Tuesday, 3 November 2020

एक कर्मचारी को ट्रेनी का दर्जा देकर, उसे ग्रेच्युटी एक्ट के लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता हैः केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि एक नियोक्‍ता, एक कर्मचारी को ट्रेनी का दर्जा देकर, जबकि उससे नियमित कर्मचारी जैसे काम लेते हुए, उसे ग्रेच्युटी एक्ट के लाभ से वंचित नहीं कर सकता है। 

जस्टिस एएम बदर ने कहा कि एक ट्रेनी को ग्रेच्युटी एक्ट के तहत 'कर्मचारी' शब्द की परिभाषा से बाहर नहीं किया गया है, बल्‍कि केवल एक 'अप्रेंटिस' को बाहर रखा गया है। 

अदालत ने आईआरईएल (इंडिया) लिमिटेड/ नियोक्ता की रिट याचिका रद्द करते हुए उक्त टिप्पणियां की हैं। याचिका के पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत नियंत्रण प्राध‌िकारी द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती गई दी थी।

यह दलील दी गई थी कि ट्रेनी या शिक्षार्थी वास्तव में अप्रेंटिस है और इसलिए, ग्रेच्युटी एक्ट की धारा 2 (ई) के तहत परिभाषित एक कर्मचारी नहीं है। मामला यह था कि एक कर्मचारी के पास दो साल की शुरुआती अवधि के लिए, जब उसे ट्रेनी के रूप में नियुक्त किया जाता है, जो अप्रेंटिस की नियुक्ति के बराबर है, ग्रेच्युटी प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। 

नियोक्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले पर भरोसा किया था, जिसमें कहा गया था कि ग्रेच्युटी एक्ट के तहत किसी भी वैधानिक प्रावधान के अभाव में, जिसे सेवा में लागू किया जा सकता है, एक ट्रेनी ग्रेच्युटी का हकदार नहीं हो सकता है।

ज‌स्टिस बदर ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताई और कहा कि एक ट्रेनी को ग्रेच्युटी एक्ट के तहत 'कर्मचारी' शब्द की परिभाषा से बाहर नहीं रखा गया है, बल्‍कि एक 'अप्रेंटिस' को बाहर रखा गया है। 

अदालत ने कहा, "ट्रेनी तथाकथित प्रशिक्षण की अव‌ध‌ि में विभिन्न प्रकार के कर्तव्यों का निर्वहन करता है और जिसे विशेष रूप से नामित व्यापार में प्रतिनियुक्त नहीं किया गया हैं, उसे अप्रेंटिस या शिक्षार्थी नहीं कहा जा सकता है। कल्याणकारी कानून के लाभकारी प्रावधानों की व्याख्या करते हुए पद का नामकरण अधिक परिणामदायक नहीं होता है।

ग्रेच्युटी एक्ट निस्संदेह एक कल्याणकारी कानून है, जो केवल अप्रेंटिस को प्रशिक्षण अवधि में ग्रेच्युटी प्राप्त करने के लाभ से रोक देता है। हालांकि, एक कर्मचारी को ट्रेनी के रूप में नामित करना, उससे नियमित काम लेना और फिर उसे ग्रेच्युटी एक्ट के लाभ से इस बहाने से वंचित करना कि एसा कर्मचारी ट्रेनी है, निश्‍चित रूप से कल्याणकारी कानून के उद्देश्य को पराजित करेगा।" 

अदालत ने उड़ीसा हाईकोर्ट द्वारा अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक, उड़ीसा खनन निगम लिमिटेड बनाम नियंत्रण प्राधिकरण, ग्रेच्युटी एक्ट भुगतान के संबंध में व्यक्त किए गए दृष्टिकोण से भी सहमति व्यक्त की कि रोजगार के अनुबंध के तहत नियोजित एक ट्रेनी अप्रेंटिस एक्ट के तहत अप्रेंटिस नहीं है, जब तक कि वह अप्रेंटिसशिप के अनुबंध के अनुसरण में एक विशेष ट्रेड में अप्रेंटिस ट्रेनिंग से गुजर रहा हो।

अदालत ने कहा कि कर्मचारी इस प्रकार 16.07.1991 से 15.07.1993 तक की अवधि के लिए ग्रेच्युटी का हकदार था, जैसा कि उन्होंने साबित किया है कि, उक्त अवधि के दौरान, वह किसी भी प्रशिक्षण से हीं गुजर नहीं रहे थे और इस तरह से एक अप्रेंटिस नहीं थे ताकि उन्हें पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के लाभकारी कानून से बाहर किया जा सके। 

केस: आआरईएल (इं‌डिया) ‌लिमिटेड बनाम पीएन राघव पनिक्कर [WP (C) .No.2254 of 2020]

कोरम: जस्टिस एएम बदर

प्रतिनिधित्व: एडवोकेट एम गोपीकृष्‍णन नांबियर, एडवोकेट सीएसअजीत प्रकाश


(source: https://hindi.livelaw.in/)

मजीठिया: राष्ट्रीय सहारा बनारस के मीडियाकर्मी को मिली जीत


वाराणसी में मजीठिया वेज बोर्ड मामले की लड़ाई लड़ रहे काशी पत्रकार संघ व समाचारपत्र कर्मचारी यूनियन को आज एक और सफलता हासिल हुई। मजीठिया मामले में राष्ट्रीय सहारा के खिलाफ बनारस में विनोद शर्मा ने केस जीत लिया है। वाराणसी श्रम न्यायालय ने विनोद शर्मा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रीय सहारा प्रबंधन को आदेश दिया है कि वह विनोद शर्मा को मजीठिया वेतन आयोग की संस्तुतियो के अनुरूप बकाये का भुगतान करे।

राष्ट्रीय सहारा हिन्दी दैनिक में विनोद शर्मा उप सम्पादक पद पर स्थायी रूप से कार्य कर रहे थे। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुरूप वेतन भुगतान की उनके लगातार मांग करने पर अखबार प्रबंधन टालमटोल करता रहा। बाद में सहारा प्रबंधन ने विनोद शर्मा की सेवा अवैधानिक रूप से समाप्त कर दी।

इस बीच मजीठिया मामले की लड़ाई लड़ रहे काशी पत्रकार संघ ने समाचारपत्र कर्मचारी यूनियन के सहयोग से स्थानीय श्रम न्यायालय में वाद दाखिल किया। वरिष्ठ अधिवक्ता अजय मुखर्जी व उनके सहयोगी आशीष टण्डन की मजबूत पैरवी का नतीजा रहा कि श्रम न्यायालय ने फैसला विनोद शर्मा के पक्ष में सुनाया।

श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी अमेरिका सिंह ने अपने फैसले में विनोद शर्मा के बकाये का भुगतान मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार करने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि सेवायोजक के ऐसा न करने पर अभिनिर्णय की तिथी से श्रमिक सम्पूर्ण वेतन पर सात प्रतिशत वार्षिक व्याज पाने का अधिकारी होगा।

काशी पत्रकार संघ अध्यक्ष राजनाथ तिवारी, महामंत्री मनोज श्रीवास्तव, पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार, संजय अस्थाना, विकास पाठक, योगेश गुप्त के साथ ही समाचारपत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी ने इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि इसके लिए पूरी कार्यसमिति बधाई के पात्र है, जिसकी एकजुटता और संघर्ष का परिणाम है कि लगातार सार्थक नतीजे आ रहे है।


शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी

9322411335

वेजबोर्ड न देने वाले मालिकों को पत्रकार ने कोर्ट में घसीटा, सम्मन जारी




नई दिल्ली। खुद की तिजोरी भरने वाले मीडिया मालिकों को अपने अधीन काम करने वाले कर्मियों का तनिक खयाल नहीं रहता। ये सरकारी नियमों के तहत मिलने वाले वेतन व अन्य देय को भी देने में कतराते हैं। ऐसे ही एक मामले में एक पत्रकार ने अपने मालिकों को कोर्ट में तलब कराया है। कोर्ट ने सम्मन जारी करते हुए सबको तलब किया है।

मामला श्रमजीवी पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय का है। ये 1 जनवरी 2006 से लेकर 30 जून 2016 तक एनएनएस ऑनलाईन प्राइवेट लिमिटेड नामक मीडिया कंपनी में न्यूज कोआर्डीनेटर के पद पर कार्यरत रहे।

पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय ने मजीठिया वेतनमान न मिलने की शिकायत श्रम विभाग में की। उनका आरोप है कि जबसे वे एनएनएस ऑनलाईन प्रा लि में न्यूज कोआर्डीनेटर के पद पर कार्य कर रहे हैं, तबसे उनको कंपनी ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार कोई लाभ नहीं दिया।

श्रमजीवी पत्रकार चन्द्र प्रकाश पाण्डेय की शिकायत पर श्रम अधिकारी ए के बिरूली एवं इंस्पेक्टर मनीश कुमार ठाकुर ने एनएनएस आनलाइन मीडिया प्रबंधन को शोकॉज नोटिस जारी कर दिया। इस शोकाज नोटिस में मीडिया प्रबंधन का पक्ष मांगा गया। साथ ही जरूरी दस्तावेज के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया गया।

प्रबंधन ठेंगा दिखाते हुए किसी सुनवाई पर उपस्थित नहीं हुआ। न ही कोई प्रत्युत्तर दिया। इस तरह एनएनएस आनलाइन मीडिया प्रबंधन ने श्रम विभाग, इसके अधिकारियों और दिल्ली सरकार की अवहेलना की।

श्रम इंस्पेक्टर मनीष कुमार ठाकुर ने जवाब न देने वाले मीडिया प्रबंधन के खिलाफ कोर्ट में आपराधिक शिकायत प्रस्तुत की। न्यायालय ने दस्तावेजों को देखने के बाद आरोपी नंबर एक राजेश गुप्ता (डायरेक्टर एवं मालिक) एवं पांच अन्य आरोपियों के खिलाफ सम्मन जारी किया है।

(source: bhadas4media.com)

Sunday, 18 October 2020

सर्वोच्‍च न्यायालय ने दोहराया- कोई भी स्टे छह महीने के भीतर स्वतः हो जाएगा समाप्त


उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले को दोहराते हुए कहा है कि उच्च न्यायालय सहित किसी भी अदालत द्वारा दिया गया कोई भी स्टे छह महीने के भीतर स्वतः समाप्त हो जाएगा, जब तक कि अच्छे कारणों के लिए विस्तारित न किया जाए। एशियन रेसुरफेसिंग रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड बनाम सीबीआई मामले में उच्चतम न्यायालय ने छह महीने के भीतर स्थगन आदेश की अवधि समाप्त करने की व्यवस्था दी थी। बृहस्‍पतिवार को जस्टिस रोहिंग्टन फली नरीमन, नवीन सिन्हा और केएम जोसेफ की तीन-जजों की पीठ ने इसे पुनः दोहराया है।


पीठ ने न्यायमूर्ति एके गोयल, रोहिंग्टन नरीमन और नवीन सिन्हा की पीठ द्वारा दिए गए फैसले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा है कि ऐसे मामलों में जहां स्थगन आदेश दिया जाता है, वह आदेश की तारीख से छह महीने की समाप्ति पर स्वतः खत्म हो जाएगा, जब तक कि एक स्पीकिंग आदेश द्वारा उसे बढ़ा नहीं दिया जाता है। स्पीकिंग आदेश में यह शामिल किया जाना चाहिए कि मामला इतनी असाधारण प्रकृति का था कि स्थगन आदेश मुकदमे को अंतिम रूप देने से अधिक महत्वपूर्ण था। ट्रायल कोर्ट जहां सिविल या आपराधिक कार्यवाही के स्थगन आदेश का प्रस्तुतिकरण किया जाता है, वहां स्थगन आदेश के छह महीने से आगे की तारीख तय नहीं की जा सकती है, ताकि प्रवास की अवधि समाप्त होने पर कार्यवाही शुरू हो सके, जब तक कि स्टे के विस्तार के आदेश का प्रस्तुतिकरण न हो जाए।

जस्टिस रोहिंग्टन फली नरीमन, नवीन सिन्हा और केएम जोसेफ की तीन-जजों की पीठ ने कहा कि दिसंबर 2019 में, अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, पुणे ने एक आदेश पारित करके उच्चतम न्यायालय द्वारा अनिवार्य रूप से छह महीने की अवधि समाप्त होने के बाद मुकदमे को फिर से शुरू करने से इनकार कर दिया और इसके बजाय पार्टियों को मुकदमे को फिर से शुरू करने के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख करने के लिए कहा। पीठ ने कहा कि हमें देश भर के मजिस्ट्रेटों को याद दिलाना चाहिए कि भारत के संविधान के तहत हमारी पिरामिड संरचना में उच्चतम न्यायालय शीर्ष पर है, और फिर उच्च न्यायालय। इस तरह के आदेश हमारे फैसले के पैरा 35 के सामने उड़ान भरते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि देश भर के मजिस्ट्रेट हमारे पत्र और भाव के आदेश का पालन करेंगे।

इस प्रकार, पीठ ने अपना फैसला दोहराते हुए कहा कि उच्च न्यायालय सहित किसी भी न्यायालय द्वारा जो भी ठहराव दिया गया है, वह स्वचालित रूप से छह महीने की अवधि के भीतर समाप्त हो जाता है, और ‘जब तक कि हमारे निर्णय के अनुसार, अच्छे कारण के लिए विस्तार नहीं दिया जाता है, ट्रायल कोर्ट छह महीने की पहली अवधि की समाप्ति पर है, मुकदमे की तारीख तय करके उसकी सुनवाई शुरू करेगी।’ पीठ ने अब एसीजेएम, पुणे को मामले की सुनवाई तुरंत शुरू करने का निर्देश दिया है।

गौरतलब है कि जस्टिस आदर्श कुमार गोयल, जस्टिस रोहिंग्टन और जस्टिस नवीन गुप्ता की पीठ ने मार्च 2018 में एशियन रिसर्फेसिंग रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो मामले में एक अहम फैसला दिया था है। पीठ ने कहा कि किसी भी दीवानी और आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही पर छह महीने से अधिक रोक अर्थात स्थगनादेश नहीं रह सकता। पीठ ने यह भी कहा कि जिन मुकदमों की कार्रवाई पर पहले से रोक लगी हुई है, उस पर रोक आज से छह महीने बाद खत्म हो जाएगी। पीठ ने कहा था कि मुकदमे की कार्रवाई पर अनिश्चितकालीन रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। इस सुधार की दरकार न सिर्फ भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में है, बल्कि सभी दीवानी और फौजदारी मामलों में है। पीठ ने कहा कि कार्यवाही पर रोक लगने से मामला अनिश्चितकाल के लिए लटक जाता है।

पीठ ने हालांकि यह कहा है कि कुछ अपवाद मामलों में कार्यवाही पर रोक छह महीने से अधिक जारी रह सकती है, लेकिन इसके लिए अदालत को बाकायदा आदेश पारित करना होगा। ये ऐसे मामले होंगे, जिनके बारे में अदालत को लगता हो कि उन मुकदमों पर रोक, उनके निपटारे से अधिक जरूरी है। पीठ ने यह फैसला भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर दिया था।

पीठ ने यह भी कहा था कि कभी-कभी तो रोक हटने की सूचना की जानकारी नहीं पहुंचती है, जिस कारण कार्यवाही भी शुरू नहीं हो पाती है। लिहाजा पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर परीक्षण कर सकता है, लेकिन ट्रायल पर रोक छह महीने से अधिक तक नहीं लगा सकता। पीठ ने कहा था कि उन तमाम दीवानी और आपराधिक मामले जिनमें कार्यवाही पर रोक लगी हुई है, उन पर रोक आज से छह महीने बाद खत्म हो जाएगी।

पीठ ने यह भी कहा था कि भविष्य में किसी भी मुकदमे की कार्यवाही की रोक छह महीने की अवधि तक के लिए ही लगाई जाएगी। यदि रोक छह महीने से अधिक होती है तो अदालत को आदेश पारित करना होगा। आदेश में बताना होगा कि वह मामला क्यों अपवाद है और ट्रायल पर रोक उसके निपटारे से अधिक महत्वपूर्ण क्यों है। पीठ  ने कहा था कि मुकदमों पर रोक की अवधि छह महीने के बाद खत्म हो जाए तो ट्रायल कोर्ट को खुद बिना किसी इंतजार के कार्यवाही शुरू कर देनी होगी।

पीठ ने कहा था कि किसी मामले में आरोप तय होने का आदेश पारित किया जाता तो वह आदेश न तो अंतरिम होता है और न ही अंतिम। हाई कोर्ट के समक्ष जब मामला परीक्षण के लिए आए तो कोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मामले के जल्द निपटारे में अनावश्यक बाधा न हो। हाई कोर्ट भी इस संबंध में निर्देश जारी कर सकता है। साथ ही हाई कोर्ट यह निगरानी कर सकता है कि दीवानी या आपराधिक मामले लंबे समय तक लंबित न पड़े रहें। पीठ ने इस आदेश की प्रति सभी हाई कोर्ट तक पहुंचाने के लिए कहा था, जिससे कि इस संबंध में जरूरी कदम उठाए जा सकें।

जेपी सिंह

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

[janchowk.com से साभार] 

ESIC ने बेरोजगारी भत्ते के लिए क्लेम की अंतिम तारीख बढ़ी

नई दिल्ली। कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से जिन लोगों की नौकरी चली गई है। उन्हें अब परेशान होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि केंद्र सरकार ने बेरोजगारी भत्ते के क्लेम के लिए आखिरी तारीख 30 जून, 2021 कर दी है। यानि कोरोना काल में नौकरी गंवाने वाले कर्मचारी जो अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना के तहत इंश्योर्ड हैं, वे तीन महीने की 50% वेतन पाने के लिए अब 30 जून 2021 तक आवेदन कर सकेंगे।

दूसरी ओर जिन लोगों ने 24 मार्च से 31 दिसंबर 2020 के बीच नौकरी गंवाई है, वे इस योजना के तहत तीन महीने की 50% सैलरी के हकदार होंगे। उन कामगारों को भी इसका फायदा मिलेगी जिन्हें फिर से नौकरी मिल गई है। देश में अटल बीमित व्यक्ति कल्याण योजना की सुस्त रफ्तार को देखते हुए कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) ने आवेदन करने की अंतिम तिथि को बढ़ाने का फैसला किया है।

ESIC तहत कोई भी बीमाकृत कर सकता है आवेदन

ESIC के तहत बीमाकृत कोई भी कर्मचारी बेरोजगारी भत्ता के लिए अपना दावा पेश कर सकता है। यह भत्ता तीन महीने की आधी सैलरी के रूप में दी जाएगी। ईएसआईसी इसके लिए 44 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान करने जा रही है। ESIC की तरफ से इस बेरोजगारी भत्ता के लिए 19 सितंबर को बेरोजगारी राहत को 25 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी तक दिया गया था। लेकिन बेरोजगारी भत्ते के लिए आवेदन करने वालों की संख्या उम्मीद से काफी कम दिख रही है। श्रम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कोरोना की वजह से बेरोजगार होने वाले अब तक 5 लाख कर्मचारियों ने इस भत्ते के लिए आवेदन नहीं किया है। इसे देखते हुए आवेदन की तिथि को आगे बढ़ाया गया है।

ऐसे कर सकेंगे क्लेम

50 फीसदी सैलरी के क्लेम के लिए कर्मचारियों को ESIC के पोर्टल पर ऑनलाइन क्लेमफॉर्म भरकर उसे सबमिट करना होगा और भरे गए फॉर्म का प्रिंटआउट, एफिडेविट, बैंक अकाउंट डिटेल्स और आधार कार्ड की कॉपी के साथ संबंधित ESIC शाखा जमा कराना होगा। आप चाहें तो पोस्ट के जरिए या फिर खुद जाकर इसे जमा कर सकते हैं। देश में अभी 3.49 करोड़ परिवार ESIC में रजिस्टर्ज हैं जिसके तहत 13.56 करोड़ लोगों को इससे जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं।

[ajhindidaily.in से साभार]

Sunday, 11 October 2020

कोरोना काल में बड़ी खबर: SC के इस ऑर्डर के बाद मप्र में मजीठिया केसों की सुनवाई फिर शुरू, आप भी करें ऐसा...


मप्र हाईकोर्ट के इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट का छह माह में निराकरण करने वाला आदेश अपने राज्य की कोर्ट में लगाएं, जल्द शुरू हो जाएगी आपके केस की सुनवाई

इंदौर। मजीठिया क्रांतिकारियों के लिए मप्र से बहुत अच्छी और राहतभरी खबर आई है। मप्र हाईकोर्ट ने राज्य की सभी कोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल आदि द्वारा समय-सीमा में सुनवाई करने के आदेश वाले सभी प्रकरणों में ट्रायल इत्यादि शुरू कर केस का निराकरण जल्द से जल्द करने का आदेश दिया है। इससे इंदौर-भोपाल आदि शहरों में मजीठिया केस की तारीखें लगने भी लग गई हैं। इससे यहाँ के मजीठिया क्रांतिकारियों के चेहरे खुशी से खिल उठे हैं। अन्य राज्यों के मजीठिया क्रांतिकारी भी मप्र हाईकोर्ट के इस आदेश का संदर्भ देकर अपने-अपने राज्यों की हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अपील करें तो उनके केस की भी जल्द सुनवाई शुरू हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि कोरोना संक्रमण के कारण देशभर में लॉकडाउन लग जाने के कारण लेबर कोर्ट भी बंद हो गए थे। पिछले दिनों कोर्ट खुल तो गए लेकिन वहां सिर्फ जमानत, चेक बाउंस और अत्यंत आवश्यक केस ही सुने जा रहे हैं। लेबर कोर्ट का हाल तो और भी बुरा है। कुछ शहरों की अदालतों को छोड़कर अधिकांश लेबर कोर्ट में स्टाफ ड्यूटी तो आ रहा है, लेकिन किसी भी केस की सुनवाई नहीं हो रही। ऐसे में मप्र हाईकोर्ट के आदेश से शुरू हुई सुनवाई ने मजीठिया क्रांतिकारियों में जान फूंक दी है। 


ऐसे खुली राह - 

मप्र हाईकोर्ट द्वारा 19 अगस्त 2020 को जारी मेमो में राज्य के सभी कोर्ट को आदेश दिया गया है कि वे अपने यहां विचाराधीन सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल आदि द्वारा समय-सीमा में सुनवाई करने के आदेश संबंधी सभी प्रकरणों में ट्रायल इत्यादि शुरू कर केस का जल्द से जल्द निराकरण करें। इसके लिए हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एसएलपी (क्रिमिनल) 11315/2019 अंकित माहेश्वरी उर्फ चिंटू विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य में दिनांक 14 अगस्त 2020 को पारित आदेश का हवाला दिया है। 


आपको यह करना होगा-

मप्र से बाहर के मीडियाकर्मियों को अपने राज्य में मजीठिया केसों की बंद पड़ी सुनवाई शुरू करवाने के लिए मप्र हाईकोर्ट द्वारा 28 अगस्त को जारी मेमोरेंडम और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मजीठिया केसों का निराकरण छह माह में करने संबंधी आदेश की प्रति के साथ आवेदन प्रस्तुत करना होगा। ऐसा करने से संबंधित न्यायालय भी उस राज्य की लेबर कोर्ट को मजीठिया केस की सुनवाई शुरू करने का आदेश दे सकती है।

Monday, 5 October 2020

गुजरात सरकार की मनुष्य विरोधी अधिसूचना रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों को ओवर टाइम देना जरूरी बताया


देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को स्पष्ट आदेश दिया कि कोविड 19 के मौजूदा समय में अगर किसी श्रमिक ने 12 घंटे काम किया है तो उसे 6 घंटे की ड्यूटी पर 30 मिनट का ब्रेक दिया जाएगा, इसके बाद ही आगे कार्य लिया जाएगा। साथ ही उसे ओवरटाइम भी देना होगा।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय गुजरात मजदूर सभा द्वारा दाखिल रिट पिटीशन (सिविल) संख्या 708/2020 गुजरात मजदूर सभा एन्ड अदर्स वर्सेज द स्टेट ऑफ गुजरात के मामले की सुनवाई कर रही थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने मजदूरों को लेकर गुजरात सरकार द्वारा जारी अधिसूचना को भी रद्द कर दिया है।

दरअसल गुजरात सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना में कहा गया था कि मजदूरों को ओवरटाइम मजदूरी का भुगतान किए बिना अतिरिक्त काम करना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि कोरोना महामारी के कारण अर्थव्यवस्था की स्थिति बुरी हो गई है, ऐसे में मजदूरों को उचित मजदूरी नहीं दिया जाना इसका एक कारण हो सकता है। साथ ही शीर्ष अदालत ने 19 अप्रैल से लेकर 20 जुलाई तक के ओवरटाइम का भुगतान करने का भी आदेश दिया।

इस मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान मजदूरों को गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मजदूरों को अपनी आजीविका से हाथ धोना पड़ा। पीठ ने कहा कि कानून का प्रयोग जीवन के अधिकार और मजबूर श्रम के खिलाफ नहीं किया जा सकता है।

आपको बता दें कि गुजरात सरकार द्वारा जारी 17 अप्रैल की अधिसूचना में कहा गया था कि उद्योगों को लॉकडाउन की अवधि के दौरान फैक्ट्री अधिनियम के तहत अनिवार्य कुछ शर्तों में छूट दी जाती है। इसमें श्रमिकों को 6 घंटे के अंतराल के बाद 30 मिनट का ब्रेक दिया जाएगा और आगे 6 घंटे और काम करवाया जाएगा। यानि की मजदूर को 12 घंटे तक काम करना होगा।

गुजरात सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में यह भी कहा गया था मजदूर द्वारा किए गए ओवरटाइम काम के बदले उसे सामान्य मजदूरी का ही भुगतान किया जाएगा।

इस अधिसूचना को फैक्टरी अधिनियम की धारा 5 के तहत जारी किया गया था, जो सरकार को सार्वजनिक आपातकाल की स्थिति के दौरान फैक्ट्री अधिनियम के दायरे से कारखानों को छूट देने की अनुमति देती है।

इस धारा के मुताबिक, सार्वजनिक आपातकाल से अभिप्राय एक गंभीर आपातकाल की स्थिति है, जो भारत की सुरक्षा को खतरे में डालती है चाहे युद्ध या बाहरी आक्रमण या आंतरिक गड़बड़ी हो।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार उद्योगों को धारा 5 के तहत छूट नहीं दे सकती है, क्योंकि महामारी को सार्वजनिक आपातकाल नहीं माना जा सकता है। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि 20 अप्रैल से 19 जुलाई की अवधि के दौरान सभी मजदूरों को उनके द्वारा किए गए ओवरटाइम मजदूरी का भुगतान किया जाना चाहिए।

आपको बताते चलें कि कई राज्य सरकारों ने इसी तरह कोरोना की आड़ में श्रम संशोधन किया और मजदूरो को 12 घंटा कार्य करना अनिवार्य कर दिया था। इसी रास्ते पर कई अखबार मालिक भी चलने की सोच रहे थे जिनके कदम पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और मजीठिया क्रांतिकारी तथा वाइस प्रेसिडेंट न्यूज़ पेपर एम्प्लॉयज यूनियन ऑफ इंडिया।

9322411335