नीचता की हद पार करते हुए एक पॉकेट यूनियन बनाकर फर्जी समझौता तैयार करवाया गया है, जिसके बारे में पहले ही विस्‍तार से छप चुका है।

इस तरह अमर उजाला की 75वीं वर्षगांठ पर इतिहास को लेकर तो गर्व किया जा सकता है, मगर वर्तमान और भविष्‍य में गर्व करने जैसे कुछ नहीं दिख रहा। कर्मचारी एक संस्‍थान की रीढ़ होते हैं और अखबार के मामले में उसका चेहरा, दिमाग और दिल संपादकीय विभाग होता है, जो मरनासन है। रही बात पाठकों के विश्‍वास की, तो वो भी सब समझते और विचार करते हैं, मौजूदा हालात में इनका विश्‍वास भी एक सीमा तक ही बनाया रखा जा सकेगा। अगर सुधरे नहीं तो साफ होना तय है। अगर अच्‍छे से पूछना है तो मैनेजरों से पूछा जा सकता है, क्‍योंकि पीक(ऊंचाई) के बाद डिक्‍लाइन(गिरावट) इन्‍हीं मैनेजरों का पढ़ा-पढ़ाया पाठ है। इनोवेशन(नवाचार) तो जरूरी है, मगर प्रोडक्‍ट(उत्‍पाद) में, संपादकीय से छेड़छाड़ का मतलब अखबार का अंत।

-अमर उजाला के एक कर्मचारी की कलम से। न्‍यूजपेपर इम्‍लाइज यूनियन ऑफ इंडिया के उपाध्‍यक्ष शशिकांत द्वारा प्रेषित। संपर्क: neuindia2019@gmail.com


Wednesday, 6 April 2022

अमर उजाला के तेवर बदले, चाटुकारों का जमावड़ा


राजुल महेश्वरी की रीढ़ नहीं, देखना, बलिया के पत्रकारों को निकाल देगा!

बलिया प्रकरण पर कई दिन चुप रहा, पत्रकारों का मनोबल गिरा


राजुल महेश्वरी ने अमर उजाला का भट्ठा बिठा दिया। हालांकि शुरुआत 2005 में शशि शेखर ने कर दी थी। शशि शेखर ने अमर उजाला का ग्रुप एडिटर बनते ही इस अखबार की रीढ़ ही तोड़ दी थी। उस दौर में शशि शेखर ने सबसे पहले अमर उजाला के दिग्गज पत्रकारों को निकाला या अखबार छोड़ने पर मजबूर कर दिया। अमर उजाला का भट्ठा बिठाकर शशि शेखर हिन्दुस्तान चले गये और वहां भी उन्होंने वही सब किया। चाटुकारों की फौज भर्ती कर दी। बड़ा अखबार है तो झेल रहा है। खैर बात अमर उजाला की।

2000-01 की बात है। उन दिनों मैं अमर उजाला गुड़गांव में था। मारुति का आंदोलन चल रहा था। 5800 कर्मचारी आंदोलनरत थे। अमर उजाला तब गुड़गांव में नया-नया था और वहां इसे लोग उजाला सुप्रीम का अखबार यानी चार बूंदों वाला समझते थे। उस दौर में मैंने और मेरे सीनियर मलिक असगर हाशमी ने मारुति प्रबंधन की चूलें हिल दी थी। आंदोलन की जबरदस्त कवरेज की थी। तब कोई भी कार कंपनी हिन्दी अखबारों को विज्ञापन नहीं देती थी। मारुति प्रबंधन ने आंदोलन को दबाने के लिए अमर उजाला को 25 लाख का विज्ञापन पैकेज दिया कि कवरेज न हो। लेकिन तब अमर उजाला के ग्रुप एडिटर राजेश रपरिया थे उन्होंने प्रबंधन को साफ कह दिया कि सड़क पर कोई गतिविधि होगी तो छपेगी ही। तीन महीने तक आंदोलन चला और हमने खूब कवरेज की। मारुति प्रबंधन ही नहीं सरकार का भी दबाव था, अमर उजाला नहीं झुका।

अब वक्त बदल गया है और अधिकांश संपादक तो मालिक के चाटुकार और गुलाम बन गये हैं। अतुल जी के निधन के बाद राजुल महेश्वरी वैसे भी अखबार नहीं चला पा रहे। वो रीढ़विहीन हैं यही कारण है कि बलिया में पेपर लीक की खबर छापने पर अमर उजाला के तीन पत्रकारों की गिरफ्तारी हो गयी लेकिन उन्होंने तीन दिन तक अखबार में खबर तक नहीं छापी। लाला अब और डरपोक हो गया है। देखना, दिग्विजय, अजीत और मनोज को कुछ समय बाद नौकरी से निकाल दिया जाएगा। अमर उजाला अब पहले जैसा नहीं रहा। यदि मीडिया मैनेजमेंट अपने पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार करेगा तो कोई भी पत्रकार ईमानदार कैसे रहेगा?

मैंने अमर उजाला को जीवन के आठ बहुमूल्य साल दिये, और मुझे इस अखबार के प्रबंधन की .......... पर दुख हो रहा है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

मजीठियाः डीबी कॉर्प को औरंगाबाद हाईकोर्ट से करारा झटका


उप समाचार संपादक सुधीर जगदाले के दावे पर दिव्य मराठी के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने का आदेश 

बकाया नहीं दिया तो होगी जब्ती की कार्रवाई 

पूरे देश के समाचार पत्र कर्मचारियों के वेतन और अधिकार से जूड़े जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड मामले में मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने दैनिक भास्कर समूह (डीबी कॉर्प) के समाचार पत्र दिव्य मराठी दैनिक प्रबंधन को एक बार फिर फटकार लगाई है, जिसने देश भर के पत्रकारों का ध्यान आकर्षित किया है। औरंगाबाद के सहायक श्रम आयुक्त को भी 2019 में श्रम न्यायालय द्वारा पारित पुरस्कार के कार्यान्वयन में देरी के लिए माननीय उच्च न्यायालय ने जमकर लताड़ लगाई है। उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार, उप समाचार संपादक सुधीर भास्कर जगदाले के दावे पर दैनिक भास्कर समूह (डीबी कॉर्प) दिव्य मराठी के खिलाफ वसूली प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे द्वारा यह लैंडमार्क जजमेंट पारित किया गया।

बताते हैं कि सुधीर जगदाले के पक्ष में आदेश देते हुए औरंगाबाद श्रम न्यायालय द्वारा दैनिक भास्कर समूह (डीबी कॉर्प) को 4 जनवरी 2019 जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार तीन महीने के भीतर बकाया भुगतान करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ दैनिक भास्कर ग्रुप (डीबी कॉर्प) की दिव्य मराठी प्रबंधन ने श्रम न्यायालय में रिव्यू पिटीशन दाखिल की थी। जिसे 10 जून 2019 को श्रम न्यायालय ने खारिज कर दिया। उसके बाद डीबी कॉर्प ने इस अवार्ड का विरोध किया और उसे मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ में चुनौती दी थी तथा उस पर स्टे की मांग की।

मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ में इस मामले की पहली तारीख 23 सितंबर 2019 थी। डीबी कॉर्प लिमिटेड के प्रबंधन ने स्टे की मांग की। औरंगाबाद हाईकोर्ट ने दिव्य मराठी (डीबी कॉर्प) को निर्देश दिया कि वह 50 फीसदी बकाया कोर्ट में जमा करे उसके बाद ही मामले की सुनवाई होगी। करीब ढाई साल से दैनिक भास्कर समूह ने इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी 50 प्रतिशत राशि अदालत में जमा नहीं की। इसलिए उप समाचार संपादक सुधीर जगदाले फिर मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ में दौड़े और कहा कि श्रम न्यायालय द्वारा पारित अवार्ड के निष्पादन और वसूली प्रमाण पत्र जारी करने से तकनीकी आधार पर परहेज किया जा रहा है। इसलिए सहायक श्रम आयुक्त को वसूली प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया जाए।

इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दैनिक भाष्कर (डीबी कॉर्प) प्रबंधन के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश 23 मार्च 2022 को दिया। सुधीर जगदाले की ओर से माननीय उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता यतिन थोले ने अपना पक्ष रखा, जबकि श्रम न्यायालय में मामले में सुधीर का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. एम. शिंदे और अधिवक्ता प्रशांत जाधव ने रखा।

माननीय उच्च न्यायालय के 23 मार्च 2022 को जारी आदेशानुसार सहायक श्रम आयुक्त को आगे की कार्रवाई करनी होगी। श्रम पत्रकार अधिनियम की धारा 17 (3) के तहत दैनिक भास्कर समूह (डीबी कॉर्प लिमिटेड) के खिलाफ वसूली प्रमाण पत्र जल्द ही जारी किया जा सकता है। उसके बाद भी यदि दैनिक भास्कर समूह (डीबी कॉर्प) उप समाचार संपादक सुधीर जगदाले को मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार बकाया राशि का भुगतान नहीं करता है, तो जिला कलेक्टर डीबी कॉर्प के खिलाफ जब्ती की कार्रवाई कर सकता है।


शशिकांत सिंह

पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट

9322411335


Wednesday, 30 March 2022

चिटफंड कंपनी ने इस पत्रकार से 29 लाख हड़पे! एफआईआर दर्ज

प्रति; पुलिस उपायुक्त परिमंडल- 5 मुंबई- 400018 वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक धारावी पुलिस स्टेशन, मुंबई- 400017 विषय: ‘महेश को-आप. क्रेडिट सोसायटी लि.’ में जमा मेरी धनराशि को मुझे दिलवाने के संदर्भ में… आदरणीय महोदय, आपके पुलिस स्टेशन की सीमा में स्थित ‘महेश को-आप. क्रेडिट सोसायटी लि.’ (पता: राजीव गांधी नगर, रूम नं. सी- 12, ब्लॉक नं. 03, एम. जी. रोड, धारावी, मुंबई- 400017) में मैंने कुल 29,00,000/- (उन्तीस लाख रुपए मात्र) जमा किया है. यह राशि मेरे (15,50,000/-), मेरी पत्नी श्रीमती रेखा सिंह (8,00,000/-) और मेरी सुपुत्री सुश्री गीतिका सिंह (5,50,000/-) के नाम से जमा की गई है, जिसका अकाउंट नंबर हमें (क्रमशः) 0101060000000326, 0101060000000325 और 0101060000000324 तथा मेंबरशिप नंबर (क्रमशः) 0101एम00000011265, 0101एम00000002882 और 0101एम00000011290 प्राप्त हुआ है. श्रीमान, मुझे शीघ्र ही अपनी बेटी की शादी करनी है और मैंने अपना घर भी इसीलिए बेचा, ताकि बेटी की शादी करने में मुझे किसी प्रकार की आर्थिक दिक्कत का सामना न करना पड़े… आपको बताना चाहता हूं कि इसके लिए मैंने यह धनराशि अपना घर बेच कर जुटाई है. यह बात जब सुरेन्द्र मौर्य को पता चली कि बिके हुए घर का पैसा मेरे पास सुरक्षित है, तब वह मुझसे नियमित रूप से मिलकर मुझे इस बात के लिए राजी करने लगे कि जब तक मेरी बेटी की शादी तय नहीं हो जाती है अथवा मुझे किसी और कार्य के लिए जरूरत न पड़े, मैं यह धनराशि ‘महेश को-आप. क्रेडिट सोसायटी लि.’ में जमा कर दूं. इसके बावजूद मैं आगे नहीं बढ़ रहा था, क्योंकि इस तरह की सोसायटीज द्वारा किए जा रहे फ्राड की खबरों से मैं वाकिफ़ था. फिर भी मान्यवर, सुरेन्द्र मौर्य अपने मकसद में तब सफल हो गए, जब उन्होंने मेरी मुलाकात उक्त सोसायटी के चेयरमैन महेन्द्र मौर्य से करवाई… सुरेन्द्र मौर्य ने दावा किया कि महेन्द्र मौर्य उनके अपने सगे चचेरे भाई हैं, इसलिए मुझे किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी चाहिए… इसके बाद मौर्य बंधुओं ने जमा की जाने वाली धनराशि के बदले में मुझे अच्छी-खासी ब्याज देने का लालच दिया, साथ ही वादा किया कि चाहूं तो मैं चार महीने बाद कभी भी पैसे निकाल सकूंगा. इस पर जब मैंने ब्याज की रकम पूछी तो दोनों भाइयों ने चर्चा करके जवाब दिया- ‘कम से कम दो परसेंट के हिसाब से आपको जरूर मिलेगा !’ इसके बाद मैंने अलग-अलग किश्तों (कैश / चेक / एनईएफटी / आरटीजीएस) के माध्यम से 15 जनवरी, 2020 तक कुल 29,00,000/- की राशि उक्त सोसायटी में जमा करवा दी, तत्पश्चात 16 या 17 जनवरी को महेन्द्र मौर्य ने मुझे तीन सर्टिफिकेट-कम-फर्स्ट रसीद दी. इन सर्टिफिकेट्स को देख कर मैंने फौरन यह सवाल किया कि इनमें तो आपने 36 महीने लिखा है, जबकि मुझे पैसे तो चार-पांच महीने बाद ही लगेंगे ! इस पर महेन्द्र मौर्य ने कहा कि ‘उसे ध्यान मत दो… मैं बैठा हूं न… आपने एक महीने पहले से पैसे देना शुरू किया था, इसलिए मैंने भी फैसला किया है कि आप अगले महीने (यानी कि फरवरी, 2020) की 10 तारीख को ही आकर अपना 58,000/- ले जाना… आपके ब्याज की तारीख हर महीने की 10 तारीख ही रहेगी और आपका पूरा मूल धन 10 से 15 मई (2020) के बीच आपके उन खातों में ट्रांसफर कर दिया जाएगा, जिन खातों से हमारे पास आपने पैसे भिजवाए हैं.’ महोदय, इस बीच सुरेन्द्र मौर्य जहां अपने पिता के निधन के चलते पैतृक गांव चले गए थे, वहीं निजी कारणों से मैं भी 22 जनवरी, 2020 को अपने गांव चला गया… फरवरी, 2020 के पहले सप्ताह में मैं मुंबई वापस आया और आते ही सुरेन्द्र मौर्य से संपर्क किया, पर मिलने के बाबत वह लगातार टाल-म-टोल करते रहे… आखिर 10 फरवरी, 2020 को वह तब मिले, जब मैंने बहुत आग्रह किया कि ‘मुझे दो लाख रुपए की बड़ी जरूरत है, मुझे अविलंब दिलवा दीजिए.’ लेकिन इस मुलाकात के दौरान ही सुरेन्द्र मौर्य ने यह कह कर मेरे पैरों तले से जमीन खिसका दी कि ‘महेन्द्र मौर्य तो 24 जनवरी, 2020 से ही लापता हैं !’ सुरेन्द्र मौर्य के साथ इस समय चूंकि सोसायटी के कोषाध्यक्ष अरुण जैसवार भी मौजूद थे, लिहाजा मैंने तुरंत प्रश्न किया- ‘फिर मेरा पैसा ?’ इन दोनों ने मुझे सांत्वना दी कि ‘शुक्र है, महेन्द्र मौर्य ही लापता हैं… सोसायटी का पूरा पैसा बैंक में पूरी तरह सुरक्षित है !’ मैंने ज़िद की अगर ऐसा है तो मुझे संबंधित बैंक का स्टेटमेंट दिखाइए, पर स्टेटमेंट निकालने में इन्होंने पांच-छह दिन का समय लगा दिया… आश्चर्य है कि स्टेटमेंट निकालने के बाद इन लोगों को पता चला कि सोसायटी के लिए मैंने धारावी स्थित जिस भारत बैंक में पैसे ट्रांसफर किए, उसमें बमुश्किल 50,000/- बचे हैं !’ जाहिर है कि इस तथ्य के सामने आने से मैं तो जीते जी मर गया ! बस, तसल्ली थी तो इतनी ही कि सोसायटी का कोषाध्यक्ष अभी कोई रास्ता निकालने का भरोसा दे रहा है, साथ ही सुरेन्द्र मौर्य ने भी कहा कि ‘लोन के रूप में सोसायटी का 1,70,00,000/- (एक करोड़ सत्तर लाख रुपए मात्र) मार्केट में मौजूद है, जहां से कलेक्शन भी हो रहा है… मैं हर महीने की ब्याज तो समय पर देता ही रहूंगा, अप्रैल के एंड तक पूरा मूल धन भी आपको दे दूंगा.’ लेकिन सुरेन्द्र मौर्य ने ऐसा कुछ नहीं किया… उन्होंने न तो ब्याज देने की शुरुआत की, न ही मूल धन देने की उनकी नीयत दिख रही है. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि आए दिन नए-नए बहाने कर रहा यह शख्स अब नैतिकता को भी ताक पर रख चुका है. जब पैसे जमा करवाना था, तब तो खुद को चेयरमैन का भाई बताते हुए बड़ा इतराता था… लेकिन अब जबकि महेन्द्र मौर्य अंडरग्राउंड है, सुरेन्द्र मौर्य ने मुझसे ही कहना शुरू कर दिया है कि यदि मैं अपनी रकम हासिल करना चाहता हूं तो महेन्द्र मौर्य को खोज कर मैं स्वयं उसे अपने स्तर पर मुंबई लाऊं !’ श्रीमान, मेरे लिए यह असंभव है… असल में यह पारिवारिक फ्राड है, क्योंकि मौर्य परिवार के किसी भी सदस्य ने अभी तक महेन्द्र मौर्य की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में लिखवाई नहीं है. इस सोसायटी के चेयरमैन महेन्द्र मौर्य के बाद जहां सेक्रेटरी भी फरार हुआ, वहीं अब तो कोषाध्यक्ष भी कहीं छुप गया है. इस फ्राड के सार्वजनिक होते ही महेन्द्र मौर्य का अपना निजी परिवार (पत्नी, बच्चे और पिताजी) गांव शिफ्ट हो गया तो इसी को देखते हुए मुझे आशंका है कि सुरेन्द्र मौर्य भी मुंबई से अब कभी भी पलायन कर सकता है ! अत: मेरा विनम्र निवेदन है कि मेरी ओर से सुरेन्द्र मौर्य और महेन्द्र मौर्य के विरुद्ध प्राथमिकी (F.I.R.) दर्ज करके इन दोनों भाइयों पर यथोचित कार्यवाही की जाए, साथ ही आप कृपया ब्याज सहित मेरी उपरोक्त संपूर्ण धनराशि मुझे दिलवाने की कृपा कीजिएगा, मैं सदैव आपका आभारी रहूंगा… सधन्यवाद; आपका कृपाभिलाषी, (धर्मेन्द्र प्रताप सिंह) पत्रकार मुंबई मोबाइल: 9920371264 दिनांक: 17/03/2020

Friday, 25 February 2022

अंशदान में देरी से हुए नुकसान की भरपाई करेंगे नियोक्ता

उच्चतम न्यायालय ने साफ कहा कि ईपीएफ अंशदान जमा करने में देरी के लिए नियोक्ता को कानून की धारा 14 बी के तहत क्षतिपूर्ति देनी होगी नई दिल्ली, 23 फरवरी। कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) में अंशदान (EPF contribution) में देरी के लिए होने वाले नुकसान की भरपाई नियोक्ता को करनी होगी। उच्चतम न्यायालय (SC) ने बुधवार को यह व्यवस्था दी है। न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायमूर्ति अभय एस ओका की पीठ ने कहा कि कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध प्रावधान अधिनियम किसी ऐसे प्रतिष्ठान में काम करने वाले कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता है, जहां 20 या अधिक लोग काम करते हैं। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि इस कानून के तहत नियोक्ता की यह जिम्मेदारी है कि वह अनिवार्य रूप से भविष्य निधि (Provident Fund)) की कटौती करे और उसे ईपीएफ कार्यालय में कर्मचारी के खाते में जमा कराए। उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर दी है। उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि यदि नियोक्ता ईपीएफ में अंशदान में देरी करता है, तो इसकी क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी उसी की होगी। न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारा विचार है कि ईपीएफ अंशदान जमा करने में देरी के लिए नियोक्ता को कानून की धारा 14 बी के तहत क्षतिपूर्ति देनी होगी। कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना पर विचार ईपीएफओ संगठित क्षेत्र के 15,000 रुपये से अधिक का मूल वेतन पाने वाले तथा कर्मचारी पेंशन योजना-1995 (ईपीएस-95) के तहत अनिवार्य रूप से नहीं आने वाले कर्मचारियों के लिए एक नई पेंशन योजना लाने पर विचार कर रहा है। वर्तमान में संगठित क्षेत्र के वे कर्मचारी जिनका मूल वेतन (मूल वेतन और महंगाई भत्ता) 15,000 रुपये तक है, अनिवार्य रूप से ईपीएस-95 के तहत आते हैं। एक सूत्र ने एजेंसी से कहा, ‘‘ईपीएफओ के सदस्यों के बीच ऊंचे योगदान पर अधिक पेंशन की मांग की गई है। इस प्रकार उन लोगों के लिए एक नया पेंशन उत्पाद या योजना लाने के लिए सक्रिय रूप से विचार किया जा रहा है, जिनका मासिक मूल वेतन 15,000 रुपये से अधिक है।’’ सूत्र के अनुसार, इस नए पेंशन उत्पाद पर प्रस्ताव 11 और 12 मार्च को गुवाहाटी में ईपीएफओ के निर्णय लेने वाले शीर्ष निकाय केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) की बैठक में आ सकता है। अगले महीने तय होंगी ब्याज दरें वित्त वर्ष 2021-22 के लिए कर्मचारी भविष्य निधि जमा पर ब्याज दरें अगले महीने तय की जाएंगी। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के निर्णय लेने वाले निकाय केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) की बैठक अगले महीने होने जा रही है जिसमें चालू वित्त वर्ष के लिए ब्याज दरों पर फैसला किया जाएगा। केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसी महीने एजेंसी को यह जानकारी दी। यादव ने कहा, ‘‘ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड की बैठक मार्च में गुवाहाटी में होगी, जिसमें 2021-22 के लिए ब्याज दरों तय करने का प्रस्ताव सूचीबद्ध है।’’ यह पूछे जाने पर कि क्या ईपीएफओ 2021-22 के लिए भी 2020-21 की तरह 8.5 प्रतिशत की ब्याज दर को कायम रखेगा, यादव ने कहा कि यह फैसला अगले वित्त वर्ष के लिए आमदनी के अनुमान के आधार पर किया जाएगा। मार्च, 2021 में सीबीटी ने 2020-21 के लिए ईपीएफ जमा के लिए 8.5 प्रतिशत की ब्याज दर निर्धारित की थी। सीबीटी द्वारा ब्याज दर पर फैसला लेने के बाद इसे वित्त मंत्रालय की अनुमति के लिए भेजा जाता है। मार्च, 2020 में ईपीएफओ ने भविष्य निधि जमा पर ब्याज दर को घटाकर 2019-20 के लिए 8.5 प्रतिशत के सात साल के निचले स्तर पर ला दिया था। 2018-19 में ईपीएफओ पर 8.65 प्रतिशत का ब्याज दिया गया था. ईपीएफओ ने 2016-17 और 2017-18 में भी 8.65 प्रतिशत का ब्याज दिया था। 2015-16 में ब्याज दर 8.8 प्रतिशत थी। वहीं 2013-14 में 8.75 प्रतिशत और 2014-15 में भी 8.75 प्रतिशत का ही ब्याज दिया गया था। हालांकि, 2012-13 में ब्याज दर 8.5 प्रतिशत थी। 2011-12 में यह 8.25 प्रतिशत थी। (साभारः भाषा)

Thursday, 24 February 2022

सर्विस कंडिशन चेंज होने पर कर्मचारियों का ट्रांसफर अवैध: सुप्रीम कोर्ट


महत्वपूर्ण फैसला, राजस्थान पत्रिका के एक मामले का हवाला भी दिया


किसी कंपनी द्वारा पहले कर्मचारियों पर त्यागपत्र देने के लिए का दबाव बनाने और त्यागपत्र ना देने पर कर्मचार्रिेयों को जबरिया काफी दूर ट्रांसफर करके नौकरी छोड़ने केा मजबूर करने वाली कंपनियों की चाल को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने अवैध करार दिया है। यह फैसला ट्रांस्‍फर को हथियार के तौर पर इस्‍तेमाल करने वाली निजी कंपनियों के लिए एक बड़ा झटका है। एमएस कापरो इंजीनियरिंग इंडिया लिमिटेड बनाम सुरेंद्र सिंह तोमर एवं अन्‍य के मामले में सुप्रीमकोर्ट के जस्‍टीस एमआर शाह व एएस बोपन्‍ना की खंडपीठ ने 26 अक्‍तूबर, 2021 को यह फैसला सुनाया है। इस मामले में पाईप बनाने वाली मध्य प्रदेश की एक कंपनी ने अपने कर्मचारियों की संख्‍या कम करने के गलत इरादे से पहले अपने कर्मचारियों को इस्‍तीफा देने का दबाव बनाया, जब वे ना माने तो एक साथ नौ कर्मचारियों का तबादला मौजूदा कार्यस्‍थल से करीब 900 किमी. दूर राजस्थान में कर दिया गया। इतना ही नहीं इन कर्मचारियों को पाइप बनाने की यूनिट से नट बनाने वाले यूनिट में भेजा गया, जिसे कोर्ट ने सर्विस कंडिशन में बदलाव मानते ही औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 9-ए का उल्‍लंघन माना। इस फैसले में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने ना केवल सभी कर्मचारियों सिर्फ ट्रांसफर रद्द करने के लेबर कोर्ट के फैसले को सही करार दिया, बल्‍कि चार सप्ताह के अंदर सभी कर्मचारियों को एरियर व वेतन देने, फिर से काम पर रखने और अन्य सभी सुविधाएं देने के अलावा प्रत्येक कर्मचारी को 25-25 हजार रुपए हर्जाना देने का भी आदेश दिया है।

मध्य प्रदेश के दिवास की कापरो इंजिनियरिंग इंडिया लि. में लोहे के पाईप बनाए जाते हैं। इस कंपनी के नौ कर्मचारियों ने कंपनी में 25 से 30 साल तक नौकरी की। कर्मचारियों का कहना था कि कंपनी प्रबंधन ने उनसे त्यागपत्र मांगा मगर उन्होने त्यागपत्र नहीं दिया जिसके बाद कंपनी प्रबंधन ने 13 जनवरी 2015 को कर्मचारियों का ट्रांसफर दिवास से राजस्थान के चोपंकी कर दिया, जो दिवास से लगभग 900 किलोमीटर दूर है। इस ट्रांसफर से सभी कर्मचारी परेशान हो गए, क्योकि जिस जगह तबादला किया वहां 40 से 50 किमी. के दायरे में कोई रिहायशी इलाका तक नहीं था। ऐसे में इस जगह पर जाने से कर्मचारियों के बच्चों से लेकर माता-पिता परेशान होने वाले थे। इतना नहीं जिस नई इकाई में इन कर्मचारियों का ट्रासंफर किया गया वहां पाईप नहीं बल्की नट बोल्ट बनता था। ऐसे में उनका कार्य भी बदला जा रहा था। इन कर्मचारियों का विवाद पहले लेबर कोर्ट गया, जहां से उन्‍हें राहत मिली। कंपनी ने लेबर कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चैलेंज किया और वहां भी लेबर कोर्ट के फैसले को सही माना गया। ऐसे में कंपनी ने सुप्रीमकोर्ट की शरण ली, मगर सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्मचारियों के हक में फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इन कर्मचारियों पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाने के लिए सैकड़ों किमी. दूर ऐसे जगह ट्रांसफर करना करना जहां ना तो उनके लिए रहने की व्‍यवस्‍था थी और ना ही उनको पहले वाला कार्य दिया गया था। इस दौरान माननीय सुप्रीमकोर्ट ने राजस्थान पत्रिका प्रा.लि. प्रेसिडेंट वर्सेज डायरेक्टर से जुड़े एक मामले का भी हवाला दिया और कहा कि यह प्रजेंट केस नेचर ऑफ वर्क, सर्विस कंडीशन में बदलाव और गलत तरीके से ट्रांसफर तथा मौलिक अधिकार से जुड़ा है, इसलिए नौ कर्मचारियों का राजस्थान में किया गया ट्रांसफर रद्द करने और वेतन सहित पूर्व के सभी लाभ देने का लेबर कोर्ट का फैसला सही था। वहीं सर्वोच्‍च अदालत ने अपने आदेश में चार सप्ताह के अंदर सभी कर्मचारियों को एरियर और वेतन देने तथा उनको फिर से काम पर रखने के अलावा अन्य सभी सुविधाएं देने सहित प्रत्येक कर्मचारी को 25-25 हजार रुपए अतिरिक्त देने का आदेश भी दिया है। इस आदेश से उन समाचार पत्र कर्मचारियों को भी लाभ  मिल सकता है जिनका इसी तरह से कंपनियों ने त्यागपत्र नहीं देने पर ट्रांसफर किया है, बशर्ते उनके तबादले की परिस्‍थितियां इस केस से मेल खाती हों।

शशिकांत सिंह

उपाध्यक्ष

न्यूज पेपर एम्पलॉयज यूनियन आफ इंडिया (एनएयूआई)

9322411335


Thursday, 3 February 2022

पहली बार किसी दल ने अपने घोषणा पत्र में पत्रकारों को जगह दी

कांग्रेस के घोषणा पत्र में पत्रकारों के लिए योजना

विचारक और सामाजिक चिंतक प्रेम बहुखंडी का आभार

उत्तराखंड कांग्रेस के घोषणा पत्र को बनाने में पार्टी के थिंक टैंक प्रेम बहुखंडी की अथक मेहनत रही है। उन्होंने इस घोषणा पत्र में पहाड़ और उत्तराखंडित को समहित करने का भरसक प्रयास किया है। सबसे अलग बात यह है कि उन्होंने गोदी मीडिया से इतर छोटे और मझोले पत्रकारों की सुध ली है। चारण, भाट और दलाल पत्रकारों की तो किसी भी सरकार में मौज होती है लेकिन इनकी संख्या पत्रकारों की कुल संख्या का 10 प्रतिशत ही होता है। 90 प्रतिशत पत्रकार आज भी ईमानदारी से और कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं।

कांग्रेस घोषणा पत्र में कंस्ट्रक्शन वर्कर्स बोर्ड 1996 की तर्ज पर पत्रकार बोर्ड का गठन करने की बात की गयी है, मसलन जैसे हर प्रकार के कंस्ट्रक्शन की कुल कीमत का कुछ प्रतिशत कंस्ट्रक्शन वर्कर्स बोर्ड के पास जाता है, उसी प्रकार सरकार द्वारा, जितने भी विज्ञापन दिए जाएंगे, उसका कुछ प्रतिशत पत्रकार वेलफेयर बोर्ड के पास जाएगा। इससे पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी, पत्रकारिता के भी स्वतंत्र होने की उम्मीद है। पत्रकारों के लिए सामाजिक सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। भाजपा सरकार में सच्चे पत्रकार सबसे अधिक असुरक्षित रहे हैं। पत्रकारों पर हमले, उनकी हत्या, झूठे मुकदमे, राजद्रोह समेत कई तरह से उनका उत्पीड़न किया गया है। ऐसे में कांग्रेस के घोषणा पत्र में पत्रकारों के लिए जगह दिया जाना सराहनीय है बशर्ते सरकार आने के बाद इस पर अमल भी हो।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]